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कश्मीर बसा है दिल में:कश्मीरी आर्ट को जिंदा कर रहीं ‘काकिनी’, पोलियो को हरा चुकी वीना वांचू चला रहीं कलपोश फाउंडेशन

एक महीने पहलेलेखक: मीना

बात 1970 की है। मैं 3 साल की थी। मुझे बुखार चढ़ा था और मां मुझे दही चावल खिला रही थीं कि तभी दाएं हाथ पर दही गिर गया। मैं हाथ को उठा नहीं पा रही थी, तब दूसरे हाथ का सहारा लिया। मां को कुछ शक होने लगा। उन्होंने मुझे खड़ा किया तो मैं गिर गई। मेरी ऐसी हालत देखकर मां चीख पड़ीं और पास के डॉक्टर के पास लेकर भागी। दरअसल मुझे पोलियो का अटैक आया था। मेरे शरीर का दायां हिस्सा पैरालाइज्ड हो गया था। इसके बाद जिंदगी पूरी तरह से बदल गई। मैं सरपट भाग नहीं सकती थी। खनकती पायल की जगह कैलिपर शू की बैसाखी मेरे नाम हो गई थी। कश्मीर की वादियों में पली-बढ़ीं वीना वांचू की ये शब्द हैं। वीना ने पोलियो से लड़कर आज अपनी कमजोरी को 60 फीसद कम कर लिया है और कैलिपर शू भी अब उनके पैरों में नहीं है। अब वे कलपोश फाउंडेशन की निदेशक हैं।

फिरन पहनें वीना वांचू
फिरन पहनें वीना वांचू

भास्कर वुमन से खास बातचीत में वीना बताती हैं कि शादी मेरी जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट बनी। मैं 18 साल की कश्मीर की लड़की और पति इंदौर के निवासी, इसी के साथ अब मेरा पता कश्मीर से इंदौर में बदल गया। मैं बचपन से ही मेहनती रही। पोलियो के लकवे को कभी कमजोरी नहीं समझा। साइंस की स्टूडेंट थी और शादी के बाद कॉमर्स में पढ़ाई जारी हुई। शादी की चमक-दमक के बीच भी खुद को रुकने नहीं दिया और आगे कुछ करने की ठानी। लोग कहते थे घर में रहो, बाहर मत जाओ, तुम नहीं कर पाओगी, लेकिन ये तरस भरी नजर मुझे बिल्कुल नहीं चाहिए थीं।

कश्मीरी ड्रेस
कश्मीरी ड्रेस

बचपन से सोशल वर्क मेरे खून में था आगे भी इसी जिम्मेदारी को अपनाया। कश्मीरी पंडित होने की वजह से विस्थापन का दर्द भी हमारे परिवारों ने झेला। देश के किसी भी किसी कोने में रही, पर मेरे अंदर कश्मीरियत हमेशा जिंदा रही। आगे कश्मीरियों के लिए काम करने की सोची। तब 2018 में पति की मदद से कलपोश फाउंडेशन शुरू किया। कलपोश नाम भी इसलिए रखा ताकि नाम से ही मालूम हो कि यह कोई ऐसा फाउंडेशन है जो कश्मीरियत से जुड़ा है। माइग्रेशन के बाद जो कश्मीरी कल्चर खत्म होने लगा था उसे संजोय रखने के लिए कलपोश की नींव डाली। ट्रेडिशनल कश्मीरी टोपी, जो कश्मीरी महिलाएं पहनती हैं, इसे कलपोश कहते हैं। कलपोश में हम माइग्रेंट कश्मीरियों के लिए भी काम करते हैं।

