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यूनिवर्सिटी में पढ़ाती तो लोग कहते चरित्रहीन:कोर्ट में जीतने पर लोग बोले-ये तो फूलन देवी निकली, आज अन्याय के खिलाफ बांटती हूं पर्चे

नई दिल्लीएक महीने पहले

‘उम्र बेशक 79 साल है, पर भेदभाव, नफरत और हिंसा के खिलाफ आवाज बुलंद करने में से घबराती नहीं। सपना सिर्फ एक है ‘साझी दुनिया’, जहां सभी एक-दूसरे के साथ मिल जुल कर रहें और देश को आगे बढ़ाएं।’

लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति रूपरेखा वर्मा सहज लहजे में कहती हैं, ‘40 साल दर्शनशास्त्र पढ़ाने और इतनी उम्र होने के बाद मैं ये कह सकती हूं कि मैं आजादी के बाद बदलते भारत की गवाह हूं। जो हिंदुस्तान मेरी पैदाइश के वक्त और सुधरता हुआ आगे के जीवन में मिला था, वो अब नहीं है।

आजादी से पहले का भारत और अब का भारत दोनों देखा

पिता जी डॉक्टर थे। उन्होंने ब्रिटिश काल और आजाद भारत दोनों ही दौर में अपनी सेवाएं इस देश को दीं। 1947 में तो मैं सिर्फ 4 साल की थी। जब बड़ी हुई तो बंटवारे की कहानियां, दंश, कत्लेआम, दर्द और दुख देखते, सुनते बड़ी हुई। पर किसी व्यक्ति विशेष या समुदाय को लेकर मन में नफरत पैदा नहीं हुई। बल्कि ये भावना मजबूत हुई कि ये त्रासदी दोबारा कभी कहीं न हो।

लखनऊ में सड़क पर पर्चा बांटती लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति रूपरेखा वर्मा। इन पर्चों के माध्यम से वह 1857 की क्रांति के समय की एकता बनाए रखने की बात करती हैं।
लखनऊ में सड़क पर पर्चा बांटती लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति रूपरेखा वर्मा। इन पर्चों के माध्यम से वह 1857 की क्रांति के समय की एकता बनाए रखने की बात करती हैं।

घर में तार्किक बहस होती तो मैं भी इसमें खुलकर भाग लेती

इस समझ के पीछे कहीं न कहीं मेरी परवरिश थी। घर में समसायिक मुद्दों पर बहसें होती रहती थीं। इस माहौल में पलने-बढ़ने से तार्किक चेतना को बल मिला। पर ऐसा नहीं था कि मेरे परिवार में किसी तरह की रूढ़िवादी परंपराएं नहीं निभाईं जाती थीं।। परिवार आर्य समाजी था तो नियमित तौर पर हवन होता था और कुछ सनातनी परंपराएं भी निभाईं जातीं। थोड़ा-थोड़ा दोनों ही तरह के कर्मकांड बचपन से देखे।

घर से बाहर जाकर लड़कियों के लिए पढ़ने का रास्ता खुला

पिता जी सरकारी नौकरी में थे, इसलिए अलग-अलग शहरों में उनकी पोस्टिंग होती रहती। मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा में हुआ। पर मैं आज तक इटावा नहीं गई हूं। मैनपुरी में मैंने शुरुआती शिक्षा ली। उच्च शिक्षा के लिये लखनऊ मुझे और मेरी बहन को भेजा गया। उस शहर में पहली बार कोई लड़की बाहर होस्टल में रह कर पढ़ने भेजी गयी थी। लोगों ने कहा, लड़कियां "बिगड़" जाएंगी, जरूरत क्या थी बाहर भेजने की। लेकिन बाद में उन्हें विश्वास हो गया कि लड़कियां बिगड़ें, ये जरूरी नहीं।

मेरे परिवार में सभी भाई-बहन पढ़ने-लिखने में अच्छे थे। कई अपने क्लास में टॉप करते थे। हमारे घर में एक छोटी लाइब्रेरी हुआ करती थी। तब किताबें पढ़ने का जुनून हुआ करता था।

