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अजीबोगरीब परिवार की बागी महिला:पापा की छठवीं बीवी की चौथी औलाद हूं, पांच सौतेली मां हैं और 17 भाई-बहन

नई दिल्ली7 महीने पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा

मैं नीलिमा डालमिया आधार, मैंने सच को खंगाला। अंधेरी कोठरियों में बड़े-बुजुर्गों की दिखाई रोशनी में ढूढ़ा। देश-विदेश से सच की किरचें जुटाईं और लिख डाले सच्चाई के दस्तावेज। मेरे इन दस्तावेजों में देशवासियों के प्यारे बापू महात्मा गांधी और मेरे अपने पिता उद्योगपति आर के डालमिया का जिक्र था। इसलिए, लोगों ने मुझे पारिवारिक दुस्साहसी लेखिका का टाइटल दे दिया। भाई-बहनों ने मनगढ़ंत लिखने का आरोप लगाया। सौतेली मांओं ने परिवार को अपमानित करने वाली बागी लड़की करार दिया। इसके इतर, बहुत सारे लोगों ने मेरे लिखे को पढ़ा, खूब सराहा और मुझे शाबाशी दी।

दिल्ली की रहने वाली नीलिमा डालमिया भास्कर वुमन से बातचीत में कहती हैं, 'मेरी किताबें 'फादर डियरेस्ट: द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ आर के डालमिया', 'द सीक्रेट डायरी ऑफ कस्तूरबा' और 'मर्चेंट ऑफ डेथ' को पढ़ने वाले अक्सर मुझसे सोशल मीडिया पर पूछते हैं कि इतनी बहादुरी आपमें कहां से आती है, विरोध से डर नहीं लगता, आलोचनाएं परेशान नहीं करतीं, अपनों के सवाल और तानों के बावजूद आपको नींद कैसे आती है? मैं उन सभी लोगों को जवाब देती हूं कि सच कहने में डरना कैसा? मेरे पिता या परिवार ने जो किया, उसमें मेरी क्या गलती है?'

14 की उम्र में जाना, मेरी फैमिली कुछ हट के है
मैं बहुत ही बेतुके परिवार में पली-बढ़ी। मेरे पिता की एक-दो नहीं छह बीवियां और 18 बच्चे थे। मैं अपने पिता की छठवीं बीवी के सात बच्चों में से चौथे नंबर की बेटी हूं। हम सभी सौतेले भाई-बहनों और मांओं को अलग-अलग रखा गया। कभी एक-दूसरे से मिलने नहीं दिया गया। हमें अलग-अलग स्कूलों में पढ़ाया गया। परिवार का माहौल बड़ा घुटन भरा और तनावपूर्ण रहता। मां उदासी की चादर ओढ़े रहती, जहां हंसना खिलखिलाना गुनाह माना जाता। पिता कभी-कभी आते हम बच्चों से मिलने। पिता के आने की खुशी कम और घर में सांस लेने लिए ऑक्सीजन की कमी ज्यादा खलती। 14 साल की उम्र तक मुझे पता ही नहीं था कि मेरी जिंदगी बाकी लोगों जैसी नहीं है। मुझे लगता जैसे कि हर घर में ऐसे ही होता है।

मेरी 5वीं तक की पढ़ाई घर पर ही हुई। छठी क्लास में आई ही थी, तभी प. जवाहर लाल नेहरू ने मेरे पिता यानी आर के डालमिया पर फ्रॉड का केस कर दिया। पापा जेल गए। उसके बाद हम भाई बहन स्कूल गए। स्कूल में दोस्त बने, तब पता चला कि हमारा परिवार दुनिया भर के परिवारों से अलग है। बाकी बच्चे पापा के साथ रहते, उनके पापा उन्हें स्कूल छोड़ने आते, बच्चों को मेले ले जाते और उनकी शरारतों पर हंसते, पर हमें ये सब नहीं मिला।

