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जाति की जकड़न तोड़कर चमकी:किसी ने साथ खाना नहीं खाया तो किसी ने कहा- दलित पढ़ नहीं सकते तो पढ़ाएंगे क्या, आज जीत चुकी हूं टीचिंग के कई अवॉर्ड

2 महीने पहलेलेखक: मीना

‘कहने को लोग आज ये बेशक कहें हैं कि आज का दलित अब दलित कहां रह गया है। अब तो मर्सिडीज में घूमता है। ब्रांडिड कपड़े पहनता है।’ लेकिन क्या ऐसा कहने वाले लोग दलितों को हमेशा गरीब ही देखना चाहते हैं? आप आज भी किसी दलित परिवार की कहानी सुन लीजिए, उनकी कहानी में दुख और सताए हुए की मात्रा ज्यादा होगी। अगर मैं अपनी ही बात करूं तो बचपन में बहुत कम दिन ही ऐसे गए, जब भरपेट खाने को मिला। घर में भाई-बहनों में पांचवें नंबर पर थी। कहने को महानगर दिल्ली में रहती, लेकिन पिता जी टेलर और मां घर में लिफाफे बनाकर हमारा पेट भरते। भाई को पढ़ाने के लिए घर के बर्तन बेच दिए तो मेरे पास स्कूल जाने के लिए यूनिफॉर्म नहीं होती। कई बार चप्पल पहनकर स्कूल जाती। एक दिन टीचर ने वो चप्पलें उतरवा दीं, क्योंकि स्कूल में शूज अलाउड थे। फिर नंगे पैर स्कूल जाने लगी। कॉपी भर जाती तो पेंसिल से लिखा हुआ फिर से मिटाती और उसी में लिखती। बस्ता नहीं होता तो घर के किसी पुराने कपड़े से बैग बना लेती। दलित होना क्या होता है ये लोगों की जातिसूचक गालियों से समझ आया। ये आपबीती है लेखिका, शिक्षिका और समाजसेविका अनिता भारती की।

अनिता भारती
अनिता भारती

लिफाफे बनाकर काटे दिन’
भास्कर वुमन से बातचीत में अनिता भारती कहती हैं, ‘साल 1965 में मेरा जन्म दिल्ली के सीलमपुर हुआ। रहने को बहुत अच्छा घर भी नहीं था। खाने को नहीं था, लेकिन कुछ था तो पढ़ने का जुनून। माता-पिता भी पढ़ना चाहते थे, लेकिन वो नहीं पढ़ पाए, इसलिए हम बच्चों को पढ़ाने का पूरा प्रयास किया। बचपन के वो दिन बाकियों के लिए गुड़ियां-गुड्डों से खेलने के होते, हमारे लिए पेट भरने की जोड़तोड़ में ही निकल जाते। मैं स्कूल जाती, वहां से आकर लिफाफे बनवाती। शाम को फिर पढ़ने बैठ जाती, घर में बिजली नहीं होती तो मोमबत्ती जलाकर पढ़ती। ये मालूम था कि हमारी मुक्ति पढ़ाई से ही है। खूब पढ़ती और हर कक्षा में फर्स्ट या सेकेंड आती। पढ़ने में अव्वल थी, लेकिन जाति कहीं नहीं छूट रही थी। एक बार 9वीं क्लास में जातिसूचक गालियां भी सुनीं। क्लास में किसी भी बच्चे से कोई भी गलती होती तो दलितों को टारगेट करके गालियां दी जातीं। खुद पर शर्म आने लगती, स्कूल जाने का मन नहीं करता, लेकिन पापा समझाते। पढ़ाई से ही तुम आगे बढ़ पाओगी और इस अन्याय का विरोध कर पाओगी। इसलिए पढ़ाई मत रोको। भारी मन का बस्ता उठाते हुए फिर स्कूल जाती। 12वीं तक की पढ़ाई सरकारी स्कूल से ही बड़ी मुश्किलों में की।

