• Hindi News
  • Women
  • This is me
  • I Did BSc, MBA And Did Marketing Work, But I Got My Skills By Becoming A Voice Over Artist, Running My Own Studio

आवाज से पहचान:BSc की, MBA कर मार्केटिंग का काम भी किया पर वॉइस ओवर आर्टिस्ट बनकर मिला हुनर को मुकाम, चला रही हूं अपना स्टूडियो

5 दिन पहलेलेखक: मीना

वॉइस ओवर आर्टिस्ट होना सिर्फ कला ही नहीं बल्कि अभिनय भी है। कई बार ऐसी आवाजें निकालनी पड़ती हैं जिनमें आवाज की एक्टिंग भी दिखे। जैसे अगर दौड़ते हुए किसी व्यक्ति की आवाज निकालनी है तो उसके लिए माइक के सामने शरीर के ऊपरी हिस्से को हिलाना पड़ेगा। हाथों को हिलाना होगा ताकि सुनने वाले को लगे कि व्यक्ति सच में दौड़ रहा है।इसी तरह अगर कोई व्यक्ति दूर खड़ा है तो आवाज की वैसी तान रखनी पड़ेगी जिससे लगे कि किसी दूर के व्यक्ति को बुलाया जा रहा है। रोते समय सिसकियां लेनी पड़ती हैं, जिसे मुंह पर हाथ रखकर भी करते हैं। कई बार जब लंबे प्रोजेक्ट्स पर काम करना होता है तब आवाज को एक जैसा बनाए रखने में दिक्कत होती है। दिनभर हमारी आवाज बदलती है। आवाज की ये दुनिया उतनी आसान नहीं जितनी दिखती है। ये शब्द हैं कवि, एंकर और वॉइस ओवर आर्टिस्ट इला जोशी के।

