• Hindi News
  • Women
  • This is me
  • It Was Black, But The Value Given, Father in law husband young Son Was Lost, Now The Letters Of Nirankardev Bachchan Are Saving

‘चंदामामा दूर के’ लिखनेवाले कवि ने बनाया बहू:सांवली थी, पर दिया मान, ससुर-पति-जवान बेटा खोया, अब सहेज रही निरंकारदेव-बच्चन के खत

एक महीने पहलेलेखक: मीना

‘आजादी के 75 बरस हों या कोई भी आम दिन मेरे लिए निरंकार देव सेवक हर दिन प्रिय हैं, क्योंकि मेरा और उनका रिश्ता ससुर और बहू से ज्यादा पिता और बेटी का रहा। शादी के बाद मेरा ससुराल मायका और मायका ससुराल बन गया था।

जाने माने बाल साहित्यकार निरंकार देव सेवक की बहू पूनम सेवक के ये दास्तां है। 63 साल की पूनम वुमन भास्कर से खास बातचीत में कहती हैं, ‘मेरा ये सौभाग्य है कि मैं इतने बड़े साहित्यकार के घर की बहू बनी। मेरे भैया तो मुझे मजाक में ‘इंजन’ कहकर बुलाते थे, क्योंकि मेरा रंग इतना दबा हुआ थी।

बड़े घर की बहू बनी
जिस दिन मेरा रिश्ता निरंकार देव सेवक के बेटे प्रदीप सेवक से पक्का हो रहा था उस दिन मेरे परिवार वाले मुझ पर बहुत हंस रहे थे, क्योंकि उन्हें भरोसा नहीं हो रहा था कि ये कैसे हो गया? कैसे कोई लड़के वाला एक बार में हां कर गया?

मेरा जन्म बरेली में हुआ और वहीं एमए तक की पढ़ाई। मैं एमए फाइनल में थी जब मेरा रिश्ता पक्का हो गया और साल 1981 में 22 साल की उम्र मेरी शादी हो गई। शादी तो हो गई, लेकिन बारात से जुड़ा किस्सा मुझे आज भी नहीं भूलता।

पूनम सेवक को संगीत में रुचि थी, लेकिन परिवार की जिम्मेदारियों के चलते उसमें आगे करिअर नहीं बना पाईं।
पूनम सेवक को संगीत में रुचि थी, लेकिन परिवार की जिम्मेदारियों के चलते उसमें आगे करिअर नहीं बना पाईं।

‘दूध से सफेद’ खानदान में आ गई
बारात दिन में 11 बजे आनी थी, लेकिन 11:30 बजे तक बाराती घर पहुंचे। बारात लेट हो गई तो मैंने सोच लिया था कि ये दुल्हन घर ही बैठी रह जाएगी। सेवक जी के घर में सब ‘दूध से सफेद’, ‘इतना नामी खानदान’, ‘हरिवंश राय बच्चन जैसे लोगों से संपर्क’... मुझे भला क्यों अपने घर की बहू बनाएंगे। ऊपर से दहेज भी नहीं ले रहे हैं।’ उस आधे घंटे में न जाने मैंने क्या-क्या सोच लिया कि आधे घंटे बाद जब बारात आई तब मेरी सोच के घोड़ों ने लगाम लगाई।

शादी के बाद डेढ़ हजार गज में फैले घर में एक नौकर, एक माली, एक रिक्शे वाला, एक खाना बनाने वाली और एक बर्तन मांझने वाली के साथ सास-ससुर, पति और मैं हम इतने लोग रहते थे। इतने बड़े घर को देखते ही मेरी तो आंखें जैसे चौंधिया गईं।

ससुराल मायका बन गया
फिर ऊपर से मुझसे न घुंघट कराया जाता और न ही ये होता कि ससुर जी आएं हैं तो मैं उठकर कमरे में घुस जाऊं। मायके में अभी तक जो भी ‘बहू धर्म’ सीखे थे ससुराल में आकर वो सब बदल गए। ऐसा लग रहा था जैसे मेरा नया जन्म हुआ है।

साहित्यकार निरंकार देव सेवक का डेढ़ हजार गज का मकान था। ससुर, पति और जवान बेटे के गुजरने के बाद पूनम ने उस मकान को बेचकर ये छोटा सा घर रखा। वे कहती हैं, उतने बड़े घर की रक्षा कौन करता। इसलिए ये इतना ही रखा है कि गुजर-बसर हो जाए।
साहित्यकार निरंकार देव सेवक का डेढ़ हजार गज का मकान था। ससुर, पति और जवान बेटे के गुजरने के बाद पूनम ने उस मकान को बेचकर ये छोटा सा घर रखा। वे कहती हैं, उतने बड़े घर की रक्षा कौन करता। इसलिए ये इतना ही रखा है कि गुजर-बसर हो जाए।

ससुराल में हर दिन कवि गोष्ठियां होतीं। मुझे उन्हें सुनने में बहुत आनंद आता। यहां हरिवंश राय बच्चन, नागार्जुन, होरी लाल ‘नीरव’ और रमेश रावत जैसे कवि आया करते थे। यही नहीं जब पापा जी ‘बालगीत साहित्य’ लिख रहे थे उस समय तो उसकी पांडुलिपि मैंने उनके साथ तैयार करवाई थी। वे बोलते थे और मैं लिखती थी।

