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दूसरों के लिए मिसाल:मैंने पायल-बिछिया, बिंदी को अपनी पढ़ाई, आत्मविश्वास और तरक्की के आड़े नहीं आने दिया, आज करती हूं महिलाओं के हित के लिए काम

2 महीने पहलेलेखक: मीना

मांग में सिंदूर, माथे पर बिंदिया, पैरों में पायल-बिछिया और चेहरे पर लंबा सा घूंघट डाले स्त्री हमारे राजस्थान में अच्छी बहू मानी जाती है। मैं भी आदर्श बहू थी, लेकिन उस वजह से काम करने में चुनौतियां बहुत आतीं। घर और नौकरी दोनों संभालना, घूंघट डालकर फील्ड में निकलना, सजना-संवरना भी तो ये सोचकर कि पति के लिए कर रहे हैं...खुद की खुशियां क्या होती हैं, वो शायद जानती ही नहीं थी। जब इन बंधनों को तोड़ने की समझ बनी तो आदर्श बहू के सांचे में फिट नहीं बैठ पाई। ये शब्द हैं सेंटर फॉर माइक्रो फाइनेंस में महिलाओं की आजीविका के लिए काम करने वाली समाजसेविका हेमलता रावत के।

हेमलता रावत
हेमलता रावत

44 साल की हेमलता रावत ने भास्कर वुमन से बातचीत में कहा, ‘ऐसा नहीं है कि सिंदूर-बिंदी, बिछिया को मैं हमेशा से महिलाओं के लिए बंधन मानती थी, ये समझ विभिन्न संस्थाओं में काम करके और जेंडर की ट्रेनिंग लेकर बनी। मेरी परवरिश दिल्ली, मुंबई या चेन्नई जैसे महानगरों में नहीं हुई बल्कि राजस्थान के एक पिछड़े से गांव ‘कानुजा’ में हुई। 15 साल की थी तब शादी हो गई। गौना प्रथा के चलते मैं मायके में ही रही और दीदी ससुराल चली गई। मायके में रहकर ही 8वीं तक पढ़ाई की। उस समय गांव में 8वीं के बाद लड़कियों की शादी कर दी जाती थी, लेकिन हम पांच बहनों को मम्मी-पापा ने आगे भी पढ़ाया। गांव में 9-10वीं की पढ़ाई करने में मुझे बहुत दिक्कतें आईं। एक तो 20 लड़कों की क्लास में मैं अकेली लड़की हुआ करती थी। वो मुझे घूर-घूर कर देखते। हद तो तब हो गई जब लड़के मेरे बैग में प्रेम पत्र लिखकर डाल देते। कभी मेरी ज्योमेट्री में चिट्ठी और कभी किसी नोट्स में गंदे चित्र बनाकर मुझे भेज देते। जैसे-तैसे 10वीं पास की। आगे की पढ़ाई के लिए गांव में स्कूल नहीं था तो ससुराल आना पड़ा। रेत में घरौंदा बनाना, खुले खेतों में भागना, मस्ती करना, मस्तमौला लड़की ससुराल में घूंघट और गहनों में दबी बहू बन गई।

ससुरालियों ने कहा, पढ़-लिखकर क्या कलेक्टर बन जाएगी
पढ़ने लिखने में होशियार थी। पिताजी चाहते थे कि मैं कोई सरकारी नौकरी करूं, इसलिए टॉडगढ़ नहीं भेजा। टॉडगढ़ मेरा ससुराल है, ये अजमेर के पास एक गांव है। एक दिन ससुराल से चिट्ठी आई कि बहू को घर भेज दो। ससुर का एक्सीडेंट हो गया है। ससुर जी भी सीआरपीएफ में थे। दूसरी तरफ गांव में 10वीं तक ही स्कूल था। 11वीं की पढ़ाई के लिए गांव से 45 किलोमीटर दूर जाना था। रोज इतनी दूर जाना मुश्किल था। पिताजी ने ससुराल वालों को जवाब भेजा कि अभी हेमलता को नहीं भेज सकते हैं, क्योंकि उसकी पढ़ाई अधूरी है। तब ससुर जी नाराज हुए और रिश्ता खत्म करने की धमकी दी। बोले, ‘पढ़-लिखकर कलेक्टर नहीं बनेगी।’ यहां घर में काम करने वाला कोई नहीं है, उसे यहां भेज दो। ऐसे वक्त में हस्बैंड ने साथ दिया। उन्होंने कहा कि मेरा काम अजमेर में है। मैं वहीं इसे पढ़ा लूंगा। आप भेज दीजिए। इस वादे के साथ मेरे पति मुझे अजमेर ले आए। यहां वो पेंटिंग का काम करते और मैं पढ़ाई।

