IAS बनने का था सपना, पर हो गई शादी:15 साल घर संभालते हुए लिख दीं 11 किताबें, घरेलू महिलाओं को सिखाया कंप्यूटर

5 दिन पहलेलेखक: मीना

छोटी सी लड़की, बड़े से ख्वाब। 14 मई, 1963 को मध्यप्रदेश के नरसिंहगढ़ में पैदा हुई। पिता जज थे, तो उनके साथ-साथ हम सब भी छोटे-छोटे शहरों में जाते रहे।

वुमन भास्कर से खास बातचीत में साहित्यकार ममता तिवारी कहती हैं, उस समय टीवी था नहीं। कम उम्र से ही पापा की लाइब्रेरी से लाई हुई किताबों का चस्का लग गया। गुनाहों का देवता जैसी किताबें मैंने सातवीं क्लास में ही पढ़ ली थी।

बचपन से था पढ़ने का शौक
पूरा बांग्ला साहित्य पढ़ डाला। अमृता प्रीतम, प्रेमचंद, नई लेखकों में गीतांजलि को पढ़ती गई। जैसे-जैसे बड़ी होती गई, परिपक्वता के साथ पसंद भी बदलती चली गई। पढ़ते-पढ़ते लिखने की आदत पड़ती गई। पहले गद्य में लिखती थी, फिर पद्य में पढ़ने लगी। मेरे मन में सुकून पहुंचाने का सबसे बड़ा तरीका लिखना और पढ़ना रहा।

एमएससी मैंने कैमिस्ट्री में की। दो साल तक गर्ल्स कॉलेज में अध्यापन का काम किया। बहनों में सबसे छोटी थी तो पापा की इच्छा थी कि मैं आईएएस बनूं या पीएचडी करूं। तो उसी दिशा में तैयारी कर रही थी कि अचानक ही मेरी शादी तय हो गई और जॉब छोड़कर मैं भोपाल आ गई।

ईमानदारी से निभाई घर की जिम्मेदारी
15 साल ईमानदार पत्नी, बहू, मां का रोल निभाया। घर में कम्प्यूटर भी सीखती थी। पति की सरकारी नौकरी थी तो वे बाहर चले जाते थे। मैं ससुराल में पढ़ती-लिखती रहती और घर के काम करती रहती।

मेरे हसबैंड ने एक गरीब लड़के को पढ़ाया था। उसे इंजीनियर बनाया था। 1996 की बात होगी, उसके लिए एक कम्प्यूटर सेंटर बना दिया था। लेकिन लड़के ने परिवार वालों के साथ धोखा किया और वह वहां से चला गया।

जब मिली कम्प्यूटर संस्थान संभालने की जिम्मेदारी
तब मेरे देवर शिकागो से आए हुए थे। उन्होंने कहा कि भाभी कम्प्यूटर सेंटर अच्छे से संभाल लेंगी। इस तरह मुझे कम्प्यूटर संस्था की जिम्मेदारी सौंप दी गई। मैंने पहली बार गृहणियों के लिए कम्प्यूटर कोर्स शुरू किया। बाद में जरूरतमंद और दिव्यांग बच्चों को भी शामिल किया। यह सारा काम निशुल्क हो रहा था। इसी समय ‘समीरा’ नाम की पत्रिका में साहित्य संपादन किया।

अब तक काम को कई सम्मान मिल चुके हैं।
अब तक काम को कई सम्मान मिल चुके हैं।

पहली पुस्तक और फिर छपने का सिलसिला
जब मेरे बच्चे बाहर गए तो मेरी पहली पुस्तक ‘क्या कह रही है जिंदगी’ के नाम से निकली। सिलसिला फिर चलता रहा। अब तक मेरी 11 पुस्तकें निकल चुकी हैं। बीच में बच्चों के लिए ‘न्यू परवरिश’ नाम से अनाथ आश्रम भी खोला था, जहां 10 अनाथ बच्चे रहते थे।

लंबे समय तक उन बच्चों के लिए काम किया। फिर मेरे अपने बच्चों को मेरी जरूरत थी तब अनाथ आश्रम का काम रोक दिया। अपना काम शुरू किया। अब वे अनाथ बच्चे अपने गार्जियन के पास पढ़-लिख रहे हैं।

अब मैं पूरी तरह से लिखने में डूब गई हूं। समाज सेवा का मौका नहीं चूकती। घरेलू कामगार हों या जिन्हें भी मेरी जरूरत पड़ती है उनकी मदद करती हूं।

लेखन शैली में नए प्रयोग
लिखने में नए प्रयोग करती हूं जैसे आर्टिकल लिखते-लिखते कविता लिखना। दूरदर्शन, आकाशवाणी में कविता पाठ करना। काउंसलिंग का काम भी करती हूं। यूट्यूब पर भी काम शुरू किया है। मैं सभी में नए प्रयोग करना चाहती हूं।

किसी भी तरह से लिखना, पढ़ना और सोशल वर्क से जुड़ी रही हूं। हालांकि सोशल वर्क में लोगों ने मुझे ठगा भी बहुत है क्योंकि मैं जल्दी पिघल जाती हूं। बस यही मेरी जिंदगी है। तीनों बेटे अपने काम में लग गए हैं। बड़े बेटे की शादी हो गई है।

अब गर्व से कहती हूं- ये मैं हूं
मैं घर से ही लिखती हूं। कॉलम लिखती हूं। यूट्यूब पर काम डालती हूं। इंस्टाग्राम पर नज्म, कविताएं डालती हूं…ये मैं हूं ममता तिवारी।

ऐसा लगता है कि जिंदगी अभी मुझे और भी मौके देगी। तो मैं जिदंगी के लिए बहुत कुछ कहना चाहती हूं- ‘जिंदगी जी भर के पीया तुझे, अभी तक कुछ कुएं ऐसे भी हैं, जो तूने हमसे छुपा रखे हैं।’

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