सिलेबस से अलग पढ़ाई ने बदली सोच

सिलेबस से अलग समाज को सोचने-समझने की मेरी जो समझ बनी, उसमें साहित्यिक और सामाजिक विषयों पर किताबों ने अहम योगदान दिया। लखनऊ विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र पढ़ने और साहित्य में रुचि की वजह से प्रगतिशील सोच पनपने लगी।

रिश्तों में उदारता समझ में आई

तब माहौल इतना तंग नहीं था। लोगों की धार्मिक भावनाएं इतनी जल्दी आहत नहीं होती थीं। मुझे बचपन का एक किस्सा याद है जब हमारे शहर में एक पंडित जी थे और बच्चे जैसे ही उनके सामने कृष्ण के बारे में कुछ कहते थे तो वे चिढ़ जाते थे। एक दिन पंडित जी ने बताया कि बच्चों को लगता है कि मैं कृष्ण के नाम से चिढ़ जाता हूं। दरअसल चिढ़ता नहीं हूं बल्कि नाटक करता हूं। कम से कम चिढ़ाने के बहाने ही सही पर कृष्ण का नाम तो बोलते हैं….

ऐसे ही हमारे यहां एक अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखने वाले अंकल हुआ करते थे। वे मेरे पिताजी के दोस्त थे। वो अहाते में खड़े होकर मेरे पिताजी को "पाजी", "बदमाश" कहते और हंसते थे। मुझे बड़ा डर लगता था। बुरा भी लगता था। लेकिन जब वो घर आते थे तो पिताजी और उनके बीच खूब दोस्ताना व्यवहार और हंसी-मजाक चलता था।

पढ़ाई पूरी करते ही मिल गई प्रोफेसरी

लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए करने के बाद मुझे फेलोशिप मिल गई और हर साल डिस्टिंक्शन आने से मुझे विश्वविद्यालय में पढ़ाने को मिल गया। तब मेरी उम्र मात्र 20 बरस थी। पढ़ाने के दौरान भी सामाजिक मुद्दों को लेकर मेरा काम चलता रहता।

समस्याएं तो तब भी बहुत थीं। शिक्षकों या सीनियर्स से बात करने में डर लगता था। लड़कियों के लिये अलग से शौचालय नहीं थे। महिला टीचर्स के लिए भी नहीं। कुछ जद्दोजहद के बाद एक शौचालय बनवाया गया लेकिन नाकाफी था। मेरी कोशिशों से 1997 में एक महिला अध्ययन संस्थान भी शुरू हुआ जिसमें महिला अध्ययन नाम से इंटर डिसिप्लिनरी विषय में एमए शुरू हुआ।

पिता का नाम ही नहीं, डॉक्यूमेंट्स में मां का नाम भी जुड़ने लगा

1998 में कार्यवाहक कुलपति बनने के बाद टीचर्स, विद्यार्थी और वहां काम करने वाले अन्य कर्मचारियों के दस्तावेजों में पिता के नाम के अलावा माता का नाम भी जोड़ने की रवायत शुरू की। विश्वविद्यालय में कुल 40 साल पढ़ाया। 2-3 साल बिना वेतन के महिला अध्ययन संस्थान सम्हाला। साथ ही, दार्शनिक अनुसंधान परिषद के अकादमिक परिसर को विकसित किया जिसमें एक पुस्तकालय खुला।

झूठे प्रचार के बावजूद अपने विचारों से डिगी नहीं

मेरे व्यक्तित्व को मजबूत बनाने में उन लोगों का योगदान रहा जो मेरे विचारों के प्रति बेहद असहनशील और प्रतिगामी थे। जो विवेकपूर्ण बहस से नहीं अपितु झगड़े-झंझट से निपटना चाहते थे। कुछ ऐसे लोग जो धर्म के नाम पर फसाद में यक़ीन रखते हैं, मेरे इर्द-गिर्द भी थे। इन लोगों ने मेरे विद्यार्थियों को भड़काने और मेरे चरित्र हनन से लेकर निराधार आरोपों में कोर्ट केस किए। मेरे बारे में गंदे आरोपों से भरी चिट्ठियां घर-घर भेजी गयीं। विश्वविद्यालय में मेरे काम में लगातार बाधाएं पहुंचायी गई। झूठे प्रचार किए गए।

