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मेरी जिद:मां की जिंदगी देख पुरुषों से हुई चिढ़, नौकरी की शर्त पर की शादी,आज 50 हजार महिलाओं को कर रही सशक्त

7 दिन पहलेलेखक: मीना

मां पांचवी में पढ़ रही थीं कि तभी उनके लिए उनसे 13 साल बड़े लड़के का रिश्ता आया और उनके साथ उनकी शहनाई बजवा दी गई। अब्बू सरकारी नौकरी में थे। अम्मी की दुनिया अभी खिली ही थी कि बहुत कम उम्र में अब्बू कैंसर का शिकार हो गए और हम दो बहनें, एक भाई की दुनिया वीरान हो गई। तब मैं सात-आठ साल की रही होंगी। 26 साल की उम्र में मां विधवा हुईं। मां के अकेले होने पर समझ आया कि अकेली के हक, आजादी, निजता उसकी नहीं रहती...वो सार्वजनिक प्रॉपर्टी हो जाती है। पर मां ने अपने लिए रास्ते बनाए। खूब मेहनत की और अनुकंपा नियुक्ति मिली। वो भी पापा की जगह पर। मां का संघर्ष देखकर लगा कि पढ़ाई और अपने पैरों पर खड़ा होना दोनों बहुत जरूरी हैं। ये सोच बचपन से ही घर कर गई। ये दास्तान है तमाम विश्वविद्यालयों से पांच विषयों में एमए करने वाली भोपाल की सोशल वर्कर शादमा खान की।

समाज सेवा करते-करते जिंदगी को जीना सीखा
समाज सेवा करते-करते जिंदगी को जीना सीखा

भोपाल से 60 किलोमीटर दूर बसे कांकड़ खेड़ा गांव में जन्मीं शादमा भास्कर वुमन से बातचीत में कहती हैं, ‘मम्मी ने नौकरी करके हम बच्चों को पढ़ाया। आठ साल की उम्र में समझ गई थी कि सेक्सुअल हरासमेंट क्या होता है और समाज अकेली महिला के साथ कैसे बिहेव करता है? मां रिश्तेदारों के साथ भी सख्त हो गईं, तय समय के बाद कोई घर नहीं आ सकता था। हम बच्चों को भी हिदायत थी कि कोई भी घर आए तो उनके साथ नहीं जाओगे मेरे साथ ही बैठोगी। ऐसी ही जिंदगी के बीच हाई सेकेंडरी की।
‘मुझे शादी नहीं करनी थी’
इस समय तक मैं ये तय कर चुकी थी कि मुझे खूब पढ़ना है और शादी नहीं करनी। शादी न करने का फैसला इसलिए लिया क्योंकि बचपन से मैंने जिस तरह का पुरुष देखा उससे लगा कि शादी कर भी ली तो अपने हस्बैंड की इज्जत नहीं कर पाऊंगी। मुझे सेक्स शब्द और आत्मीयता से चिढ़ हो गई थी। मां ने दूसरी शादी भी की, लेकिन वो सक्सेफुल नहीं रही। उनकी एक बेटी भी हुई। जब उम्र 25 साल हुई तो शादी के लिए दबाव बनाया जाने लगा। मैंने जिद की, तो मां ने कहा कि अगर तुम शादी नहीं करोगी हम छोटी बेटी की भी शादी नहीं करेंगे। न न करते-करते भी शादी करनी पड़ी।
‘पति से तय कर लिया था कि आगे भी नौकरी करूंगी’
जिससे निकाह हो रहा था उससे तय कर लिया था कि मैं आगे भी नौकरी करूंगी और पढ़ाई नहीं छोड़ूंगी। मेरी शर्त मान ली गई। शादी हुई। ससुराल बहुत कंजरेटिव मिला। 1995 में मैं फैमिली प्लानिंग में जॉब करती थी। चार साल बाद बेटा हुआ जो डिसएबल पैदा हुआ। उसके दिमाग में जॉइंडिस चढ़ गया जिसके कारण फिजिकल एक्टिविटी देने का मेसेज लेट पहुंचता है। मां तो सब बनते हैं, लेकिन मैं पहली बार बनी थी। ऐसा मैं इसलिए कह रही हूं क्योंकि मुझे लगता है जो चीजें सभी को बहुत आसानी से मिल जाती हैं। वो मुझे बहुत मुश्किलों से मिलीं। पति के सपोर्ट से जिंदगी आगे बढ़ती रही और बच्चा भी संभालते रहे।

महिला स्वास्थ्य पर लंबे समय तक काम कर चुकी हैं शादमा
महिला स्वास्थ्य पर लंबे समय तक काम कर चुकी हैं शादमा