‘पढ़ाई और घर दोनों संभालना मुश्किल रहा’
11-12वीं पास करना मेरे लिए मुश्किल हो गया। ससुराल में रहती तो वहां किसी न किसी दिन रिश्तेदार आ जाते। उनकी खातिरदारी करनी पड़ती। पढ़ने का टाइम नहीं मिलता। होमवर्क पूरा नहीं होता। स्कूल में रोज डांट पड़ती। एक दिन परेशान होकर मम्मी के घर गई और पिताजी को कहा कि मैं या तो पढ़ सकती हूं या घर का संभाल सकती हूं। दोनों काम एक साथ नहीं कर सकती हूं। पिता ने ये शिकायत पति को बताई। उन्होंने मुझे अजमेर ही हॉस्टल में डाल दिया। यहां रहकर पढ़ाई पूरी की। ससुरालियों ने तब भी पढ़ाई का सपोर्ट नहीं किया और ससुर जी ने कहा, ‘हमारे यहां बहुएं पढ़ती नहीं हैं।’ घर में रोटियां बनाती हैं। तब मेरे पति ने मुझे पढ़ाया। राजस्थान में रहकर ही मैंने पॉलिटिकल साइंस और सोशियोलॉजी में एमए किया। बीए, बीएड भी किया और एमए इन एमएसडब्लू भी किया। मुझे नहीं लगता कि गांव में घूंघट डालकर पानी ले जाने वाली मेरी जैसी लड़की तीन-तीन एमए कर लेगी। बीए के बाद मुझे लगा कि पति की भी मदद करनी चाहिए। क्योंकि उनके काम से ज्यादा कमाई नहीं हो रही थी। उसी दरम्यान मेरे पापा के एक दोस्त का एनजीओ था, जिसमें मास्टर ट्रेनर की वेकेंसी निकली थी। वहां मेरा भी इंटरव्यु हुआ। मैं सिलेक्ट हो गई। वहां पर महिलाओं को ट्र्निंग देती कि उन्हें 5वीं तक के बच्चों को कैसे पढ़ाना है? चार साल यहां नौकरी की। इसके बाद अलग-अलग एनजीओ में काम करना शुरू किया। पहली नौकरी के 3500 रुपए मिले। उन्हें मैंने बहुत दिनों तक संहेजकर रखा। उनमें से एक भी नोट खर्च नहीं किया। वो केवल एक नौकरी नहीं थी, मेरे उड़ते पंखों को हवा थी। आज मैं टाटा ट्रस्ट एसोसिएट ऑर्गेनाइजेशन सेंटर फॉर माइक्रो फाइनेंस में महिलाओं की आजीविका के लिए काम करती हूं। यहां टीम लीडर हूं।

