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नेशनल एथलीट रही, फिर बनी मजिस्ट्रेट:700 महिलाओं-बच्चों को दिलाया इंसाफ, अब एक जिले की पहली लोकपाल बन भ्रष्टाचार पर कस रही नकेल

नई दिल्ली3 महीने पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के छोटे से गांव ‘अहरौली दीक्षित’ के ब्राह्मण परिवार में जन्मीं। उस वक्त गांव में बेटियों को पढ़ाया-लिखाया नहीं जाता था, लेकिन मेरे पिता ने इस परंपरा को तोड़ा। मैं पढ़ने के साथ ही खेलकूद में भी अव्वल रही। मेरे खेलने का विरोध हुआ। मुझे रोकने की कोशिश की गई, तब बड़े भइया साथ खड़े हो गए। खूब ताने-उलाहने सुने, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। यह कहना है मऊ जिले की पहली लोकपाल विनीता पांडेय का, जो बाधाओं को मात दे महिलाओं के लिए मिसाल बनीं। असहाय और बेसहारा जिंदगियों का सहारा बनीं। हजारों प्रतिभाओं को निखार कर उन्हें रोजगार दिलाया और आज सरकार के भ्रष्टाचार रोधी मिशन को साकार करने में जुटी हैं। पढ़िए, लोकपाल विनीता पांडेय की कहानी, उन्हीं की जुबानी..

मैं संयुक्त परिवार से हूं जहां 15 लोग साथ रहते थे। पिता गन्ना मिल में काम करते थे। घर में पिता अकेले कमाने वाले और खाने वाले 15 लोग। परिवार में चार बहनों और दो भाइयों में से मैं पांचवें नंबर की हूं। उस वक्त ‘अहरौली दीक्षित’ एक गांव था। हालांकि, अब यह पडरौना कस्बे का एक वार्ड बन गया है। उस वक्त गांव में लड़कियों की पढ़ाई से ज्यादा शादी चिंता और चर्चा का विषय हुआ करती थी। अब गांव की बेटियां पढ़-लिखकर नाम रोशन कर रही हैं। खुले आसमान में उड़ान भरने के सपने देख रही हैं।

मैं पढ़ने-लिखने के साथ-साथ खेलकूद में भी अव्वल रही। रेस और जंपिंग में मैं पहले स्कूल, फिर ब्लॉक, जिला और मंडल स्तर तक खेली। जब मंडल स्तर पर पार्टिसिपेट करने जाना था, तब सबने मना कर दिया। लोग पापा के मुंह पर बोल जाते, ‘पहले लड़कों के स्कूल में पढ़ने भेजा और अब खेलने भी भेज रहे हो। इज्जतदार घरों की बेटियां ऐसे मैदान में कूदती-फांदती अच्छी नहीं लगतीं। बेटी को इतनी छूट नहीं देनी चाहिए। परिवार के मुंह पर कालिख पोतकर भाग जाएगी।’ उस वक्त मेरे बड़े भइया मेरे लिए लड़े और मेरे साथ खड़े रहे। उन्होंने किसी को पलटकर जवाब नहीं दिया, लेकिन उनकी बातों को मेरे सपनों के आड़े भी नहीं आने दिया। '

मऊ जिले की लोकपाल विनीता पांडेय की विभिन्न कार्यक्रमों के दौरान की तस्वीर। विनीता पांडेय राष्ट्रीय स्तर की धाविका रह चुकी हैं और अंतरराष्ट्रीय खेलना चाहती थी, लेकिन निजी कारणों के चलते खेल नहीं पाई।
मऊ जिले की लोकपाल विनीता पांडेय की विभिन्न कार्यक्रमों के दौरान की तस्वीर। विनीता पांडेय राष्ट्रीय स्तर की धाविका रह चुकी हैं और अंतरराष्ट्रीय खेलना चाहती थी, लेकिन निजी कारणों के चलते खेल नहीं पाई।

जब स्टेट चैंपियनशिप जीती तो लोग बुलाने लगे पीटी उषा
मैं पहले मंडल, फिर स्टेट लेवल पर खेली और जीतकर लौटी। लोगों ने मुझे पीटी उषा, उड़नपरी और न जाने क्या-क्या नाम दिए। कुछ लोग प्यार से नए नाम देते तो कुछ व्यंग में नए नाम से बुलाते। स्टेट लेवल पर खेलते वक्त वहां खेल जगत के दिग्गजों ने मेरी बहुत तारीफ की। भइया से कहा कि विनीता को यहां हॉस्टल में रहकर कोचिंग लेनी चाहिए। यहां प्रॉपर डाइट और कोचिंग भी मिलेगी, लेकिन यह फैसला लेना भइया के लिए भी मुश्किल था, क्योंकि घरवाले राजी नहीं होते, ऐसे में उन्होंने खुद ही मेरी तैयारी का जिम्मा उठाया। हर रोज सुबह 3 से 4 बजे के बीच जागती। फिर भइया साइकिल लेकर आगे-आगे चलते और मैं पीछे-पीछे दौड़ती चलती।

