मनरेगा मजदूर जब बन गईं संस्था की संस्थापक:गुस्से में ससुराल छोड़ा, मजदूरी की और बनाई ‘जन विकास केंद्र’ संस्था

एक वर्ष पहलेलेखक: मीना

बचपन इतनी गरीबी में बीता कि भरपेट खाना क्या होता है, जाना ही नहीं। कभी खाया, तो कभी पेट मसोसकर रह गए। घर में छह भाई बहन और पिता जी की एक नौकरी। ऐसे में सभी को बराबर की हिस्सेदारी मुमकिन नहीं थी। मुझे पढ़ने लिखने का शौक था तो गांव के सरकारी स्कूल में मेरा दाखिला करवा दिया गया। पढ़ने जाती तो घर वाले आने की राह देखते। तपती धूप में 5 किलोमीटर तक पैदल जाना पड़ता। जल्दी स्कूल से घर आती, 1 मिनट की भी देरी की तो घर वालों से डांट पड़ती। घर और स्कूल की बाउंड्री में बंधा सा महसूस करने लगी। इस बंधन से निकल कर अपने मन की करना चाहती थी। समय की पाबंदी से इतर खुले खेतों में खेलना चाहती थी, मिट्टी में उमड़ना चाहती थी। आजादी की और परिभाषा गढ़ती उससे पहले 17 साल की उम्र में 10वीं पास करते ही शादी करवा दी गई। अब मेरा पता उत्तर प्रदेश का अंबेडकर नगर नहीं लखनऊ शहर हो गया। ये कहानी है मनरेगा मजदूर से बनीं समाजसेविका गायत्री देवी की।

भास्कर वुमन से बातचीत में गायत्री बताती हैं, अब तक होरिलपुर (गांव) में मिट्टी, रेत, खुले खेत, कच्चे मकान देखे थे लेकिन लखनऊ में नवाबी देखी। पक्के मकान, सूट-बूट में लोग, खाने-पीने का बढ़िया सामान। ये सबकुछ उसी दिन देखा था जिस दिन डोली ससुराल गई। बाद में ससुराल में दहलीज सीमा बन गई। गहने, साड़ी में सजा हुआ शरीर नवब्याहता की पहचान बता रहा था। हाथों की हल्दी अभी छुटी भी नहीं थी कि ससुराल से मायके आना पड़ा और मजदूरी करनी पड़ी। ससुराल में ससुर ही कमाने वाले थे, वे भी नहीं रहे। पति कुछ कमाते नहीं थे। एक साल के भीतर एक बेटे की मां बन गई। अपनी और बच्चे की जरूरतें पूरी करने के लिए किसी के आगे रोज हाथ नहीं फैला सकती थी। गांव में नून-रोटी किसी से मांगकर खाई जा सकती है, शहर में कोई नून भी देने को तैयार नहीं। पति को काम नहीं मिल रहा था। मैं शुरू से ‘कमेरू’ रही। 10वीं पास थी। ससुराल में आकर बीए तक पढ़ाई की। इसी बीच पुलिस की नौकरी का फॉर्म भरा और उसकी परीक्षा देने का समय आया तो पति ने मना कर दिया। घर में खाने के लाले पड़ने लगे। मैं झटपटाने लगी। कुछ करने का सोचने लगी। पति ने इजाजत नहीं दी तो गुस्से में ससुराल छोड़ दिया।

