मुस्लिम महिलाओं को बना रही 'मां':मेरा 3 बार अबॉर्शन हुआ, IVF से बचने वालों के लिए आयुर्वेद बना वरदान

2 महीने पहलेलेखक: मृत्युंजय

औरत के लिए बांझपन सबसे बड़ा अभिशाप समझा जाता है। मानो बच्चे जनना ही उनका एकमात्र काम हो। जो महिलाएं समाज की नजरों में ‘बांझ’ होती हैं, उनकी जिंदगी बड़ी कठिन हो जाती है। तीन बार अबॉर्शन झेल चुकी एक डॉक्टर ने महिलाओं के इस दर्द को समझा और अब वो आयुर्वेद के सहारे निस्संतानता को हराने की कोशिश कर रही हैं। उनकी कोशिशों से कितनी ही महिलाएं बिना आईवीएफ या महंगे इलाज के मां बन चुकी हैं।

आज के ‘ये मैं हूं’ में डॉ. चंचल शर्मा की कहानी जो ‘निस्संतानता भारत छोड़ो’ अभियान चला रही हैं।

बांझ महिलाओं की तकलीफ शुरू से खटकती थी

मेरी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई दिल्ली से हुई। बचपन में मैं अपने आस पास उन महिलाओं को देखा करती, जिसको शादी के 10-15 साल बाद भी बच्चे नहीं थे। साथ ही उनकी तकलीफ और उनके प्रति तिरस्कार की भावना भी देखती।

डॉ. चंचल शर्मा ने बचपन से ही 'बांझ' महिलाओं के दर्द को देखा और समझा। अब वो आयुर्वेद के सहारे इसे दूर करने की कोशिश कर रही हैं।
डॉ. चंचल शर्मा ने बचपन से ही 'बांझ' महिलाओं के दर्द को देखा और समझा। अब वो आयुर्वेद के सहारे इसे दूर करने की कोशिश कर रही हैं।

जब भी किसी महिला के लिए ‘बांझ’ शब्द इस्तेमाल किया जाता तो मुझे खटकता था। तब लोगों की तरह मैं भी इसे नसीब का खेल समझती थी। जिस पर हमारा कोई वश नहीं चलता। लेकिन बाद में मैंने जाना कि इस समस्या का इलाज किया जा सकता है और इसका नसीब या कर्मों से कोई लेना-देना नहीं।

खुद से ही मिली प्रेरणा, दादा जी से आयुर्वेद सीखा

बाद में मैंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से आयुर्वेद की पढ़ाई की। मेरे दादाजी आयुर्वेद पर खूब भरोसा करते थे। उनकी प्रेरणा से ही मैंने गुरु-शिष्य परंपरा से आयुर्वेद की पढ़ाई की। शादी के बाद मैं तीन बाद प्रेग्नेंट हुई लेकिन दुर्भाग्यवश तीनों बार अबॉर्शन हो गया।

बीते 10 सालों में सैकड़ों महिलाएं चंचल शर्मा के आयुर्वेदिक इलाज के बाद मां बन पाई हैं।
बीते 10 सालों में सैकड़ों महिलाएं चंचल शर्मा के आयुर्वेदिक इलाज के बाद मां बन पाई हैं।

एक बार तो साढ़े तीन महीने के बाद अबॉर्शन हुआ। जिसके बाद डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि आपका यूटरस बच्चे को एक्सेप्ट नहीं कर पा रहा। अब आपका मां बनना मुश्किल है। मुझे डोनर से आईवीएफ कराने की सलाह दी गई।

आयुर्वेद ने बनाया मां, अब उसी तकनीक से दूसरों की मदद कर रही

डॉक्टरों के हाथ खड़े करने के बाद मैंने आयुर्वेद का सहारा लिया। मुझे बताया गया कि पित्त दोष है। मैंने उसे दूर किया। पंच-कर्म जैसे और भी कई तरह के इलाज चले। जिसके बाद मैं आसानी से बिना कोई अंग्रेजी दवा खाए मां बन पाई।

डॉ. चंचल शर्मा को खुद भी मां बनने में परेशानी आई थी। जिसे उन्होंने आयुर्वेदिक तरीके से दूर किया।
डॉ. चंचल शर्मा को खुद भी मां बनने में परेशानी आई थी। जिसे उन्होंने आयुर्वेदिक तरीके से दूर किया।