जून की गर्मी में राख हो गईं खुशियां
साल 1991 की बात है। मैं 10वीं क्लास में थी। उड़नपरी पीटी उषा बैक टू बैक कई एशियन चैंपियनशिप में मेडल अपने नाम कर चुकी थीं। वो हमेशा से मेरी लिए इंस्पिरेशन रही हैं। उस वक्त मैं नेशनल खेल रही थी और पूरे जुनून के साथ इंटरनेशनल की तैयारी कर रही थी। भइया बेहद सख्ती के साथ मेरी ट्रेनिंग करा रहे थे। तभी जून महीने का एक दिन ऐसा आया, जिसने मेरे सपनों को राख कर दिया। एक रात भइया सोए तो फिर कभी जागे ही नहीं। डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें सोते समय ही हार्ट अटैक आया था। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। बुजुर्ग माता-पिता और जवान भाभी। घर में कई महीनों तक मातम और उदासी पसरी रही। सबकी जिंदगी थम सी गई। घर की आर्थिक स्थिति भी खराब हो गई। वो मेरे लिए बड़े भाई, गुरु और मागदर्शक थे। इंटरनेशनल खेलने का सपना सिर्फ मेरा नहीं, भइया का भी था, इसलिए मैंने भी खेलना छोड़ दिया।

बीए और एमए में बनाए रिकॉर्ड अब तक कायम
11वीं और 12वीं की पढ़ाई के बाद आगे की पढ़ाई के लिए उदित नारायण पीजी कॉलेज पडरौना कुशीनगर में दाखिला लिया। कॉलेज की दीवारें एनुअल फेस्ट के पोस्टर के पटी पड़ी थीं। क्लास टीचर ने लड़कियों से भाग लेने को कहा तो उन सबने मेरा नाम आगे कर दिया। कहा कि विनीता चैंपियन रह चुकी है, लेकिन पता नहीं क्यों, मैं यहां खेलना ही नहीं चाहती थी। शिक्षकों और सहेलियों ने दबाव बनाकर मेरा रजिस्ट्रेशन करा दिया। हालांकि, मैंने पार्टिसिपेट करने से मना कर दिया। उस रोज मैं गुस्से में लाइब्रेरी चली गई। वहां पड़ी मैग्जीन हाथ में उठाकर खुद को नॉर्मल कर रही थी। तभी मेरी नजर कॉलेज में बनाए खिलाड़ियों के रिकॉर्ड पर पड़ी। दरअसल, कॉलेज में एक मैग्जीन भी निकलती, जिसमें कॉलेज के उन छात्रों के बारे में छपता, जिन्होंने वहां रहते खेल या फिर किसी क्षेत्र में रिकॉर्ड बनाया हो। कुछ धावकों के बारे में पढ़कर एक बार फिर रेस ट्रेक पर आने की सोची और इस बार अकेले ही तैयारी शुरू कर दी।

चाइल्ड कोर्ट में मजिस्ट्रेट पद पर सेवा देने के दौरान विनीता पांडेय। मजिस्ट्रेट के पद पर रहते हुए विनीता पांडेय लावारिसों और निराश्रितों की मदद की।
चाइल्ड कोर्ट में मजिस्ट्रेट पद पर सेवा देने के दौरान विनीता पांडेय। मजिस्ट्रेट के पद पर रहते हुए विनीता पांडेय लावारिसों और निराश्रितों की मदद की।

मुझे कॉलेज चैंपियन बनने के लिए 5 इवेंट में भाग लेना था। मैंने रेस और जंपिंग के 5 अलग-अलग इवेंट में न सिर्फ पार्टिसिपेट किया, बल्कि पिछले 25 साल से बने सारे रिकॉर्ड भी तोड़ दिए। यह सिलसिला 5 साल जारी रहा। साल 1999 में मैंने एमए की पढ़ाई पूरी की और लखनऊ क्रिश्चियन डिग्री कॉलेज में बीपीएड करने के लिए दाखिला लिया। लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज और गोरखपुर विश्वविद्यालय ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी में भी सीनियर नेशनल चैंपियन रही। अपनी पुरस्कार राशि और चंदा इकट्ठा कर छोटे बच्चों की खेल प्रतिभा निखारने लगी। आज भी हर साल विश्वविद्यालय मुझे निर्णायक के तौर पर बुलाता है।

