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ये मैं हूं:रेल दुर्घटना में दोनों हाथ गंवाए, पर जीने की आस नहीं छोड़ी, पैर से लिखना शुरू किया तो दुनिया ने सराहा

10 महीने पहलेलेखक: मीना

‘जिंदगी में कब क्या हो जाए किसी को नहीं मालूम। हमें नहीं मालूम था कि कभी कोविड-19 जैसी महामारी हमारी जिंदगी में घर कर जाएगी, पर आज उसी के साथ जीना पड़ रहा है। एक ऐसी ही दुर्घटना मेरी जिंदगी में भी घटी, जिसकी वजह से जिंदगी की परिभाषा बदल गई। पिता जी रेलवे में ड्राइवर थे। मैं चार साल की थी। रामनवमी का दिन था। मैं शंटिग कर रहे इंजन के नीचे आ गई। इस दुर्घटना में मेरे दोनों हाथ और बाएं पैर की पांचों उगलियां कट गईं। इस दुर्घटना के बाद भी जिंदगी को जीना नहीं छोड़ना। अब सरकारी विभाग में नौकरी करती हूं और साथ में साहित्यिक कृतियां लिखती हूं।’ ये शब्द हैं उत्तर प्रदेश के लखनऊ की कामिनी श्रीवास्तव के। वुमन भास्कर से कामिनी कहती हैं, ‘मेरा जन्म 1962 में उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में हुआ। बचपन से ही मैं खुशमिजाज और जिंदगी को खुलकर जीने वाली लड़की रही। जब चार साल की उम्र में यह दुर्घटना घटी तब तो उतनी समझ भी नहीं थी कि उस मामले की गंभीरता को समझ पाती। समाज के ताने मिलते उससे पहले ही पेरेंट्स ने मुझे पैरों से लिखना सिखा दिया। चार भाइयों की इकलौती बहन होने के नाते उन्होंने मुझे दुनिया के सारे सुख देने की सभी कोशिशें कीं, लेकिन मेरे जो हाथ कट कर जा चुके थे वो वापस तो नहीं आ सकते थे।

दुर्घटना में मेरे हाथ गए थे लेकिन आत्मविश्वास आज भी साथ है : कामिनी
दुर्घटना में मेरे हाथ गए थे लेकिन आत्मविश्वास आज भी साथ है : कामिनी

पिता से मिली जिंदगी जीने की प्रेरणा
हाथों के बिना जिंदगी इतनी मुश्किल हो गई कि हर छोटे काम के लिए दूसरों पर निर्भर होना पड़ा। डिप्रेशन का शिकार भी हुई। फिर, एक दिन पापा ही मेरे प्रेरणा स्रोत बने। पिता जी खुद साहसी व्यक्ति थे। वे अपने समय में फुटबाल और जिम्नास्टिक के चैम्पियन रह चुके थे। उन्होंने 26 जनवरी के दिन मुझे 18 मिनट तक पतले तार पर चलकर दिखाया, जिसने मुझे प्रेरणा दी कि इंसान के अंदर इच्छाशक्ति हो तो वह कुछ भी कर सकता है। मैंने मनूचा गर्ल्स डिग्री कॉलेज से बीए किया। मेरे पेरेंट्स ने मुझे विक्टिम की तरह नहीं फाइटर की तरह जीना सिखाया। मैंने यह स्वीकार कर लिया था कि मेरे पास सिर्फ हाथ ही नहीं बाकी पूरा शरीर ठीक है। मैं जो चाहूं वो कर सकती हूं।
काम भी किया और नाम भी कमाया
पढ़ने लिखने के बाद मुझे घर में नहीं बैठना था फिर मैंने सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करना शुरू किया। बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग में सुपरवाइजर के पद पर नौकरी मिली। 1990 में बाल विकास परियोजना अधिकारी के पद पर पदोन्नति मिली। आज के समय में बाल विकास परियोजना अधिकारी के पद पर मैं सरोजनी नगर लखनऊ में काम कर रही हूं। नौकरी के साथ-साथ मैंने अर्थशास्त्र व समाजशास्त्र विषय से एमए किया। मुझे विभाग की ओर से साल 2000 में इंदिरा महिला स्वयं सहायता समूह योजना के अंतर्गत अध्ययन दल के सदस्य के रूप में इंडोनेशिया भी भेजा गया।
परिवार का हमेशा मिला साथ
1997 में मेरी शादी करवा दी गई। पति ने भी मेरा कदम-कदम पर साथ दिया। मेरा संयुक्त परिवार है, उन सभी का सहयोग मेरे लिए बहुत मायने रखता है। जब स्कूल में थी तब मेरी सहेली ही मेरा बैग लेकर आती थी। मुझे आस-पड़ोस और परिवार बहुत अच्छा मिला।