मेरे पति को भी पोलियो हो चुका है, लेकिन हम दोनों ने अपनी इस कमजोरी को दरकिनार करते हुए अपने देश के लिए कुछ करने की ठानी है। कश्मीर से कश्मीरी पंडितों का अलग-अलग राज्यों में चले जाने के बाद लोगों ने देश भर में प्रदर्शन किया, लेकिन इस समय तक हम दिल्ली आ चुके थे। मुझे याद है वो दिन जब हजारों की भीड़ जंतर-मंतर पर कश्मीरी पंडितों के हक की मांग कर रही थी। बेघर अपने घर जाना चाहते थे। उस दौरान मैं भी प्रदर्शनों में जाती और कश्मीरी पहचान बनी रहे उसके लिए कश्मीरी फिरन पहनती। फिरन पहनने की वजह से मैं प्रदर्शनकारियों के बीच अलग दिखती। इसी वजह से मेरा नाम ‘काकिनी’ पड़ गया। फंक्शन, शादी, सोशल वर्क सब में फिरन पहनती, इसलिए काकिनी नाम पड़ गया। कश्मीर में काकिनी दादी को कहा जाता है। मैं सबकी दादी बन गई हूं, क्योंकि फिरन के सहारे कश्मीरी आर्ट को बढ़ावा दे रही हूं।

कश्मीरी आर्ट वर्क
कश्मीरी आर्ट वर्क

जरूरतमंदों को मदद पहुंचाने के अलावा मैं कश्मीर की रूह से कनेक्ट रहने के लिए कश्मीरी गाने गाती हूं। नए कश्मीरी युवाओं के साथ कश्मीरी भाषा पर काम करती हूं। उम्र 52 साल की हो गई है, लेकिन कश्मीरी कला को बनाए रखने के लिए यूट्यूब पर कश्मीरी ‘नाटकों’ की भूमिका भी अदा करती हूं। स्टेज पर परफॉर्म करने का मौका मिलता है तो वह भी करती हूं। इन नाटकों में भी फिरन पहनती हूं और पूरी तरह कश्मीरी ट्रेडिशन को फॉलो करती हूं। विस्थापन का दर्द मेरे सिने में है, जिसे शब्द देकर गीत गाती हूं। यही नहीं वुरबल (12 चूल्हों वाला चूल्हा) के बारे में भी गीत गाए। फिरन पर जोर इसलिए रहा कि लोग कश्मीर की ट्रेडिशनल ड्रेसिज को भूल गए हैं, जिन्हें खोने से बचाना है।

आजकल मशीनें आ गई हैं, तो कश्मीरी आर्ट वर्क को बचाने के लिए हाथों का काम देना जरूरी है। इस तरह से गरीब तबकों तक काम भी दे पाते हैं। जैसे चिनार का पत्ता आर्टिफिशियल अच्छा नहीं लगता वैसे ही आर्टिफिशियल कश्मीरी आर्ट जंचता नहीं है। कश्मीर एंब्रोइडरी, जरी वर्क, पेपर मैशी, सबकुछ रिवाइव करना चाहती हूं। मुझे लगता है इस तरह से काम से करने से मैं महिलाओं को फिजिकली और फाइनेंशियली भी मजबूत बना पाउंगी। शादी के कुछ साल बाद कंप्यूटर कोर्स किया, शहनाज हुसैन इंस्टीट्यूट से हेयर ट्रीटमेंट का कोर्स किया। यही नहीं शार्ट हैंड भी सीखी। ऐसे तमाम काम करती रही पर जिंदगी की गाड़ी को डिसएबिलिटी की वजह से रुकने नहीं दिया। कोरोना के समय पर कलपोश ने मास्क, हैंड सैनिटाइजर, ऑक्सीजन सिलेंडर, राशन किट सब बांटे। यही नहीं फूड रिलिफ प्रोग्राम्स चलाए। हम कलपोश के जरिए गरीबों को खाना, ज़रूरतमंद बच्चों के स्कूल की फीस भी भरते हैं और शादियां भी कराते हैं।

आज मैं एक मां भी हूं और जिंदगी को एकदम नॉर्मल तरीके से जी रही हूं। अब मुझे लगता है कि डिसएबिलिटी सिर्फ दिमाग में होती है, शरीर में नहीं। अपने काम खुद करती हूं, जिंदगी को कश्मीरियत के साथ जीती हूं और आगे भी इस कश्मीरियत को बढाना है।

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