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ये मैं हूं:रात में मिलिटेंट्स बंदूक के दम पर पैसे मांगते, सुबह पुलिस पूछताछ करती, अब कश्मीरी महिलाओं की पैरोकार हूं

8 महीने पहलेलेखक: मीना

‘मैं जब तक कश्मीर में रही तब तक डर में जिंदगी काटी। कॉलेज श्रीनगर में जामिया मस्जिद के पीछे था। वहां हर जुम्मा पत्थर फेंके जाते, प्रदर्शन होते। कॉलेज के बाहर पत्थर फेंके जाते। वो डर आज भी इतना है कि यहां दिल्ली में भी अगर कोई किसी दिवाली पर पटाखा फोड़ दे तो मेरी जान ही निकल जाती है। रोज सुबह घर पर मिलिटेंट्स बंदूक की नोंक पर पापा-दादा से पैसे मांगने आते। पैसे नहीं मिलने पर मिलिटेंट्स ने एक बार पापा को इतना पीटा कि वो दर्द उन्हें आज भी सर्दियों में परेशान कर देता है। रात को मिलिटेंट्स पैसे लेने आते और सुबह पुलिस हमारा इंटोरेगेशन करती। हम बिना गलती की सजा रोज भूगते।’ ये दास्तान है कश्मीरी एक्टिविस्ट और रिसर्चर तहमीना रिजवी की। 26 साल की तहमीना वुमन भास्कर से बातचीत में कहती हैं, ‘जिस समय मेरा जन्म हुआ तब तक कश्मीरी पंडित जा चुके थे। पर पापा के जितने अच्छे दोस्त थे वो सभी कश्मीरी पंडित रहे। बड़गाम में मेरी पैदाइश हुई और बारामूला के मालमू गांव में लालन-पालन हुआ। मेरे गांव में लड़कियों की एजुकेशन बहुत जरूरी नहीं थी, लेकिन पापा ने कश्मीरी पंडितों के बच्चों को पढ़ते-बढ़ते देखा और उनके साथ ही उनका बैठना था, इसलिए वे चाहते थे कि हम भी अच्छे से पढ़ें और नाम रोशन करें। मैंने पढ़ाई को अपनी ऑक्सीजन बना लिया और अब एक रिसर्चर के नाम से जानी जाने लगी।

तहमीना ने कश्मीर से निकलकर कश्मीरी महिलाओं के हक की बात की।
तहमीना ने कश्मीर से निकलकर कश्मीरी महिलाओं के हक की बात की।

कश्मीर की उथल-पुथल ने बनाया निडर
मैंने बचपन से अपने आसपास कॉन्फ्लिक्ट्स को देखा। इस वजह से निडर पर्सनैलिटी के तौर पर उभरी। मैं जिस काम को हाथ में लेती, उसमें सफलता हासिल करके ही मानती। श्रीनगर से दसवीं पास करने तक मैं डॉक्टर बनना चाहती थी। इस समय तक मैं अपनी क्लास से आगे की किताबें पढ़ चुकी थी और घर में अगर डॉक्टर किसी को दवा देता तो मैं बता देती कि ये किस मर्ज की दवा है। मतलब हाफ डॉक्टर बन चुकी थी। हा हा हा…
मेरे सभी कजिन्स ने कॉमर्स लिया और परिवार भी बिजनेस से जुड़ी थी तो अब मैं कॉमर्स पढ़ने लगी। मुझे नॉलेज लेने की चखास ऐसी चढ़ी कि 11-12वीं तक सीए तक की किताबें पढ़ डालीं। फिर बीबीए किया।
बचपन से था पढ़ने का शौक
बीबीए का फाइनल यीअर, एमबीए का एंट्रेंस, सीए, सीएस की तैयारी साथ-साथ चल रही थी, लेकिन तभी कश्मीर में हड़ताल हो गई और एग्जाम्स की डेट शीट आ गई। दिन रात पढ़ाई करके बीबीए पास किया और एमबीए का भी एंट्रेंस निकाल लिया। मैं तो जी जान से पढ़ रही थी, लेकिन पापा कभी मेरी तारीफ मेरे मुंह पर नहीं करते, क्योंकि उन्हें लगता था कि बच्चों की तारफी करेंगे तो वो ‘सिर पर नाचेंगे।’ पर पापा को मेरे ऊपर बड़ा गुरुर था। वो चाहते थे कि मैं एमबीए न करूं और आइएएस की तैयारी करूं, क्योंकि उन्हें लगता था कि मैं ऑफिसर बनना का हुनर रखती हूं।

