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बिन संस्था समाज सेवा:‘हिजाब और बुर्का में भी लड़की स्कूल जा रही है तो सवाल न करें, यह सोचें, कम से कम वो स्कूल तो जा रही है’

एक महीने पहलेलेखक: मीना

बात 2020 की है। राजा राम मोहन राय, सीनियर सेकेंडरी गर्ल्स स्कूल, हौज रानी को को-एड किया जा रहा था, तब पेरेंट्स ने मुझे कहा कि हम तो अभी भी अपनी बेटियों को बुर्के में स्कूल भेजते हैं। अगर लड़का-लड़की एक साथ पढ़ेंगे तो हम उन्हें नहीं पढ़ा पाएंगे। ये मामला सामने आने पर मैंने स्कूल प्रशासन से बात की, बहस हुई। स्कूल वालों ने कहा, तबस्सुम आप खुद को-एड स्कूल में पढ़ीं, आप कैसे इसका विरोध कर रही हैं और लड़कियों के हिजाब में प्रवेश की बात कर रही हैं, जबकि आप जानती हैं कि स्कूल में हिजाब पहनकर नहीं आ सकतीं। तब मैंने उन्हें समझाया कि मुस्लिम लड़कियां अगर हिजाब या बुर्का पहनकर स्कूल आती हैं, तो उन्हें आने दीजिए। मुझे समझ नहीं आता कि आप ये क्यों मान लेते हैं कि हर मुस्लिम लड़की खुले लिबास में बाहर निकले। आपको ये क्यों नहीं समझ आता कि इस समुदाय में लड़कियों की शिक्षा पर अभी तक जोर नहीं दिया जाता था, लेकिन अब धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। अब लड़कियों ने पढ़ना शुरू किया है। ऐसे में वे लड़कियां जो अभी तक बिल्कुल नहीं पढ़ रही थीं, वे कम से कम अब कुछ तो पढ़ रही हैं। मेरी बात को प्रशासन ने समझा और स्कूल को-एड बनने से बच गया।’ ये बोल हैं दिल्ली की तबस्सुम फातिमा सिद्दिकी के।

तबस्सुम फातिमा सिद्दीकी
तबस्सुम फातिमा सिद्दीकी

भास्कर वुमन से बातचीत में तबस्सुम बताती हैं, ‘मैंने हमेशा लड़कियों की पढ़ाई पर जोर दिया। एक लड़की के लिए एजुकेशन का क्या महत्त्व है, ये मैं बहुत अच्छे से समझती हूं। अगर मेरे वालिद ने मुझे 12वीं तक नहीं पढ़ाया होता तो शायद आज मैं इतनी खुलकर कभी बाहर ही नहीं आ पाती। मुझे मेरी वालिदा की बचपन की सीख आज भी याद है । मैं प्राइवेट स्कूल में पढ़ती थी। हमारे यहां लड़कियों को ज्यादा पढ़ाते नहीं हैं, लेकिन मेरे वालिद ने मुझे पढ़ाया। तब मैं अपने आसपास की हमउम्र लड़कियों को ट्यूशन पढ़ाते देखती, तो मैंने भी अम्मी से कहा कि मैं भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाउंगी और पैसे कमाउंगी। इस पर अम्मी का जवाब था, हमारी सारी मेहनत पर तुमने पानी फेर दिया तबस्सुम। मैंने पूछा क्यों? उन्होंने कहा, हमने सोचा था कि तुम्हारा दाखिला इतनी मुश्किलों से स्कूल में हुआ है, बड़ी होगी तो आगे आने वाली बच्चियों की मदद करोगी, ताकि वो भी पढ़ पाएं और तुम पैसे कमाने की सोच रही हो।’ अम्मी की इस बात पर मैंने भी सोचा और फिर तभी से मन बना लिया कि आगे बच्चियों की मदद करनी है। जब मैं 12वीं में पहुंची तो मेरी वालिदा का इंतकाल हो गया। उस दिन 12वीं का एग्जाम था, वो मुझे छोड़ना पड़ा। वालिदा के जाने से मेरी दुनिया पूरी खाली हो गई, पढ़ाई रुक गई। कुछ समय बाद घर में शादी की बातें होने लगीं। फिर एक दिन दिल्ली में ही मेरी शादी कर दी गई। मन में इच्छा थी कि आगे पढ़ना है, वो शौहर ने सुन ली और ससुराल में आकर 12वीं पास की। इसके बाद बीए में दाखिला लिया, लेकिन जब तक सेकेंड यीअर तक पहुंची तब तक 2007 में बेटी हो गई, फिर बच्चा, घर का प्रेशर झेल नहीं पाई, और पढ़ाई छोड़ दी। अब वापस से बीए की पढ़ाई शुरू की है।