‘दूधमुंही बेटी को काम पर ले जाती थी साथ’
शादी के 10 साल बाद बेटी हुई। मेरा काम फील्ड का था। बेटी को हर जगह साथ नहीं ले जा सकती थी। लेकिन घर में उसकी देखभाल कौन करता? ये सोचकर उसे गाड़ी में बैठाकर अपने साथ ले जाती। रोज गांव से दूर फील्ड में जाना पड़ता था, इसलिए पति ने गाड़ी चलाना सिखा दिया, लेकिन राजस्थान में ‘गाड़ी वाली बहू’ बनने के अपने खामियाजे हैं। एक बहू घूंघट डालकर गाड़ी चला रही थी और उसका एक्सीडेंट हो गया। तीन महीने की बेटी को गाड़ी में ले जाती और फील्ड का काम करती। मेरा दूध आती नहीं था। साथ में जो दूध ले जाती वो गर्मी की वजह से खराब हो जाता। बेटी की शक्ल देखकर बहुत रोना आता। मायके में मम्मी से बात की तो उन्होंने कहा कि बेटी को कुछ दिन हमारे यहां छोड़ दो। बेटी कुछ दिन मां के पास तो कुछ दिन दीदी के पास रही। एक दिन काम से छुट्टी लेकर दीदी के घर गई, बेटी से मिलने के लिए तो उसने मुझे मौसी कहकर पुकारा। मैं रो पड़ी और उसे गले से लगा लिया। उस दिन बहुत दुख हुआ कि मेरी ही बेटी मुझे मौसी बुला रही है। तब बेटी को साथ ले आई।
जेंडर की समझ बनने पर आया टर्निंग प्वॉइंट
मेरी जिंदगी का टर्निंग प्वॉइंट 2017 में आया। जब मैंने ‘जागोरी’ से ट्रेनिंग ली। मेरे एनजीओ ने मुझे इस ट्रेनिंग के लिए भेजा। यहां जेंडर के मुद्दों को समझा। मेरे सिंदूर, बिंदी, बिछिया पहनने के पीछे की कहानी को समझा। घर का सारा काम और नौकरी मैं ही क्यों संभालूं?, ऐसे सवाल भी पनपे। समाज में किसी एक जेंडर को प्रिविलेज दूसरे का दोयम दर्जा क्यों? ये सवाल समझ आने लगे। ये ट्रेनिंग करीब दो साल की थी। पति को एक दिन कहा कि ये धुले हुए कपड़े ऊपर छत पर सुखाकर आ जाओ। वो बड़ी हैरानी से मेरी तरफ देख रहे थे। ‘मैं तुम्हारे कपड़े छत पर सुखाऊंगा तो आसपास के लोग मुझे देखकर क्या कहेंगे?’ मैंने उन्हें कहा कि आप अपनी पत्नी के कपड़े ऊपर सुखाने जा रहे हैं, किसी गैर के नहीं। एक दिन मैंने मांग में सिंदूर नहीं भरा, तो पति ने फिर पूछा कि सिंदूर क्यों नहीं लगाया? मैंने कहा, क्या मेरे सिंदूर न लगाने से आपका प्यार मेरे लिए कम हो जाएगा। मैं शादीशुदा हूं, इसकी निशानी ये सिंदूर, बिछिया है। आप शादीशुदा हैं, आपके पास ऐसी क्या निशानी है। तो मैं ही क्यों इन निशानियों को पहनकर निकलूं? धीरे-धीरे पति को समझाया और वे समझ भी गए। अब वे घर के सारे काम करवाते हैं। हालांकि वे पहले से ही बहुत सपोर्टिव रहे। मैं तो नौकरी की वजह से घर से दिन भर बाहर ही रहती हूं, घर और बेटी को वो ही संभालते हैं। आज बेटी की उम्र भी 17 साल हो गई है। वो भी मुझे अपना आइडियल मानती है। मुझे लगता है कि हम महिलाओं को समाज की तरफ से बनाए ये बंधन खुद ही तोड़ने होंगे। हमारी मुक्ति के लिए कोई और बात नहीं करेगा।

‘महिलाओं को करती हैं मोटिवेट’
ट्र्निंग से वापस आने के बाद मैंने घूंघट भी हटा दिया। अपनी सास से कहा कि मां जी जब मैं आपके सामने घूंघट करती हूं तो मुझे आपके लिए मां नहीं सास जैसी फीलिंग आती है। मैं आपकी बेटी बनकर रहना चाहती हूं, इसलिए घूंघट नहीं कर पाऊंगी। मैं रोज फील्ड मे जाती हूं और महिलाओं को उनके अधिकारों के लिए मोटिवेट करती हूं। एक वक्त था जब मैं खुद सिंदूर, बिंदी, बिछिया को अच्छा मानती थी, लेकिन आज जानती हूं कि ये बंधन का दूसरा रूप है। कई बार फील्ड में जब बिना सिंदूर के गई तो महिलाओं को लगा कि मैं विधवा हूं। उन महिलाओं को समझाया। आज राजस्थान में जिस संस्था के लिए काम करती हूं, वहां महिलाएं बिना घूंघट के आती हैं। अनपढ़ लड़कियां पढ़-लिख लीं हैं। मैं एक वक्त में घर से निकलने से भी डरती थी। आज मंच पर महिलाओं के हक में बोलती हूं। आज महिलाएं बिना दुपट्टे के आती हैं। बिंदास जीती हैं। मुझे लगता है कि मैं अपने खिलाफ इस गैरबरारी से लड़ पाई, क्योंकि मैं नौकरी कर रही थी। आर्थिक रूप से कमजोर नहीं थी। पढ़ाई के बाद पैरों पर खड़ा होना आप में आत्मविश्वास बढ़ाता है और आगे बढ़ने की हिम्मत देता है।

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