मैं खुद उस दौर से गुजरी हूं, जहां मां बनना मुश्किल नजर आ रहा था। मुझे लगा कि निस्संतान महिलाओं के लिए मुझे कुछ करना चाहिए। ऐसे वक्त में मेरे पति ने मेरा खूब साथ दिया। उन्होंने कहा कि मां बनने के बाद जो खुशी तुम्हें मिली है और महिलाओं को भी मिलनी चाहिए। पढ़ाई के बाद मैंने आयुष मंत्रालय में नौकरी शुरू की थी। लेकिन प्रैक्टिस के लिए मैंने वो नौकरी छोड़ दी।

हर महीने मेरी 40 से 50 पेशेंट मां बनती हैं

हर महीने करीब 40 से 50 महिलाएं मेरे इलाज के बाद मां बन पाती हैं। इनमें से ज्यादातर शादी के 10 से 15 साल के बाद मां बन रही होती हैं। ये हर जगह से इलाज कराकर थकने के बाद मेरे पास आती हैं। मैंने आयुर्वेद से उनका इलाज करती हूं।

रिक्शेवाले से लेकर ऑस्ट्रेलिया और दुबई के मरीजों का इलाज

आज के वक्त में आईवीएफ से बच्चे करना हर किसी के लिए संभव नहीं है। इसका इलाज भी काफी महंगा होता है और सक्सेस रेट कम। लेकिन मैं जो इलाज करती हूं वो सबसे लिए सुलभ है। साथ ही इसका सक्सेस रेट भी ज्यादा है। मैंने एक रिक्शेवाली की पत्नी से लेकर ऑस्ट्रेलिया और दुबई तक की महिलाओं का आयुर्वेद से इलाज किया है। सब मां बन पाई हैं।

डॉ. चंचल शर्मा जिस विधि से निस्संतानता का इलाज करती हैं, वो काफी सस्ता है।
डॉ. चंचल शर्मा जिस विधि से निस्संतानता का इलाज करती हैं, वो काफी सस्ता है।

मेरे मरीजों में 40% मुस्लिम, आयुर्वेद से करा रहे इलाज

आम धारणा है कि आयुर्वेद से खाली हिंदू इलाज कराते हैं। लेकिन मेरी क्लीनिक पहुंचने वाले 40% से ज्यादा मरीज मुस्लिम होते हैं। जब वे महिलाएं मां बन जाती हैं तो मुझे और आयुर्वेद को शुक्रिया कहती हैं।

मुस्लिम समाज में आईवीएफ को सही नहीं मानते हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं आयुर्वेदिक तरीके से इलाज कराने मेरे पास आती हैं।

महिलाएं बच्चे को लेकर क्लीनिक आती हैं तो खुशी मिलती है

मैं पिछले 10 साल से ये काम कर रही हूं। इस बीच मेरे इलाज से जन्मे कई बच्चे बड़े हो गए हैं। कई बार हमलोग भूल जाते हैं, लेकिन हमारे मरीज अपनी इस अनमोल खुशी को हमारे साथ शेयर करते हैं। कई बार क्लीनिक में महिलाएं अपने बच्चे को लेकर आती हैं और बताती हैं कि ये आपसे इलाज कराने के बाद हुआ है। उस मां के चेहरे की खुशी को देखकर लगता है कि अब दुनिया में कुछ भी पाना बाकी नहीं। इसी वजह से मुझे ये काम इतना पसंद है।

चला रही हूं अभियान, देश भर में 4 क्लीनिक खोले

मैंने निस्संतान महिलाओं को मातृत्व सुख प्रदान करने के लिए एक अभियान की शुरु की है। जिसका नाम है “निस्संतानता भारत छोड़ो”। बचपन में मैंने ‘बांझ’ महिलाओं के तिरस्कार को देखा था। अब मेरा सपना है कि किसी भी महिला को ये तिरस्कार न झेलना पड़े। मैंने आशा आयुर्वेद के क्लीनिक देश भर में खाले हैं। आगे और भी जगहों पर इसे शुरू कर निस्संतान महिलाओं को सस्ता इलाज मुहैया कराना है।

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