33 साल की इला भास्कर वुमन से बातचीत में कहती हैं, 'मुझे स्टेज पर बोलने का शौक था। स्कूल के समय से डिबेट और पोएट्री जैसे कॉम्पीटीशन करती रहती थी। कॉलेज में भी एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज में पार्ट लिया पर ये नहीं मालूम था कि एक दिन वॉइस ओवर आर्टिस्ट के नाम से भी जानी जाऊंगी।
मेरा जीवन वैसा ही है जैसे किसी मध्यवर्गीय परिवार का होता है। पैदाइश हरियाणा के एक छोटे से कस्बे नारायण गढ़ में हुई। हाई स्कूल की पढ़ाई यहीं से हुई। पिता जी प्राइवेट नौकरी में थे और मां स्कूल टीचर। मैं उन लड़कियों में से थी जो पढ़ाई और खेल दोनों में तेज रही। किसी से पीछे नहीं रहना था। सब कुछ करना था। आगे की पढ़ाई के लिए देहरादून गई।
ग्रेजुशन के लिए चंडीगढ़ आ गई और बीएससी की। हालांकि, मैं साइंस पढ़ना नहीं चाहती थी, लेकिन घर के बड़ों का मान रखने के लिए ये किया। यहां भी राष्ट्रीय स्तर तक की प्रतियोगिताओं में गई। इसके बाद करिअर की दिशा बदल गई। मुझे साइंस नहीं पढ़नी थी। उस समय तक मन बना लिया था कि अब नौकरी करनी है। मुझे फ्रंट लाइन में जाना था बैकैंड में नहीं, इसलिए मार्केटिंग एन्ड सेल्स में एमबीए किया। मुझे सिर्फ लैब में बैठकर टेस्टिंग नहीं करनी थी। उसके लिए खुद को अनफिट समझती।
अंग्रेजी में फ्लुएंसी लाने के लिए की मेहनत
एमबीए में को-करिकुलर एक्टिविटीज खत्म हो गईं, क्योंकि भाषा बदल गई। हरियाणवी और पंजाबी प्रदेश में पली-बढ़ी थी लेकिन इसकी आंचलिकता का असर हिंदी पर नहीं पड़ा। पर अंग्रेजी बोलना दूर की बात हो गई थी। ग्रेजुशन में अंग्रेजी सीखी लेकिन वैसी नहीं बोल पाती थी जैसी कोई दिल्ली में पैदा हुआ बच्चा बोलेगा। मेरी मातृभाषा हिंदी थी तो मैं उसके साथ ज्यादा कम्फर्टेबल थी। मेरे लिए शहर धीरे-धीरे बड़े हो रहे थे। नारायणगढ़ से देहरादून फिर चंडीगढ़। तो मुझे एकदम से कल्चरल शौक नहीं लगा। बस कैनवस थोड़ा बड़ा हो गया। वो उम्र भी ऐसी थी कि सबकुछ सीखते गई। धीरे-धीरे चीजें सीखीं।
एमबीए के बाद शुरुआती चार साल बैकेंड पर काम किया। 2014 मेरा जिंदगी का टर्निंग था। प्वॉइंट आया। मुंबई के प्रिंटिंग हाउस से मुझे नौकरी का ऑफर मिला, जो इंटरनेशनल सेल्स में था। यहीं के मैनेजर ने मुझे फ्रंटलाइन में जाने के लिए प्रेरित किया। यहां काम करते हुए मुझे देश-विदेश में जाने का मौका मिला। घूमते-फिरते और काम करते-करते लैंग्वेज की फ्लुएंसी भी आ गई।
‘कथा कथन’ से शुरू हुआ कहानी सुनाने का सफर
2016 से वॉइस ओवर के काम की शुरुआत हुई। इस समय एक वेबसाइट लॉन्च में मेरे मेंटर जमील गुलरेज साहब से मुलाकात हुई। उनका ग्रुप है कथा कथन। यह समूह भारतीय भाषाओं को बचाने का काम करता है। यह ग्रुप हिंदी भाषा को लिखकर और बोलकर प्रमोट करता है। इस समूह के साथ मेरी स्टोरी टेलिंग की जर्नी शुरू हुई। इसके बाद कई किताबों के ऑडियो, प्रमोशनल कंटेंट पर भी काम किया। अब तक फ्रीलांसिंग काम किया।

वॉइस ओवर के साथ-साथ वॉइस एक्टिंग भी करनी पड़ती है : इला जोशी
वॉइस ओवर के साथ-साथ वॉइस एक्टिंग भी करनी पड़ती है : इला जोशी

