डायन बोल मैला फेंका, कुल्हाड़ी से मारा, गांव से भगाया:मैं डरी नहीं, इस कुप्रथा के खिलाफ लड़ी, 125 से अधिक महिलाओं को बचाया

नई दिल्ली7 महीने पहलेलेखक: संजय सिन्हा

जब पिछले साल पद्म पुरस्कारों की घोषणा हुई तो एक नाम ऐसा था जिसने सबका ध्यान खींचा। एक ऐसी ‘शेरनी’ जिसने अपने बलबूते डायन बिसाही के खिलाफ लड़ाई लड़ी। जो खुद इस कुप्रथा की शिकार हुईं, यातनाएं सहीं, प्रताड़ना झेली, घर से बेघर हुईं, किसी तरह जान बचायी। लेकिन तब दृढ़ निश्चय लिया कि आगे से कोई भी महिला इसकी बलि न चढ़े। जो उसके साथ हुआ, वह दूसरों के साथ न हो।

डायन प्रथा के खिलाफ जंग जीतना आसान नहीं था। कई चुनौतियां थीं, अंधविश्वासों से लड़ना था। छुटनी देवी ने 25 वर्ष से अधिक समय से ये लड़ाई जारी रखी है। आज ये मैं हूं में पढ़िए ‘छुटनी देवी’ की कहानी उन्हीं की जुबानी।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से पद्मश्री अवार्ड लेतीं छुटनी देवी।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से पद्मश्री अवार्ड लेतीं छुटनी देवी।

मुझे पेड़ से बांध कर मारा-पीटा, किसी तरह जान बचाकर भागी

भास्कर वुमन से खास बातचीत में छुटनी देवी कहती हैं मैं झारखंड के सरायकेला-खरसांवा जिले की बीरबांस पंचायत के भोलाडीह गांव की रहनेवाली हूं। महज 12 साल की उम्र में मेरी शादी हो गई थी। ज्यादा पढ़-लिख नहीं पाई। ससुराल में आकर घर-परिवार संभाला। बच्चे हुए, उनके पालन-पोषण में लगी रही। लेकिन 5 सितंबर 1995 का दिन मेरे लिए काला दिन साबित हुआ। जब डायन होने का आरोप लगाकर गोतिया के लोगों ने मुझ पर अत्याचार किए।

पेड़ से बांध कर दो दिनों तक बेरहमी से मारा-पीटा। मुझ पर कुल्हाड़ी से हमला हुआ। कटे का निशान अब भी उसके चेहरे पर है। उनका षडयंत्र था कि मुझे जान से मार देना है। मारकर खरकई नदी में फेंक देंगे। गांव के ही एक बुजुर्ग भगवान टुडू ने कहा कि आपलोग गांव से भाग जाइए, नहीं तो गांव वाले मारने की साजिश रच रहे। तब हम वहां से भागे। मैं और बच्चे किसी तरह बच पाए।

ग्रामीणों को जागरूक करने पहुंचीं छुटनी देवी।
ग्रामीणों को जागरूक करने पहुंचीं छुटनी देवी।

एक महीने तक जंगल में रही

तब पति ने भी साथ नहीं दिया। जो गोतिया लोगों ने कहा वहीं पति ने किया। पति तब से ही अलग हो गए। गांव के लोगों का आरोप था कि पड़ोस की बच्ची उसके जादू-टोना करने से बीमार हुई है। लोग समझने को तैयार नहीं थे। मैं किसी तरह अपने चार बच्चों को लेकर गांव से भागी। तब पति धनंजय महतो ने भी साथ नहीं दिया। मैं जंगल में एक महीने तक एक झोपड़ी बनाकर रही। फिर किसी तरह आदित्यपुर अपने भाई के यहां पहुंची। वहां कुछ समय रही।