'डॉक्युमेंट्स पूरे न होने की वजह से नहीं पढ़ पातीं बेटियां'
मैंने शुरू से अपनी पढ़ाई को तव्वोज दी थी। जब मेरी पहली बेटी हुई और उसके बड़े होने पर जब मैं दाखिला कराने के लिए स्कूल गई तो वहां बहुत स्ट्रगल झेलना पड़ा। इसी बीच मैंने ईडब्लूएस कोटा के बारे में न्यूज सुनी। बेटी का दाखिला कराने स्कूल पहुंची तो उन्होंने इनकम सर्टिफिकेट मांगा और बहुत से ऐसे डॉक्युमेंट मांगे जो मेरे पास नहीं थे। फिर उन्हें बनवाया और बड़ी मुश्किलों में बेटी का दाखिला हुआ। बेटी के दाखिले की खुशी इतनी थी कि लग रहा था कि कोई जंग जीत ली हो। इस पहले दाखिले की प्रक्रिया के बाद मुझे समझ आया कि मेरी बेटी जैसी न जाने कितनी बेटियां हैं, जो पढ़ना चाहती हैं, लेकिन सिर्फ डॉक्युमेंट पूरे न होने की वजह से पढ़ नहीं पातीं। इसके बाद मैंने जिन लोगों को ईडब्लूएस कोटा के तहते मदद मिल सकती थी, उन सबसे संपर्क करना शुरू किया। सरकारी, प्राइवेट या केंद्रीय कोई भी स्कूल हो, किसी में भी अगर ईडब्लूएस वाले लोगों को दिक्कत आ रही थी, तो उनकी परेशानियों को हल किया।

बिना किसी संगठन के कर रहीं मदद
मुझे लगता है दाखिला की प्रक्रिया सबसे आसान होनी चाहिए, लेकिन उसे भी इतना कठिन बना दिया है कि पेरेंट्स को दाखिले के लिए अपनी चप्पलें तक घिसनी पड़ जाती हैं। पिछले 10 सालों से बच्चों का दाखिला स्कूल में करा रही हूं। अब मुझे अच्छे से समझ आ गया है कि ईडब्लूएस कोटा के तहत दाखिला दिलाना है तो पेरेंट्स के पास राशन कार्ड, जाति प्रमाण पत्र और इनकम सर्टिफिकेट होना चाहिए। जिन पेरेंट्स के पास ये डॉक्युमेंट नहीं होते हैं, मैं डॉक्युमेंट्स को बनवाने में उनकी मदद करती हूं। जब बच्चियों के पास डॉक्युमेंट्स ही नहीं होंगे तो वे पढ़ेंगी कैसे? इसलिए दिन रात मैं इन सबके लिए काम करती हूं। मेरा कोई संगठन नहीं है, ये सब काम खुद से करती हूं।