साल- सवा साल का लंबा संघर्ष रहा और कोर्ट से ले कर समाज और विद्यार्थियों तक में मेरी जीत हुई। इससे मैं मजबूत बनी। समाज में प्रतिष्ठा भी मिली। तब उन्हीं लोगों ने कहा, "अरे, ये तो फूलन देवी निकली"। मैंने कहा कि ये जुमला मुझे स्वीकार्य है।

लंबे अरसे तक सवाल झेलती रही, शादी कब करोगी

हमारे समाज में लड़की की शादी को लेकर ऐसे गड़बड़ मानदंड हैं कि थोड़ी बढ़ी उम्र में भी कोई अपरिचित भी ये पूछने का अधिकार समझता है कि शादी कब करेंगी या क्यों नहीं की या क्यों नहीं ही पाई। मैं कहती "it is none of your business". साथ ही, कभी मैं किसी को पसंद नहीं आयी, कभी कोई मुझे पसंद नहीं आया।

साझी दुनिया नाम से संस्था बनाई 1980 के दशक के उत्तरार्ध में अकेले ही कुछ मुद्दों पर काम शुरू किया। फिर कुछ नागरिक जुड़े। दो तीन सालों बाद "नागरिक-धर्म-समाज" नाम की संस्था बनाई। फिर नाम बदल कर "साझी दुनिया" रखा। इस सपने के साथ कि हमारी दुनिया सामान से संवेदना तक में साझेपन से भरी-पूरी हो। उद्देश्य समतामूलक समाज बनाना रहा।

सरकार की नीतियों के विरोध में लोगों को संबोधित करतीं रूपरेखा वर्मा। कई प्रदर्शनों में वह हाथों में बैनर-पोस्टर लिए दिखती हैं।
सरकार की नीतियों के विरोध में लोगों को संबोधित करतीं रूपरेखा वर्मा। कई प्रदर्शनों में वह हाथों में बैनर-पोस्टर लिए दिखती हैं।

लोकतंत्र को लड़खड़ाते और ज्यादा तीखे स्वर में खड़ा होते देखा

अपने बचपन से ले कर प्रौढ़ होने तक मैंने गरीबी कम होते देखा। सार्वजनिक कल्याणकारी संस्थानों को बनते देखा। महिलाओं और दलितों की चुप्पी टूटते देखा। बीच-बीच में देश को लड़खड़ाते भी देखा, सरकारों को गलतियां और दमन करते भी देखा। लेकिन जनता का विरोध स्वर मजबूत होते भी देखा। पिछले कुछ समय के बदलाव निराश करने वाले हैं।

पर्चे बांटने की वायरल हुई वीडियो

अब से नहीं बल्कि कॉलेज के जमाने से सरकारों के खिलाफ, उनकी दमनकारी, भेदभाव करने वाली नीतियों के खिलाफ मैं बोलती रही हूं। गलियों में जाकर पर्चे बांटती रही हूं। इसी कड़ी में जब लखनऊ की ही एक सड़क पर खड़े होकर 1857 की क्रांति को लेकर पर्चे बांटे तो वह वीडियो वायरल हो गई।

पर्चे में बताया गया था कि 1857 के विद्रोह की जो पहली जीत हुई वो लखनऊ से हुई और यह जीत साझे काम की वजह से हुई। इन पर्चों से लोगों को बताया गया कि जब कोई लड़ाई संगठित होकर की जाती है तो जीत जनता की होती है।

समाज को संदेश

जाति, धर्म की नफरतों को छोड़कर जिंदगी की बाकी समस्याओं पर ध्यान दें। एक साथ खड़े होकर हाथ में हाथ लेकर अपनी समस्याओं के निदान के लिए काम करें। देश में गरीबी, महंगाई, बेरोजगार के लिए लामबंद हों। आपसी मतभेद छोड़ एक साथ आएं, तभी देश आगे बढ़ेगा।

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