तहमीना को बचपन से पढ़ने लिखने का बहुत शौक था।
तहमीना को बचपन से पढ़ने लिखने का बहुत शौक था।

एक्टिविज्म और पढ़ाई साथ-साथ
मैं हमेशा चाहती थी कि पापा की परी बनूं और उनकी इस इच्छा को पूरा करने के लिए मैंने खूब मन लगाकर पढ़ाई की। कश्मीर एडमिनिस्ट्रेशन की पढ़ाई के लिए सोश्योलोजी सब्जेक्ट भी मिला और इस विषय से मैं इतनी मुतासिर (इंप्रेस्ड) हुई कि लगा कि न जाने ज्ञान का कौन सा खजाना मेरे हाथ लग गया है। इस विषय को पढ़ते हुए मालूम हुआ कि मनुष्य कहां से आया, हम शादियों क्यों करते हैं, बच्चे क्यों करते हैं…इन सभी को जानकार मैं बहुत खुश हुई। मैंने खूब किताबें पढ़नी शुरू कर दीं।
मनुष्य और समाज को समझने में दिलचस्पी आने लगी। कॉलेज में वुमन कमीशन के साथ काम किया। एक्टिविस्ट बन गई। ‘मी टू’ मूवमेंट के समय कश्मीर की महिलाओं के साथ सेक्शुअल वायलेंस के बारे में दुनिया को बताया। मेरी बात मीडिया में भी गई और फिर लोगों ने मुझे ट्रोल करना शुरू किया। ट्रोलर्स के मुताबिक, कश्मीर में सेक्शुअल वायलेंस नहीं है। मुझे कहा जाने लगा कि मैं पेड एजेंट हूं। मुझसे ये काम करवाया गया। इसके बाद मैं घर में सिमट गई।
घर वाले मुझे अलग से डांटने लगे। उन्होंने मुझे आईएएस की तैयारी पर फोकस करने को कहा। फिर जब मेरी बारी आई तब कश्मीर एडमिनिस्ट्रेशन परीक्षा पर स्टे लग गया। मैंने पापा को कहा कि आईएएस की तैयारी के लिए मुझे दिल्ली भेज दीजिए ताकि मैं अच्छे से तैयारी कर पाऊं। पापा को मुझ पर विश्वास था और उन्होंने मुझे अकेले ही दिल्ली भेज दिया। इस समय मैं 21 साल की थी। मेरे खानदान में अभी तक कोई लड़की घर से बाहर पढ़ने नहीं गई थी।
दिल्ली में खिला 'दिल का फूल'
दिल्ली में ही मेरी जिस लड़के से हुई वो आज मेरे हस्बैंड हैं। दोनों साथ मिलकर सिविल सर्विसेज की तैयारी की। साथ-साथ पढ़ते हमें प्यार हो गया, जबकि हमें यह मालूम था कि हस्बैंड हिंदू हैं और मैं मुस्लिम शादी मुश्किल होगी, लेकिन प्यार तो प्यार होता है, किसी की सुनता कहां। अब आईएएस की परीक्षा पास आई, पेपर दिया और मैं पास नहीं कर पाई। ये मेरी जिंदगी का पहला फेलियर था। इसके बाद मैं ऐसा टूटी की फिर ये परीक्षा देने की नहीं सोची। कई रातें सोई नहीं। खाना नहीं खाया।
जब IAS की परीक्षा पास नहीं कर पाई
मां का फोन रोज आता और वो मुझे समझातीं कि कोई बात नहीं फिर से तैयारी कर लेना, लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था कि मैंने आज तक हर काम में सफलता पाई है। यहां कैसे हार गई। पापा की जिद पर एक बार फिर से ये पेपर दिया और इस बार मैंने बिना तैयारी के पेपर दिया। मैं परीक्षा फिर से पास नहीं कर पाई।
अब बन गई रिसर्चर
पापा से पूरे एक साल तक बहस चलती रही। इसी बीच कश्मीरी महिलाएं, कॉन्फ्लिक्ट्स और सेक्शुअल वायलेंस पर लिखना शुरू किया। फिर पॉलिसी रिसर्च के बारे में मालूम हुआ और मैंने ‘पॉलिसी पर्सपेक्टिव फाउंडेशन’ के साथ काम करना शुरू किया। यहां मैं पढ़ भी सकती थी और सोसायटी के लिए काम भी कर सकती थी।
यहां आकर कश्मीर कॉन्फ्लिक्ट्स, पॉक्सो एक्ट पर रिसर्च शुरू किया। इन सालों में मैं पॉलिसी, एक्टिविज्म, महिलाओं के हक की बात करना चलता रहा। इसी बीच यूनाइटेड नेशन की तरफ से वुमन के एक प्रोग्राम के लिए मुझे बतौर स्पीकर बुलाया गया। ये मेरे लिए बड़ी अचीवमेंट थी। अपने सभी रिश्तेदारों को बताया। सभी बहुत खुश हुए, लेकिन पापा अभी भी खुश नहीं हुए और मैंने उनकी नहीं सुनी और जेनेवा चली गई। ये मेरी पहली इंटरनेशनल फ्लाइट थी। ये 2020 का समय था। डर भी रही थी लेकिन शुरू से निडर रही हूं और अकेले उस कॉन्फ्रेंस में गई और 10 तक वहां रही।