‘मुस्लिम समुदाय में नाम को लेकर आती है परेशानी’
मुस्लिम समुदाय को दाखिला कराने में सबसे बड़ी परेशानी नाम को लेकर आती है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं, जैसे किसी का नाम है उस्मान। तो इसे अंग्रेजी में osman, usman, yusman किसी भी तरह से लिखा जा सकता है। सरकारी कागजातों पर जब ऐसी गलतियां होती हैं, तब उन्हें दाखिला लेने में या किसी भी सरकारी योजना का लाभ लेने में दिक्कतें आती हैं। बहुत से बच्चों को डॉक्युमेंट में नाम की स्पेलिंग ठीक न होने की वजह स्कॉलरशिप तक नहीं मिल पाती। पढ़े-लिखे लोगों की गलतियों का खामियाजा गरीब और अनपढ़ों को उठाना पड़ता है। इन मामलों को लेकर बहुत बार डीएम और तहसीलदार तक से बहस हुई है।
जब मेरी बेटी का दाखिला हो रहा था तब इनकम सर्टिफिकेट बनवाने के लिए मैं महरौली तहसील में गई। वहां गई तो देखा कि बाहर ही ब्रोकर मिल गए। तब मैंने उन्हें कहा कि हमारा इनकम सर्टिफिकेट क्यों नहीं बन रहा है, आप हमें वो दिक्कत बताओ हम उसे पूरा करेंगे। उस दिन लक्ष्मी पब्लिक स्कूल में दाखिले की लास्ट डेट थी। कुछ समझ नहीं आया तो सीधे डीएम के दफ्तर में पहुंच गई और उनसे जाकर कहा, अब आप हमारे सर्टिफिकेट मत बनाइए, लास्ट डेट कल ही है। अब इनकम सर्टिफिकेट हमारे काम का नहीं हैं, आप उन्हें अपने पास ही रख लीजिए। गुस्से में तमतमाया मेरा चेहरा देखकर डीएम साहब ने मेरी बात को आराम से सुना और रात के 8 बजे तक सभी के इनकम सर्टिफिकेट बनवा दिए।

‘महिला समझ हल्के में लेता है प्रशासन’
अस्पतालों में ईडब्लूएस कोटा के तहत फ्री इलाज और दवाएं मिलती हैं, लेकिन लोगों को मालूम नहीं होता और अस्पताल प्रशासन भी दवाओं के पैसे उनसे लेता है। इस फर्जीवाड़े का भी मैंने भंडाफोड़ किया और विधायकों तक बात पहुंचाई। समाज को लगता है कि ये महिला है, इसकी बात कौन सुनेगा और हमें हल्के में ले लेते हैं। लेकिन अभी हाल की ही घटना है। सीबीएसई ने स्कूलों में फीस बढ़ा दी है, मैंने उस बढ़ी हुई फीस का विरोध किया। मैंने एसएमसी महिलाओं को एप्लीकेशन लिखकर दी (अल्लाह का शुक्र है, ये लोग मुझसे ही सलाह लेते हैं)। प्रिंसिपल ने एप्लीकेशन आगे भेजी। फिर मैंने उसी एप्लीकेशन को विधायक जी (सोमनाथ भारती) के पास भेजा। विधायक जी वो हां, जी हां, जी कहते रहे और ताव में आकर बोले कि आप मनीष सिसोदिया जी के पास जाइए, मैं भी जाता हूं। विधायक जी को लगा कि मैं महिला हूं तो मनीष जी के पास नहीं जाउंगी, लेकिन मैंने भी महिलाओं को जमा किया और सुबह मनीष जी के ऑफिस पहुंच गई। ऐसे कई काम किए हैं जहां जाने से डरती नहीं हूं, मुझे बस लोगों की मदद करने का जुनून है।

‘आप’ ने बनाया कार्यकर्ता
अभी तक मैंने अपना कोई संगठन नहीं बनाया था, लेकिन मेरी सक्रियता को देखते हुए आम आदमी पार्टी ने मुझे अपना कार्यकर्ता बना लिया है। अब मैं देश की बात फाउंडेशन, तेलंगाना की सेंटर कॉर्डिनेटर भी हूं। मैं दिल्ली माइनॉरिटी कमिशन में थी, किसान एकता संघ में दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष रही, राष्ट्रीय मजदूर किसान मंच में दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष रही और पीस कमेटी की मेंबर भी हूं। महिलाओं की स्किल्स पर भी काम करती हूं। इसके अलावा कोरोना वॉरियर का अवॉर्ड भी मिला। अब मुझे लगता है कि हर लड़की को अपनी पढ़ाई पर ध्यान लगाना चाहिए। हां, यह सच है कि स्कूल के समय की उम्र आशिकी की भी होती है, पर लड़कियों को पढ़ाई और करिअर पर पहले ध्यान देना चाहिए बाद में आशिकी पर। तभी उनकी पर्सनैलिटी निखरेगी और अपनी पहचान बनेगी।

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