पापा जी बहुत पढ़ते-लिखते थे। इतना पढ़ते थे कि उनकी आंखें खराब हो गईं थीं। हमारे घर के बाहर नाला है। सुबह-शाम पैदल चलकर नाले के चक्कर लगाकर न जाने कितने अखबार पढ़ जाते थे। पढ़ने लिखने में इतने तल्लीन रहते कि किसी से कोई खास-लेना देना नहीं हो पाता था।

संगीत का शौक पीछे छूट गया
मुझे बचपन से संगीत का बहुत शौक था, लेकिन उस जमाने में लड़कियों का अपने शौक पूरा करना अच्छा नहीं माना जाता था। जिस वक्त मेरे पापा को मालूम हुआ कि मैं संगीत सीखना चाहती हूं तो उन्होंने फटकार लगा दी। मां ने मेरा शौक समझा और छठी क्लास में चुपके से संगीत की शिक्षा दिलानी शुरू कर दी। आज मैंने संगीत में प्रभाकर कर ली है।

नौवीं क्लास में आते ही मैंने आसपास की लड़कियों को शास्त्रीय संगीत सिखाना शुरू कर दिया। जब मेरा रिश्ता पक्का हुआ तब भी मेरा गाना सुना गया था और सभी को बहुत पसंद आया। ससुराल में आकर भी बच्चियों को संगीत सिखाना शुरू किया।

शादी के बाद जब जिम्मेदारियां बढ़ने लगीं और पापा जी की तबियत भी बिगड़ने लगी तो संगीत भी पीछे छूटता चला गया। उन्हें न जाने कितनी बीमारियों ने घेर लिया था। बीमारी में भी उन्होंने पढ़ना नहीं छोड़ा।

ससुर की सेवा में लगाए दिन
आज उनकी 70 किताबें दुनिया के सामने हैं। ‘चंदामामा’ से लेकर ‘दो चीड़ियों की बात’ जैसी कई कविताएं बच्चों को बहुत प्रिय हैं। पापा जी के अंत समय तक मैं उनके साथ थी। उन्हें दिल की कोई बीमारी हो गई थी। पैर सूजे रहते थे। कई महीने तो उन्हें बच्चों की तरह खाना खिलाया। मेरी सास अलग बीमार रहती थीं तो वे पापा जी को उतना देख नहीं पाती थीं।

1994 में पापा जी हमें छोड़कर चले गए। उसके कुछ समय मां भी चल बसीं। पापा जी के निधन के बाद मेरे पति ने ‘साहित्य कला मंडल’ संस्था बनाई। जिंदगी दुखों से उबरी ही थी कि चार साल बाद पति का देहांत हो गया।

पापा जी के जाने के बाद कुछ कविताएं लिखनी शुरू कीं तो रो पड़ती फिर मेरी बेटियों ने उन कविताओं के पन्नों को फाड़कर फेंक दिया। उसने कहा- मत लिखो अगर वो लिखकर तुम्हें दुख होता है।

बीते दिनों को लिखा तो रो पड़ी
मैंने बिखरे जिंदगी के पन्ने समेटे ही थे कि 28 साल का बेटा जॉन्डिस से गुजर गया। बेटे के जाने के बाद तो लगा कि मेरा जीना ही बेकार है। मैं किसके लिए जीऊं और क्यों जीऊं? मेरा संगीत, मेरे अपने, मेरी खुशियां सब मेरे लिए धूमिल होने लगे।

पति के गुजरने के बाद मैंने डेढ़ हजार गज का मकान बेचा। इतने बड़े घर की देखभाल मुझसे अकेले नहीं हो रही थी। पति के साथ मिलकर 'डॉ. निरंकार देव सेवक' नाम की संस्था खोली लेकिन, हसबैंड के गुजरने के बाद उसे भी बंद कर दिया।

मैं शारीरिक और मानसिक रूप से इतना थक चुकी थी कि फिर कुछ भी रचनात्मक करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाई। आसमान से जमीन पर आ गई। वो हारमोनियम जो कभी मैंने 55 रुपए का खरीदा था और उससे लाखों रुपए कमाए थे और अभी पिछले चार साल से कहीं बंधा हुआ पड़ा है।

बिखरी पर टूटी नहीं
जीवन में उतार चढ़ाव तो बहुत आए लेकिन कभी जीना नहीं छोड़ा। दुखों से टूटी लेकिन बिखरी नहीं। मैंने खुद खुद को संभाला। अब पीछे मुड़कर नहीं देखती।

हरिवंश राय बच्चन के पापा जी को लिखे पत्र और पापा जी का लिखा साहित्य उसी की रक्षा कर रही हूं। अब जिंदगी को आगे बढ़ाना और अपना स्वास्थ्य ठीक रखना है। फिर से संगीत शुरू करना है, यही जीवन का लक्ष्य है।

बरेली सीरीज की ये 3 स्टोरीज भी पढ़िए...

खूनी मांझा, असली कहानी:लहुलुहान हाथों से बनता मांझा; भारत में ही बनते हैं और कहलाते हैं ’गर्दन काट' चाइनीज मांझे

बरेली के 250 साल पुराने सुरमे की कहानी:​​​​​​मिस्र-अरब से आता है पत्थर-साल भर गुलाबजल में डुबोते हैं, तब तैयार होता है, लालू-अखिलेश-कोहली भी फैन

महलों में सज रहा झोपड़ी में बना जरदोजी का काम:प्रियंका चोपड़ा भी दीवानी, 1000 करोड़ का कारोबार, पर एक दिन की मजदूरी 250 रुपए

खबरें और भी हैं...