परिवार ने हमेशा साथ दिया।
परिवार ने हमेशा साथ दिया।

बचपन से था पढ़ने-लिखने का शौक
मुझे लिखने-पढ़ने का बचपन से शौक था। स्कूल में ही उन लेखकों को पढ़ लिया था जिन्हें बाकी बच्चे कॉलेज में आकर पढ़ते हैं। मेरी रचनाएं दूरदर्शन और आकाशवाणी में भी प्रसारित हुईं और कई समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुईं। मैंने कवि सम्मेलनों में भाग लिया, काव्य संग्रह भी लिखे जिनमें ‘खिलते फूल महकता आंगन’, कहानी संग्रह ‘डोर’ महाकाव्य ‘भारत रत्न इंदिरा’ और उपन्यास ‘असमाप्त राहें’ प्रकाशित हो चुके हैं।
मिल चुके हैं कई सम्मान
मैंने अपनी नौकरी और अपने शौक दोनों को बराबर की महत्ता दी। 1994 में पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार, 1997 में राज्यपाल रह चुके रोमेश भंडारी द्वारा राज्य स्तरीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा वरिष्ठ साहित्यकार लक्ष्मीकान्त वर्मा द्वारा सुल्तानपुर में 1994 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के अवसर पर भारत भारती पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
1993 में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी द्वारा वेद वेदांग पुरस्कार समारोह में और 2005 में पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव द्वारा महिला दिवस के अवसर पर भी सम्मानित किया गया।

कई मंचों पर अपने मन की बात पहुंचा चुकी हूं।
कई मंचों पर अपने मन की बात पहुंचा चुकी हूं।

साहित्य के क्षेत्र में कार्य करने के लिए सृजन सम्मान से सम्मानित किया गया। 2016 में विश्व मानव संघ संस्था द्वारा विश्व मानव दिवस पर अंतरराष्ट्रीय जुनूॅ अवार्ड, अखिल भारतीय साहित्य परिषद द्वारा 51वें साहित्यकार सम्मेलन में निर्मला साधना सम्मान से सम्मानित किया गया। 2016 में मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव द्वारा रानी लक्ष्मीबाई वीरता सम्मान से सम्मानित किया गया। 2016 को राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान उ.प्र. द्वारा मुझे मेरी पुस्तक खिलते फूल महकता आंगन के लिए रामधारी सिंह दिनकर अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसके अलावा साहित्य के क्षेत्र में तमाम पुरस्कारों से नवाजा गया, जिनकी फेहरिस्त यहां बता पाना मुश्किल है।
खुद पर भरोसा करें
मैं आज इतना सबकुछ कर पाई हूं, उसके पीछे मेरे आसपास मददगार लोगों का होना था। अब तक चार किताबें लिख चुकी हूं। फेसबुक पर पोस्ट भी खुद ही कर लेती हूं। अब मैं सभी को यह कहती हूं कि जिंदगी में उतार-चढ़ाव तो आते रहते हैं लेकिन आप उन परेशानियों को संभालते कैसे हैं, यह बड़ी बात है। दुख में भी खुश होना आना चाहिए। मुझे खुद पर बहुत भरोसा था। इसलिए कभी महसूस ही नहीं हुआ कि मैं दिव्यांग हूं।