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ये मैं हूं:आर्मी ऑफिसर की वाइफ हूं, उरी अटैक के बाद लिखी किताब, अनुराग बसु ने कहा ‘आपकी कहानी पर फिल्म बनाना चाहता हूं’

6 महीने पहलेलेखक: श्वेता कुमारी

बिहार में जन्मीं और कुछ साल झारखंड में पली-बढ़ी। अच्छे इंस्टीट्यूट में पढ़ाई की, मल्टी-नेशनल कंपनी में जॉब की और अपनी दुनिया में मस्त रही। मेरी जिंदगी भी बाकी लड़कियों की तरह आम थी, लेकिन सिर्फ मेरी शादी तक… इसके बाद मैं एक फौजी की पत्नी बनी। उस दिन के बाद से मेरी जो जिंदगी बदली, वो लगातार बदलती ही चली गई। आज मेरी जो पहचान है, वह मिलिट्री लाइफ और उसके अनुभवों की ही देन है। प्रेमिका, पत्नी, वॉर विडोज, दिवंगत मधुलिका रावत, सेना से जुड़े जवानों और उनके परिवारों ने मेरे जीवन को ऐसे छुआ कि न चाहते हुए भी मैं एक लेखिका बन गई। मेरी तीन किताबें आईं हैं और चौथी किताब पर मैं आजकल काम कर रही हूं। इन सभी किताबों में किसी के बेटे, भाई, पति और प्रेमी का जिक्र है…सच्ची घटनाओं पर आधारित मेरी किताबों ने मुझे बेस्ट सेलर बनाया। यह कहना है स्वप्निल पांडे का।

अपनी तीसरी बुक लॉन्च के दौरान दिवंगत मधुलिका रावत और सांसद मनोज तिवारी के साथ।
अपनी तीसरी बुक लॉन्च के दौरान दिवंगत मधुलिका रावत और सांसद मनोज तिवारी के साथ।

सेना में चलने, बोलने, खाने और चम्मच पकड़ने तक का अदब होता है, जो मैंने सीखा

शादी से पहले मैं एक ब्यूरोक्रेट परिवार का हिस्सा रही। गवर्मेंट सर्विस तो वहां भी देखी, लेकिन आर्मी परिवार का हिस्सा बनकर मैंने जिन अनुभवों को महसूस किया है, उसने मेरी जिंदगी बदल दी। सेना में यह माना जाता है कि सिविलियन फैमिली से आने वाली लड़कियों को शादी के बाद आर्मी लाइफ कल्चर सीखने में एक-डेढ़ साल का समय लगता ही है। मेरे साथ भी यही हुआ। मुझे याद है शादी के बाद कई बार डिनर इनविटेशन पर मैं जाती, तो अक्सर भूखी लौटती। दरअसल सेना में सिर्फ ऑफिसर्स या फौजियों का ही नहीं, बल्कि उनके परिवारों में भी बात करने तक का भी एक कल्चर होता है। यहां खड़े होने उठने-बैठने, टेबल मैनर्स यहां तक की स्पून पकड़ने और खाने तक का सलीका देखा जाता है। ऐसी बहुत सी बातें थीं, जिन्हें मैं नहीं जानती थी। अन्य अफसरों की पत्नियों इन सब में पारंगत थी। उन सभी के बीच मैं खुद को कमतर समझती और यही वजह थी कि आर्मी के सोशल गेट-टू- गैदर में मैं असहज हो जाती। इस दौरान पति का सहयोग बना रहा और समय के साथ मैंने हर वो चीज सीख ली, जो एक फौजी वाइफ होने के नाते मेरे लिए जरूरी थी।

वॉर विडोज के साथ गुजारे गए सुनहरे पल।
वॉर विडोज के साथ गुजारे गए सुनहरे पल।

साल 2016… इसी साल उरी अटैक हुआ और मैंने लिखना शुरू किया…

मुझे ब्लॉगिंग का शौक रहा है और अपने खाली समय में वही किया करती थी। मैं मानती हूं कि लिखना तब तक असंभव है, जबतक कोई बात आपको अंदर तक कुछ खुशी या दर्द न दे। मेरे लिखने की शुरुआत दर्द से हुई, जब मैं उरी अटैक में वीरगति को प्राप्त एक जवान की पत्नी और बच्चों से मिली। 30 साल से भी कम उम्र की विधवा पत्नी अपने चार और छह साल के बच्चे को लिए परेशान भटक रही थीं। पता चला वो घर ढूंढ रही हैं, क्योंकि ससुराल वालों ने उन्हें घर से निकाल दिया है। उनकी इस बात ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। वीरगति को प्राप्त जवान की बात होती है, लोगों की आंखें नम होती है, लेकिन तेरहवी के बाद उसके परिवार, बीवी और बच्चों को कौन याद करता है? पीछे रह गई शहीद की पत्नी के बारे में कौन कितने दिन सोचता है? उस परिवार के त्याग को कौन कितने दिन याद रखता है? इन सवालों ने मुझे कचोटना शुरू किया। मेरे अंदर गुस्सा इतना ज्यादा था कि मेरे शब्द ब्लॉगिंग में पूरे नहीं पड़ रहे थे और मेरे अंदर भरे इसी गुस्से ने किताब को जन्म दिया। मेरी पहली किताब उरी अटैक के बाद एक साल के अंदर ही 2017 में आई।