शादी पढ़ी कानून की पढ़ाई, फिर बनी मजिस्ट्रेट
साल 2003 में एक संयुक्त परिवार में ही मेरी शादी हो गई। पति शिक्षक हैं। फिजिकल एजुकेशन एक बहुत बड़ा सब्जेक्ट है और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते मैं उतना वक्त नहीं दे पा रही थी। ऐसे में कुछ साल पूरी तरह परिवार के नाम किए। फिर लॉ की पढ़ाई की और प्रशासनिक सेवा में जाने के लिए परीक्षा दी। साल 2016 में मैं चाइल्ड कोर्ट की मजिस्ट्रेट बन गई, जहां मैंने बच्चों के प्रोटेक्शन, अडॉप्शन और वेलफेयर के लिए काम किया। जो बच्चे अपने माता-पिता से बिछुड़ गए थे, उन्हें उनके माता-पिता से मिलाया, इसके लिए अपने पास से पैसे भी खर्च करने पड़ते, लेकिन बच्चों और उनके माता-पिता के चेहरे की मुस्कुराहट के आगे ये कुछ भी नहीं था।

700 बच्चों-महिलाओं को दिलाया न्याय
मैं कॉलेज के समय से ही अपने अधिकारों को लेकर आवाज उठाती आई हूं और यह सिलसिला प्रशासनिक सेवाओं में आने के बाद भी जारी रहा। चाइल्ड मजिस्ट्रेट रहते हुए 700 से ज्यादा बेसहारा व असहाय बच्चियों और महिलाओं को न्याय दिलाने में मदद की। तीन हजार से ज्यादा लड़कियों को प्रोफेशनल कोर्स की ट्रेनिंग दिलवाकर रोजगार दिलाने में मदद की। मैं महिलाओं को अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए मोटिवेट करती रही हूं और आज भी करती हूं।

मऊ जिले की लोकपाल विनीता पांडेय मनरेगा योजना के तहत हो रहे काम के निरीक्षण दौरे के दौरान। विनीता पांडेय सुनिश्चित करती हैं कि मनरेगा में पारदर्शिता रहे। साथ ही मनरेगा मजदूरों को समय से मजदूरी मिले।
मऊ जिले की लोकपाल विनीता पांडेय मनरेगा योजना के तहत हो रहे काम के निरीक्षण दौरे के दौरान। विनीता पांडेय सुनिश्चित करती हैं कि मनरेगा में पारदर्शिता रहे। साथ ही मनरेगा मजदूरों को समय से मजदूरी मिले।

भ्रष्टाचार में लिप्त लोग बनाते हैं दबाव, मिलती हैं धमकियां
साल 2021 में मेरी तैनाती मऊ जिले की पहली लोकपाल के तौर पर हुई। पिछले दो साल से लोकपाल के पद पर काम कर रही हूं। इस पद की अपनी अलग तरह की चुनौतियां हैं। मनरेगा के कार्यों को मानक के अनुरूप व पारदर्शिता के साथ कराना, धांधली पर लगाम लगाना, मनरेगा मजदूरों का हक दिलाना और जमीन को कब्जा मुक्त कराने जैसी जिम्मेदारियां मिलती हैं। भ्रष्टाचार फैलाने वाले कई लोग तरह-तरह से दबाव बनाने की कोशिश करते हैं। धमकियां भी मिलती हैं, लेकिन मेरा मानना है कि भारत सरकार ने मुझे जिम्मेदारी दी है तो पूरी निष्पक्षता के साथ काम करूंगी। इसके बीच कुछ नहीं आ सकता, न कोई दबाव और न धमकी।

ताने कसने वाले देते हैं मेरी मिसाल...
मैं एक अधिकारी होने के नाते जितने जुनून के साथ प्रोफेशनल काम निपटाती हूं, उतनी ही शिद्दत के साथ पर्सनल लाइफ में बैलेंस बनाएं रखती हूं, क्योंकि अगर पर्सनल और प्रोफेशनल में बैलेंस नहीं तो जिंदगी बेपटरी होने लगती है। हालांकि, मेरी इस कोशिश में मेरे पति और दोनों बेटों का पूरा साथ मिलता है। मुझे अपनों के साथ वक्त बिताना पसंद है। तनाव कम करने के लिए मैं लता मंगेशकर के गाने सुनती हूं और गुनगुनाती हूं। मेरे मायके में जो लोग कभी घर से न निकलने की सलाह देते थे, ताने कसते थे, वही लोग मुझे मिसाल बताते हैं। बेटियों को पढ़-लिखकर मेरे जैसी सम्मान की जिंदगी चुनने की सीख देते हैं।

बता दें कि जिस तरह देश के लिए लोकपाल की नियुक्ति होती है, उसी तरह राज्यों के लिए लोकायुक्त और उप लोकायुक्त की नियुक्ति की जाती है, जो राज्य सरकार में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने का काम करते हैं। मनरेगा योजना में धांधली की शिकायतें मिलने के बाद केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को जिला स्तर पर लोकपाल नियुक्ति करने के निर्देश दिए। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, झारखंड और राजस्थान समेत कई राज्यों ने अपने यहां मनरेगा लोकपाल की नियुक्तियां की हैं। इसी के तहत विनीता पांडेय को मऊ जिला का लोकपाल बनाया गया है।

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