उधार लेकर भरी कॉलेज की फीस
जब कॉलेज में दाखिले की बारी आई, परिवार तब भी आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। पिता जी ने कहीं से पैसे अरेंज किए और मेरा दाखिला बीए (हिंदी ऑनर्स) में करवाया। मैं पढ़ने में तेज थी। माता-सुंदरी कॉलेज में मेरा नाम लिस्ट में सबसे ऊपर था। घर में सब बहुत खुश हुए। जाति का पीछा कहीं नहीं छूटा। जब कॉलेज में आई तो स्टूडेंट्स पॉलिटिक्स से जुड़ी। अब यह सोचा कि बराबरी की बात करनी है। यही वजह थी कि हम उभरते हुए नौजवानों ने मिलकर दलित छात्रों का एक संगठन ‘मुक्ति’ बनाया। इस संगठन की बदौलत हम दलित छात्रों के राइट्स के लिए काम करते। अपनी मांगों को मनवाने के लिए आमरण अनशन तक करते। कॉलेज के दौरान ही एक स्कूल खोला। मेरा घर शंकरनगर में था और हमने ये स्कूल कांतिनगर में खोला। वहां झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों को पढ़ाते। इसमें करीब 100 बच्चे जुड़े, लेकिन इसे आगे नहीं बढ़ा पाए। अब तक अंबेडकर, ज्योतिबा फुले, लक्ष्मण गायकवाड़ जैसे लेखकों को भी पढ़ने लगी। दिल्ली विश्वविद्यालय से ही एमए हिंदी किया तब भी फीस भरने के लिए पैसे उधार लिए थे। दलित मुद्दों को लेकर समझ अब पैनी होनी लगी थी। जाति के कारण बहुत गैरबराबरी झेली, इसलिए अब उनके अधिकारों के लिए खुलकर बात भी कर पाई।
‘मेरी जाति को लेकर दोस्तों का नजरिया अलग था’
मुझे याद है जब मैंने बीए के बाद बीएड किया तब हिंदी भाषी और दलित दोनों का भेदभाव झेला। दलितों को नंबर कम दिए जाते, उनके साथ टीचर का व्यवहार अलग होता। मेरी एक बहुत अच्छी दोस्ती थी, उसे जब मालूम हुआ कि मैं एससी कम्युनिटी से हूं, तो बोली, ‘तुम एससी लगती नहीं हो।’ मैं मंचों पर बोलती, धरनों में जाती, बहुत एक्टिव थी। शायद इसलिए मेरी दोस्त का नजरिया मेरी जाति को लेकर अलग था। दोस्तों से लेकर टीचिंग प्रोफेशन में भी गैरबराबरी की कोई कमी नहीं हुई। टीचिंग प्रैक्टिस के दौरान मुझे बहुत लोअर ग्रेड दिया गया, जब मेरा दोबारा मूल्यांकन हुआ तो बहुत अच्छे ग्रेड मिले। लोगों के बीच एक धारणा बनी हुई है कि दलित किसी का कचरा साफ करता है, तो वो अच्छा पढ़ कैसे सकता है और अच्छा पढ़ा कैसे सकता है? मैं इन धारणाओं को तोड़ रही थी। कम ग्रेड देकर वो मेरे आत्मविश्वास को तोड़ना चाहते थे, लेकिन मेरी मेहनत ने ऐसा होने नहीं दिया।
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आगे मैं एक थियेटर ग्रुप ‘अलाटिपु’ से जुड़ी। यहां से दलित और महिला मुद्दों को लेकर लोगों को जागरूक किया। बस्ती में जाकर शो करते और बेटियों की पढ़ाई पर जोर देते। इसके बाद कई महिला महिला संगठनों से भी जुड़ी और फिर समझ और पैनी हुई। इसके बाद 1992 में मैं टीचिंग प्रोफेशन में आई। यहां आकर 1994 में बेस्ट टीचर के लिए राधा कृष्णन अवॉर्ड मिला। सरकारी स्कूल पीजीटी के पद पर रहते हुए मुझे 2007 में इंदिरा अवॉर्ड और 2008 में स्टेट टीचर अवॉर्ड मिला। ये अवॉर्ड उन लोगों के लिए आईना थे जो ये मानते थे कि दलितों के पास ‘बुद्धि’ नहीं होती।