सम्मानित होने के बाद छुटनी देवी।
सम्मानित होने के बाद छुटनी देवी।

पश्चिम सिंहभूम के तत्कालीन डीसी ने मदद की

1995 में पश्चिम सिंहभूम के डिप्टी कमिश्नर थे अमित खरे। अमित खरे आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सलाहकार हैं। उन्होंने मुझ पर हुए अत्याचारों के बारे में जाना। तब डायन प्रथा के खिलाफ उन्होंने कड़े एक्शन लिए। एक पोस्टकार्ड पर कोई भी अपनी पहचान छिपाकर बता सकता था कि अमुक जगह पर डायन बिसाही का आरोप लगा लोग अत्याचार कर रहे हैं। सूचना मिलते ही कार्रवाई होती। इस तरह मैं भी इस कैंपेन से जुड़ती चली गई। इस काम में तत्कालीन एसडीओ निधि खरे ने भी मदद की।

पूर्व सीएम रघुवर दास ने भी किया था सम्मानित।
पूर्व सीएम रघुवर दास ने भी किया था सम्मानित।

जहां डायन बिसाही की खबर मिलती पहुंच जाती

जब भी डायन बिसाही की खबर मिलती है मैं अपनी टीम के साथ पहुंच जाती हूं। मैं एसोसिएशन फॉर सोशल एंड ह्यूमन अवेयरनेस (आशा) की ओर से संचालित पुनर्वास केंद्र चलाती हूं। जब भी मुझे कहीं से ऐसे मामलों की जानकारी मिलती है टीम के साथ पहुंचती हूं। आरोपी छूटें नहीं, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो, इसकी कोशिश करती हूं। इसी का परिणाम 125 से अधिक महिलाओं को डायन बिसाही से बचाया है।

छुटनी देवी।
छुटनी देवी।

पीड़िताओं को हौसला देती हूं कि घबराएं नहीं, हम साथ हैं

हम पीड़ित महिलाओं को हिम्मत देते हैं कि घबराएं नहीं, हमलोग आपके साथ हैं। जिला प्रशासन के पास जाते हैं। न्याय मांगते हैं। थाने जाते हैं वहां नहीं सुनते तो एसपी के पास जाते हैं। मानवाधिकार संगठनों के पास जाते हैं। इस तरह न्याय दिलवाते हैं। इस तरह 35 से 40 लोगों को जेल भी भेजा गया है। कई बार जेल जाने से पहले आरोपित कंप्रोमाइज भी कर लेते हैं। आरोपी बांड लिखकर देते हैं कि आगे से कभी किसी महिला पर डायन बिसाही का आरोप नहीं लगाएंगे।

सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन की ओर से की गईं सम्मानित।
सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन की ओर से की गईं सम्मानित।

पीड़ित महिलाओं को शरण देती हूं

डायन बिसाही से पीड़ित महिलाएं दूर-दूर से न्याय की आस में आती हैं। सरायकेला-खरसांवा, चाईबासा, चक्रधरपुर, जमशेदपुर, खूंटी, रांची आदि जिलों से महिलाएं आती हैं कि उन्हें बचाएं। छत्तीसगढ़, ओडिसा, बिहार से भी महिलाएं आती हैं और बताती हैं कि उनके साथ डायन बिसाही के नाम पर क्या गलत किया जा रहा है। तब मैं दृढ़ता से उनके साथ खड़ी होती हूं। आरोपितों के खिलाफ लड़ती हूं।

संस्था की ओर से दिया गया सम्मान।
संस्था की ओर से दिया गया सम्मान।

अभी हाल में सरायकेला की दो और चतरा जिले की एक महिला डायन बिसाही से पीड़ित होकर आईं। एक महिला की जमीन हड़पने के लिए उसके गोतिया के लोगों ने उसे डायन बताकर परेशान करना शुरू किया। सरायकेला की ही एक महिला पर उसकी गोतनी ने डायन होने का आरोप लगाया। उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू किया। चतरा जिले की पीड़िता भी पहुंची और बताया कि उसके ही चाचा ससुर के बेटे पुश्तैनी जमीन हड़पने के लिए उसे डायन बता रहे हैं। मैंने इन महिलाओं को शरण दिया। आरोपियों के खिलाफ आवाज बुलंद की।