ससुराल छोड़ संस्था में शुरू किया काम
मायके आई और खेत में काम करने चली गई। उस दिन खेत में थी जब पापा ने कहा कोई संस्था वाले आए हैं। वहां लड़कियां ही जा सकती हैं। पापा ने मुझे भी वहां भेज दिया। संस्था की मीटिंग चल रही थी। वो अपने काम के बारे में बता रहे थे, उन्हें लोगों की जरूरत थी। मैंने भी वो संस्था जॉइन की। यहां मुझे साइकिल दी गई। जिस पर सवार होकर मुझे गांव में जाकर काम करना होता। बचपन में पैदल स्कूल जाती, आज काम के लिए जब साइकिल मिली तो बहुत खुशी हुई। मायके में थी तो घर में रहती। ससुराल में आई तो घर में रही। घर के अलावा और कोई दुनिया थी ही नहीं, वो संस्था में आकर जी। संस्था में काम करने के दौरान महिला मुद्दों को समझा। वहां जो ट्रेनिंग दी जाती उसे मैं खुद से जुड़ा महसूस करती। यहां से मैंने बहुत कुछ सीखा लेकिन यहां पैसे बहुत कम मिलते थे।

संस्था में काम और मजदूरी दोनों साथ-साथ किए
मेरा और मेरे बेटा का गुजारा नहीं हो पा रहा था। इसी बीच मुझे मनरेगा के बारे में मालूम हुआ। मेरा पतला-दुबला शरीर देखकर ठेकेदार ने काम देने से मना कर दिया। उस समय लड़कियों को मजदूरी नहीं मिलती थी, लेकिन मैं रोज काम मांगने पहुंच जाती। प्रधान ने चीढ़कर कहा, तुझे बहुत काम करने का शौक है। आज से मजदूरी कर। मैंने तालाब खुदाई, सड़क पटाई और खड़ंजा पर काम करना शुरू कर दिया। संस्था का काम करने के बीच एक दिन की छुट्टी मिलती, मैं मजदूरी करने पहुंच जाती। मजदूरी के दिन 65 रुपए मिलते।

‘जन विकास केंद्र’ संस्था बनाई
संस्था ने मुझे एक दिन अहमदाबाद दलित फाउंडेशन के कार्यक्रम में भेजा। वहां से मुझे फेलोशिप मिली। वहां मैंने जाना कि अपनी संस्था बनाना क्यों जरूरी है? फिर मैंने 2007 में अपनी संस्था ‘जन विकास केंद्र’ बनाई। अभी तक जिस संस्था में काम कर रही थी वहां उनके मुताबिक बंधकर काम करना पड़ता था। अब अपनी संस्था में अपने मुताबिक काम करती हूं। यहां मैं बच्चियों को पढ़ाने से लेकर उन्हें कानूनी समझ भी देती हूं। दलित और मुस्लिम बेटियों को पढ़ने के लिए प्रेरित करती हूं। मैंने 14 लड़कियां तैयार की हैं। ये 14 लड़कियां 14 गांवों में 20-20 लड़कियों के समूह को पढ़ाती हैं। इन कामों के साथ-साथ मैं मनरेगा के बारे में भी लोगों को बताती हूं। हाल के दिनों में मैंने मनरेगा के तहत मजदूरों को 100 की बजाए 150 दिनों का रोजगार दिया जाने की मांग की है। मनरेगा की मजदूरी करने के दौरान देखा मजदूरों को 100 की बजाए 10-15 दिन काम ही मिलता था। काम मिलता तो मजदूरी नहीं, इसलिए ये पिटीशन डाली कि सरकार इस ओर ध्यान दे और गरीबों के बच्चों तक दूध की बोतल और पेट में खाना पहुंच सके।

'अब पति भी समझे हैं मेहनत'
अब मेरे पति भी मेरे काम में मेरा साथ देते हैं। मेरा 22 साल का बेटा मुझ पर गर्व करता है। अब अगर मेरे पति को कोई कहता है कि तू पत्नी की कमाई खाता है तो उन्हें बुरा नहीं लगता। अब उन्हें मेरी मेहनत समझ आई है। इतने सालों के काम के अनुभव के बाद लगता है कि लड़कियों को अपनी शिक्षा जरूर पूरी करनी चाहिए। पढ़-लिखकर नौकरी जरूर करें। संविधान ने जो अधिकार दिए हैं उन्हें जानें और आगे बढ़ें।

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