लेखन के जरिए उभारे दलित स्त्री के मुद्दे
मैंने महसूस किया कि देश में तमाम आंदोलन हो रहे हैं, लेकिन दलित महिला मुद्दों पर कोई बात नहीं कर रहा है। तब मैंने 2003 में दलित स्त्रियों के लिए लेखन शुरू किया। 2003 से लेकर 2012 तक लगातार लेखन किया। कई किताबें लिखीं। मुझे खुशी है कि ‘समकालीन नारीवादी और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ मेरी किताब भारत की पहली किताब है जो हिंदी में दलित नारीवाद पर लिखी गई है। ये किताब उस वक्त 2012 में बीबीसी की मुख्य 10 किताबों में चुनी गई। लोगों ने इस किताब को बहुत पसंद किया। इसके बाद मेरे लिखने की धारा रुकी नहीं और कहानी संग्रह , कविता संग्रह भी आए। दलित स्त्रियों पर तीन किताबें सहसंपादित कीं। दलित स्त्री जीवन से जुड़ी कहानियां, कविताएं, आलोचनाएं तीन किताबें एक के बाद एक सीरीज में लाई। इसका उद्देश्य यह था कि दलित महिलाओं के मुद्दों को फोकस में लाना।

‘आज हैं स्कूल प्रमुख’
लेखन के साथ-साथ एक्टिविज्म भी चल रहा था। हरियाणा के भगाना में चार बच्चियों के साथ रेप हुआ, उस कांड में न्याय की मांग के लिए जंतर मंतर पर भी बैठी। लगातार तीन साल मैं उनके साथ जुड़ी रही। दलित महिलाओं के खिलाफ जो भी अन्याय होते हैं, उनके खिलाफ खड़ी होती हूं। आज रूप नगर नंबर 1 स्कूल में वाइस प्रिंसिपल हूं। सरकारी स्कूलों में कमजोर तबकों से बच्चे आते हैं, तो कोशिश करती हूं कि उनकी मदद कर सकूं। जिस स्कूल में मैं पहले थी वहां भी एक प्रिंसिपल ने कहा कि मैं तुम्हारे साथ खाना नहीं खाऊंगी। उनकी ये बात सुनकर मुझे हैरानी इसलिए भी ज्यादा हुई कि ये एक पढ़ी-लिखी शिक्षिका हैं, और इस तरह की गैरबराबरी में विश्वास रखती हैं। ऐसे शिक्षक बच्चों को क्या बराबरी सिखाएंगे। एक शिक्षिका होने के बावजूद मुझे बातें सुननी पड़ जाती हैं। अगर आज भी मैं स्कूल में किसी सफाई कर्मी का पक्ष ले लूं तो मुझे कहा जाता है कि हम आपको नहीं कह रहे हैं। इस तरह की हिकारत देखकर किसका मन खट्टा नहीं होगा?

मैं गैरबराबरी में बुने इस सामाजिक तानेबाने के बीच भी आगे बढ़ती रही। साल 1992 मैं मैंने इंटरकास्ट मैरिज की। पति के साथ मिलकर सेंटर फॉर अल्टरनेटिव दलित मीडिया ‘कदम’ की शुरुआत की। उसमें हम लोगों ने दलितों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ प्रदर्शन, सभा-सम्मेलन सब करते थे। आज दलित लेखक संघ की अध्यक्ष भी हूं। इसके सहारे हम कोशिश करते हैं कि दलितों का लेखन और उनके मुद्दे लोगों के सामने आते रहें।

मुझे लगता है कि मैं अपनी मेहनत और परिवार के सपोर्ट से आगे बढ़ पाई हूं। आज सरकारी स्कूल में पढ़ाती हूं तो कोशिश करती हूं कि यहां के बच्चों को आर्थिक, सामाजिक गैरबराबरी न झेलनी पड़े। अपने बच्चों में बराबरी के मूल्य भर सकूं, ये मेरी कोशिश है। आगे मेरी कोशिश यही है कि दलितों के साथ होने वाले अत्याचारों के खिलाफ हमेशा लड़ती रहूं। उनके हक की मांग करती रहूं। अगर हम महिलाएं हैं तो हमें दूसरों की मुक्ति के लिए भी काम करना है। कोई किसी भी कास्ट, क्लास, पंथ का हो.. सभी की बराबरी और मुक्ति की बात करनी होगी। तभी हम एक बेहतर इंसान कहलाएंगे। आपको जो करना है, उसे बिना डरे करें। एकजुट होकर रहें और इस तरह ही एक सभ्य समाज की रचना हो पाएगी।

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