‘आवाज पर बहुत काम करना पड़ता है’
बहुत लोग कहते हैं कि तुम्हारी आवाज बहुत अच्छी है, लेकिन आवाज का अच्छा होना और उसके साथ वॉइस ओवर आर्टिस्ट होना, इसके बीच बहुत बड़ा फासला है। ये सिर्फ रियाज से समझ पाते हैं और हमें लगातार खुद पर काम करना पड़ता है। अच्छा वॉइस ओवर आर्टिस्ट बनने के लिए भाषा, उच्चारण, मॉड्युलेशन पर भी काम करना पड़ता है। सीखने के लिए हमेशा तैयार रहना पड़ता है। अगर मैं वॉइस ओवर आर्टिस्ट की बात करूं तो मैं इस प्रोफेशन में बहुत नई हूं। क्योंकि 2018 में मार्केटिंग की नौकरी छोड़कर मैंने इसे बतौर प्रोफेशन चुना है। वॉइस ओवर की इंडस्ट्री बहुत बड़ी है, यहां हर दिन कुछ नया सीखने को मिलता है।
‘वॉइस ओवर की फील्ड में मौके बहुत हैं’
वॉइस ओवर में लॉन्ग फॉर्मेट और शॉर्ट फॉर्मेट होते हैं। लॉन्ग फॉर्मेट में ऑडियो बुक्स, एक्सप्लेनर वीडियोज (ई-लर्निंग) आते हैं। शॉर्ट फॉर्मेट में विज्ञापन, रेडियो स्पॉट्स, प्रमोशनल मटेरियल आते हैं। डबिंग में भी बहुत सारा काम होता है। इंटरनेशल कॉन्टेंट की हिंदी में डबिंग होती ही है। इसके अलावा दूसरी भारतीय भाषाएं तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम की भी डबिंग होती है। एनीमेटिड फिल्में, सीरियल्स, कार्टून्स की भी डबिंग होती है।
आवाज का ख्याल रखें
कहा जाता है कि अगर आप रियाज करते हैं तो आवाज खुलती है। तो वॉइस ओवर के काम में भी रियाज करना होता है। बहुत से लोग बहुत सी चीजों से परहेज करते हैं। लेकिन सभी की बॉडी अलग होती है। कुछ लोग ठंडा और खट्टा खाने से परहेज करते हैं तो कुछ रिकॉर्डिंग पर जाने से पहले गर्म पानी पीते हैं। मैं जब लॉन्ग फॉर्मेट में ऑडियो बुक्स रिकॉर्ड करती हूं तो पांच घंटे बोलने के बाद गला थकने लगता है। लेकिन जब मुझे उस रिकॉर्डिंग में आवाज एक जैसी रखनी होती तो दिन का एक समय तय कर लेती हूं ताकि एक जैसी आवाज सुनाई दे। हम दिन भर में अलग-अलग सुनाई देते हैं। सुबह की आवाज अलग होती है, दोपहर तक वोकल कोर्ड्स खुल चुके होते हैं। शाम तक आवाज थकने लगती है। इसलिए रिकॉर्डिंग के लिए एक तय समय करना पड़ता है।

अपना स्टूडियो बनाकर दिखा रहीं आवाज का हुनर
अपना स्टूडियो बनाकर दिखा रहीं आवाज का हुनर

प्रतिध्वनि आर्ट स्टूडियो की शुरुआत
2019 में एक स्टार्टअप शुरू किया, जिसका नाम प्रतिध्वनि आर्ट स्टूडियो है। इसकी शुरुआत श्रीधर नागराज के साथ मिलकर की। यहां बतौर प्रोड्युसर काम करने की कोशिश कर रही हूं। कभी सोचा नहीं था कि आगे जाकर किसी कंपनी को चलाऊंगी, लेकिन ये सच देख रही हूं। हम लोग प्रोडक्शन हाउस के रूप में स्टेबलिश होने की कोशिश कर रहे हैं। इसी साल ‘जमुना पार का जासूस’ ऑडियो शो गाना डॉट कॉम पर रिलीज हुआ है। इसके अलावा स्टोरीटेल पर कई स्टोरीज को आवाज दी है। हमारे पास ऑडियो, विजुअल, म्युजिक का भी कंटेंट है। स्टुडियो के साथ-साथ फ्रीलांसिंग का काम भी करती हूं।
गलतियों से सीखें और आगे बढ़ें
आजकल ओटीटी प्लेटफॉर्म पर महिलाओं के लिए जिस तरह का कंटेंट सुनाई देता है वह ठीक नहीं है। उसमें उन्हें बहुत डाउनप्ले किया जाता है। इसलिए जो कंटेंट बनाने वाले लोग वे इस बात का ध्यान रखें कि हर महिला किसी के साथ हमबिस्तर होकर आगे नहीं बढ़ती। उनके अपने स्ट्रगल होते हैं। आगे जिसे भी वॉइस ओवर की दुनिया में आना है वे शौक से आएं, लेकिन इस बात का ध्यान रखें किसी भी प्रोफेशन में कोई शॉर्टकट नहीं होता। हर जगह मेहनत करनी पड़ती है। हम गलतियां भी करते हैं और उनसे सीखते हैं, आगे बढ़ते हैं।

खबरें और भी हैं...