लेखिका नीलिमा डालमिया आधार, फाइल फोटो
लेखिका नीलिमा डालमिया आधार, फाइल फोटो

मां की शर्तें रह गईं, पापा का प्यार फुर्र हो गया..
मेरी मां साहित्यकार दिनेश नंदिनी, राजस्थान के मारवाड़ी समुदाय की पहली स्नातक लड़की थीं। वे कविता और कहानियां लिखती। डालमिया परिवार साहित्य के लिए एक पुरस्कार का आयोजन करता था। मेरे नाना ने मां की कविता भेजी, जो चयनित भी हो गई। मां जब अवार्ड लेने आईं, तो उन्हें देखते ही पापा को पहली नजर में उनसे प्यार हो गया। दो साल का वक्त लगा, तब जाकर मां मानी। पिता ने कहा, शादी गुप्त रखेंगे। मां बिफर गईं और उन्होंने अपनी तीन शर्तें रखीं। पहली, शादी सबके सामने होगी, दूसरी- मेरे बाद किसी और से शादी नहीं करोगे और तीसरी- मेरे भाई-बहन भी साथ रहेंगे। पापा मान गए।
शादी हो गई और मां छठवीं बीवी बनकर दिल्ली के एक मकान में कैद हो गईं। शादी के तकरीबन सात सालों बाद ही पारिवारिक साजिश के चलते पापा का मां के प्रति प्यार फुर्र हो गया। इसके बाद, हम सातों भाई-बहनों को भेदभाव और दुत्कार सहनी पड़ी। अनगितन नियम कानून थोप दिए गए, जबकि मेरे सौतेले भाई-बहनों का उन नियमों से कोई लेना-देना नहीं था। हालांकि, मेरे पिता ने मां की शर्तों का मान ताउम्र रखा।

परिवार के माहौल ने बना दिया जिद्दी और बागी
जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई घर का माहौल बिगड़ता गया। घर में पसरी उदासी, मां का अकेलापन और पापा के आने पर होने वाली कलह से बचने के लिए मैं दोस्तों के यहां भाग जाती। मुझे वहां अच्छा लगता। इस बीच, मुझे मेरे भाई के दोस्त से प्यार हो गया। मैं पापा से डरती नहीं थी, उनके सामने अपने तर्क रखती। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं अमिताभ आधार से शादी करना चाहती हूं तो वे अमिताभ से मिले। उन्हें अमिताभ पसंद आ गए। वर्ष 1975 में हमारी शादी हो गई। मैं स्वभाव से बागी, अमिताभ शांत और सुलझे हुए। मेरे ससुर को मैं पसंद नहीं थी, उसकी वजह उद्योगपति की बेटी होना और लव मैरिज थी। हालांकि, धीरे-धीरे सब ठीक हो गया।

नीलिमा डालमिया आधार, फाइल फोटो
नीलिमा डालमिया आधार, फाइल फोटो

घटनाएं शब्द बन पन्नों पर बिखरती गईं
शादी के दो साल बाद पापा गुजर गए। मां अक्सर कहा करतीं कि तुम लिखो, तुम लिख सकती हो। एक दिन लगा कि मुझे अपने पिता पर लिखना चाहिए। मैंने लिखना शुरू किया तो नौ महीने तक लिखती ही रही। बचपन की सारी घटनाएं शब्द बन पन्नों पर बिखरती गईं और बन गईं कहानियां, तैयार हो गई 'फादर डियरेस्ट' नाम की किताब। जब सब लिख दिया, तब मैंने खुद में शांति और हल्कापन महसूस किया। ऐसा लग रहा था, जैसे मेरे अंदर का तूफान थम चुका है और शांति रह गई है। फिर शुरू हुआ मेरी आलोचनाओं का दौर।

जिंदगी की अच्छी बात
मेरी एक सौतेली बहन, जिनसे मेरी कभी बात नहीं हुई थी, उन्होंने कॉल कर पहली बार मुझसे बात की और शाबाशी दी। उनका कहना था कि तुमने फादर डियरेस्ट किताब में हम सबके दर्द को शब्द दिए हैं। चाहती तो मैं भी कुछ ऐसा ही करना, पर मुझमें साहस नहीं था।

नीलिमा डालमिया आधार, फाइल फोटो
नीलिमा डालमिया आधार, फाइल फोटो

मेरा सच लोगों को रास आया
फादर डियरेस्ट के बाद मर्चेंट ऑफ डेथ और द सीक्रेट डायरी ऑफ कस्तूरबा पब्लिश हुई। इन किताबों ने मुझे बेस्टसेलर राइटर बना दिया। तब मुझे लगा कि जिस सच के लिए मैंने मशक्कत की, वो लोगों को रास आ रहा है।

नुसरत फतेह अली, मेहंदी हसन और लता को सुनती हूं
नीलिमा बताती हैं कि खाली वक्त में नाती-पोतों के साथ वक्त बिताती हूं। किताबें पढ़ती हूं। नुसरत फतेह अली खान, मेहंदी हसन, आशा और लता मंगेशकर को सुनती और गुनगुनाती हूं। कपड़े पहनना और डिजाइन करना दोनों ही मेरे पसंदीदा शौक हैं। कसौली, चंबा, माउंट आबू जैसे शहरों यानी प्रकृति के करीब वक्त बिताना पसंद करती हूं। खाना खाने की शौकीन हूं, लेकिन बनाने का कतई शौक नहीं है।