‘पांच बार एमए किया, लेकिन पीएचडी नहीं कर पाई’
मैंने इकनॉमिक्स, सोश्योलॉजी, एमएड, हिंदी और सोशल वर्क में एमए किया। पांच अलग-अलग विषयों में एमए करने के बाद फिर पीएचडी का रजिस्ट्रेशन कर लिया, लेकिन मन खराब हुआ तो उसे छोड़ दिया। उस समय बड़ा विचित्र परिस्थितियां थीं। मैंने 1992 में एमए किया फिर बीएड किया। इसके बाद स्टे की राजनीति चलती रही। व्यावसायिक परीक्षा मंडल के शिक्षक के कई एग्जाम पास कर चुकी हूं। 1994 में फैमिली प्लानिंग एसोसिएशन का बड़ा प्रोजेक्ट मिला, लेकिन मुझे कुछ अलग करना था सिर्फ दफ्तर में नहीं बैठना था, इसलिए एनजीओ सेक्टर ही मेरे लिए रोजी रोटी बना।
‘बेटे से शनिवार-इतवार मिल पाती’
इस सबके बीच जिंदगी को चलाने के लिए कई संघर्ष करने पड़े। बेटे के चार ऑपरेशन हुए। मेरा बच्चेदानी का ऑपरेशन हुआ और इसके बाद पांच साल जब भोपाल में रही तो फैमिली के साथ नौकरी चलती रही। उसके बाद मुझे पड़ोस के जिले में शिफ्ट होना पड़ा जिस वजह से बेटे से शनिवार-इतवार मिल पाती।
‘पति ने बच्चे के लिए छोड़ी नौकरी’
इसी बीच बाई की गलती से बेटे का एक और एक्सीडेंट हो गया जिससे उसका बोन फ्रैक्चर हो गया। अब घर में हंगामा हो गया और मुझे कहा जाने लगा कि बहुत हो गई नौकरी अब घर संभालो। बच्चे को बाई के भरोसे नहीं छोड़ना, लेकिन पति ने तब भी सपोर्ट किया। हस्बैंड उस समय मुझसे कम सैलरी पाते थे, हमारे लिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी। इस बीच में दफ्तर से बीच-बीच में घर आ जाया करती थी।

शादमा के पति और बेटा
शादमा के पति और बेटा

‘दो महीने का बेटा लेकर घर से 125 km दूर नौकरी की’
जब मैं सेकेंड टाइम प्रेग्नेंट हुई और दूसरे बच्चे को जन्म दिया। जब वो दो महीने का था तब मुझे घर से सवा सौ किलोमीटर दूर रायसेन जिले में नौकरी मिली। अब मैं अप डाउन नहीं कर सकती थी। इसी नवजात को लेकर ढाई साल तक रायसेन में काम किया और बीच-बीच में भोपाल परिवार से मिलने भी आती रही।
मेरा बड़ा बेटा मेरी बहन के पास रहा। इसके बाद भोपाल में कुछ महीने काम भी किया लेकिन एक बड़ा प्रोजेक्ट मिला तो वो घर से चार सौ किलोमीटर दूर था। दोनों बच्चे बहन के पास छोड़े और उस प्रोजेक्ट के साथ साढ़े चार साल बहुत लगन से काम किया मेरी मेहनत की वजह से मुझे हार्ड वर्किंग ऑफ दि ईयर का अवॉर्ड भी मिला है।
जब मेरी मां का इंतकाल हुआ तो छोटी बहन अकेली रह गई। उसकी शादी भी आनन-फानन में करनी पड़ी। अब मेरे लिए भोपाल से दूर रह कर नौकरी करना मुश्किल हो गया। इसी बीच ससुर जी भी नहीं रहे जिनसे हौंसला मिलता था
‘ससुर जी के जाने के बाद मैं अकेली पड़ गई’
वो मेरा काम, मेरी मेहनत समझते थे। वो मुझे मोटिवेट करते। भोपाल में साढ़े आठ साल नौकरी करने के बाद 2018 में उसे छोड़ दिया। क्योंकि उस कमाई से गुजारा भत्ता नहीं चल रहा था। 2020 में लॉकडाउन लग गया। अब जिंदगी वापस उसी जगह आ गई जहां से चले थे। भोपाल में आफिस जॉब करके घर तो चल रहा था लेकिन कहीं कुछ खालीपन सा था।
बड़ा बेटा 21 साल और छोटा 18 साल का है। अब बच्चे समझदार हो गए हैं। उन्हें दिखता है कि सबकी मम्मी उनके बच्चों के पास रहती हैं, लेकिन हमारी मां नहीं रहतीं। बच्चे मुझसे कहने लगे कि मां अब नौकरी मत करो, लेकिन उन्हें भी समझाया और भोपाल से साढ़े तीन सौ किलोमीटर दूर में यूएनएफपीए सपोर्टिड प्रोग्राम में कंसल्टेंट काउंसलर छतरपुर में काम किया। अभी हाल ही में बिहार के मुज्जफरनगर में आगा खान फाउंडेशन की परियोजना के माध्यम से 50 हजार महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए काम कर रही हूं ।

जिंदगी को अपने हिसाब से जीएं
जिंदगी को अपने हिसाब से जीएं

‘मुश्किल वक्त में हार न मानें’
मां के पास जमीन-जायदाद सब थी लेकिन तब भी उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा, तभी से तय कर लिया था कि अपने पैरों पर खड़ा होना है। यही वजह रही कि मैंने कभी नौकरी नहीं छोड़ी। अपना काम अपना पैसा अपना होता है। जब ये दो चीजें किसी महिला के पास होती हैं तो वो हर कंडीशन में सरवाइव कर सकती है। अब मुझे लगता है कि परिस्थितियां किसी भी तरह की हों, हार नहीं माननी चाहिए। महिलाओं को लड़कर, झगड़कर, प्यार से जैसे भी बात बने अपने लिए रास्ते बनाने चाहिए। जब वे बढ़ेंगी तो पूरा परिवार आगे बढ़ेगा।

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