हैदराबाद के NCC कैडेट्स के बीच बतौर चीफ गेस्ट अपने अनुभव बांटते हुए।
हैदराबाद के NCC कैडेट्स के बीच बतौर चीफ गेस्ट अपने अनुभव बांटते हुए।

अनुराग बसु ने फोन कर के कहा ‘आपकी किताब पर फिल्म बनाना चाहता हूं’

पहली किताब ‘ सोल्जर्स गर्ल’ एक छोटे से पब्लिशर ने छापी। मेरे लिए बात आई, गई जैसी हो गई थी। मैं फिर से अपनी दुनिया में खो गई और जिंदगी बीतने लगी। इसी बीच एक दिन मुझे तानी बसु (अनुराग बसु की पत्नी) का फोन आया, जिसमें उन्होंने बताया कि अनुराग बसु आपकी किताब पर फिल्म बनाना चाहते हैं। उस दौरान पति के साथ मैं असम में थी। जंगलों के बीच, खराब नेटवर्क में मुझे लगा कि मेरी किताब को लेकर कहीं चर्चा भी नहीं हो रही है, न ही मुझे जानकारी थी कि मेरी किताब कितनी बिकी। छोटे पब्लिशर होने कि वजह से किताब खत्म होने के बाद वो लगातार इसे रिप्रिंट करके बेच रहे थे, जिसकी जानकारी मुझे नहीं थी। इसलिए तानी की बात को मैंने मजाक समझा। अगले दिन अनुराग बासु का कॉल आया जिसमें उन्होंने बताया कि उन्हें मेरी किताब की प्लॉटिंग और कैरेक्टर्स बेहद मजबूत है और वो फिल्म के सिलसिले में वो मुझसे मिलना चाहते हैं। हालांकि, फिल्म नहीं बन पाई, लेकिन इस एक घटना ने मेरे अंदर के लेखक को जोश से भर दिया। मुझे खुद पर यकीन हुआ कि मैं अच्छा लिख सकती हूं और मुझे लगातार लिखते रहना चाहिए। 2017 में पहली, 2019 में दूसरी और 2021 के नवंबर में मेरी तीसरी किताब आई। तीनों किताबें बेस्ट सेलर बनीं और फिलहाल मैं अपनी चौथी किताब पर काम कर रही हूं।

झारखंड की पूर्व राज्यपाल दौपदी मुर्मू से सम्मानित होने के दौरान की तस्वीर।
झारखंड की पूर्व राज्यपाल दौपदी मुर्मू से सम्मानित होने के दौरान की तस्वीर।

जो युवा ड्यूटी शुरू होने से पहले इंजर्ड हो गए, उनके लिए आवाज उठाती हूं

लेखक होने के अलावा मैं सोशल वर्क से भी जुड़ी हूं। चाहे वो आर्मी वाइफ वेलफेयर एसोसिएशन (AWWA) हो, या डिसएबल कैडेट पर चुप्पी मैंने हर मुद्दे पर बात की है। इससे इतर सेना से जुड़ी मनगढ़ंत मसालेदार कहानियों पर फिल्म या सीरियल बनाने की गुस्ताखी पर भी मैंने आवाज उठाई है। सोशल मीडिया पर चलाए गए मुहीम के बाद मुझे लाखों लोगों का समर्थन मिला। देशभक्तों की सामूहिक कोशिशों की ही देन कही जा सकती है कि अब देश रक्षा से जुड़े जवानों के जीवन पर फिल्म या एपिसोड बनाने से पहले डिफेंस मिनिस्ट्री से एनओसी (NOC) लेना जरूरी हो गया है। वहीं डिसएबल कैडेट पर भी लोग बात करने लगे हैं। इस कैडेट में वे लोग शामिल होते हैं जो ट्रेनिंग के दौरान इंजर्ड होने की वजह से बाहर कर दिए जाते हैं। दिव्यांग हो जाने की वजह से इनमें से ज्यादातर लोग किसी और काम को करने में सक्षम नहीं बचते। इन्हें सेना का हिस्सा भी नहीं माना जाता हैं, क्योंकि एक्टिव ड्यूटी ज्वाॅइन करने के पहले ही वो चोट खा चुके होते हैं, जिसकी वजह से इनका और परिवार का जीवन बुरी तरह प्रभावित होता रहा है। एक फौजी की पत्नी होने के नाते इन सारे कामों को मैं अपनी जिम्मेदारी मानती हूं, । अपने देश के लिए मेरा यह योगदान मुझे हर दिन कुछ नया करने को उत्साहित करता है।