पद्मश्री अवार्ड लेने जातीं छुटनी देवी।
पद्मश्री अवार्ड लेने जातीं छुटनी देवी।

ओझा-गुनी के पास नहीं, डॉक्टर के पास जाइए

मैं गांव-गांव लोगों को समझाती हूं। किसी का बैल, बकरी आदि पशु मर जाए तो ओझा-गुनी के चक्कर में मत पड़िए। किसी का बच्चा बीमार हो जाए तो डॉक्टर के पास जाइए, वहीं इलाज होगा। भूलकर भी ओझा के पास मत जाइए। अगर इनके चक्कर में पड़कर डायन कहकर किसी को प्रताड़ित करते हैं तो कानून अपना काम करेगा।

सुदूर जंगलों में भी बिना डर के पहुंचती

जब भी डायन बिसाही की खबर मिलती है मैं जंगलों के बीच बसे गांव में भी पहुंच जाती हूं। ये ऐसे इलाके हैं जहां पुलिस भी नहीं जाना चाहती। मैं पंचायत में, ग्राम सभा में सबको इकट्‌ठा करती हूं और समझाती हूं कि इस कुप्रथा से हमें क्यों बचना चाहिए। लोगों पर असर भी होता है। बताती हूं कि जिसे आप डायन कहते हैं अगर वह इतना ताकतवर है तो अपने ऊपर अत्याचार करने वालों को क्यों नहीं मार डालती। वो फिर प्रताड़ना क्यों झेलेगी? तब लोग कहते कि छुटनी जान पर खेलकर जागरूक कर रही है। इस निडरता की वजह से लोग मुझे 'शेरनी' कहने लगे।

पद्मश्री मिलने के बाद झारखंड ही नहीं, छत्तीसगढ़, ओडिसा, बिहार, पश्चिम बंगाल में छुटनी देवी लोकप्रिय हो गईं हैं।
पद्मश्री मिलने के बाद झारखंड ही नहीं, छत्तीसगढ़, ओडिसा, बिहार, पश्चिम बंगाल में छुटनी देवी लोकप्रिय हो गईं हैं।

पद्मश्री मिला तो नहीं जानती थी क्या होता है

जब मुझे पद्म श्री पुरस्कार मिलने की बात हुई तब नहीं जानती थी कि यह पुरस्कार क्या होता है? लेकिन जब सभी जगह से फोन आने लगे तब पता चला कि यह बड़ा पुरस्कार होता है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से पुरस्कार लेकर खुद को गौरवान्वित महसूस किया। जब पीएमओ में गई तो वहां तत्कालीन डीसी अमित खरे साहब मिले। उन्होंने घंटेभर बातचीत की। आगे महाराष्ट्र सरकार ने मुझे मुंबई में सम्मानित किया। फिर लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन ने मुझे बुलाया और डायन प्रथा के प्रति लड़ाई की कहानी को साझा किया।

चुप बैठने की जरूरत नहीं, लड़ना होगा

मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं। लेकिन एक इंसान के अधिकारों को समझती हूंं। यही कहना चाहती हूं कि अंधविश्वासों को न पनपने दें। इसके खिलाफ लड़ें। कोई किसी महिला पर डायन होने का आरोप लगाए तो चुप न बैठें। फौरन कानूनी कार्रवाई करें। इसके लिए कानून बना है। डायन होने का आरोप लगाकर प्रताड़ित करने पर तीन महीने की सजा और एक हजार रुपये जुर्माना का प्रावधान है। कोई डायन होने के नाम पर शारीरिक रूप से चोट पहुंचाता है तो छह माह की सजा और दो हजार रुपये जुर्माना तक का प्रावधान है। अपने अधिकारों को जानें।

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