तहमीना को विदेश में भी अपनी बात को रखने का मौका मिला।
तहमीना को विदेश में भी अपनी बात को रखने का मौका मिला।

लोगों ने किया ट्रोल
यूनाइटेड नेशन्स में कश्मीर की महिलाओं के राइट्स के बारे में बात की। मैंने वहां बताया कि कॉन्फ्लिक्ट्स की वजह से महिलाओं को कितना दंश झेलना पड़ता है। उनका मेंटल स्ट्रेस ज्यादा होता है। उन्हें एजुकेट करना चाहिए। आर्टिकल 370 के बारे के तहत मैंने बताया कि इसके हटने के बाद महिलाओं के प्रॉपर्टी राइट्स नहीं छीने जाएंगे। अगर वे कश्मीर से बाहर शादी करती हैं।
मेरी ये सारी बातें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं। मुझे लोग ट्रोल करने लगे। कहने लगे कि इसको सरकार ने पेपर पकड़ाया होगा, तभी इतना बोल रही है। कुछ लोगों ने ये भी बोला कि इसके फादर को भारत सरकार पैसा देती है तभी ये लोग इतने अमीर हैं। मेरे पापा और मम्मी के लिए जिसके मन में जो आया वो बोला। 25 साल की उम्र में मुझे इतना सबकुछ मेंटल टॉर्चर झेलना पड़ा।
हिंदू लड़के से शादी के बाद परिवार ने रिश्ता तोड़ दिया
जब मैं जेनेवा से वापस आई तो मम्मी-पापा को ये शक हो गया था कि मैं किसी लड़के के साथ रिलेशनशिप में हूं। इसके बाद खूब फैमिली ड्रामा हुआ। मेरी मेंटल हेल्थ बिगड़ने लगी। मैं रोज-रोज परिवार के ताने नहीं सुन सकती थी और मैंने यहीं दिल्ली में कोर्ट मैरिज कर ली। इसके बाद मेरी मां ने कहा कि आज के बाद हमसे बात करने की जरूरत नहीं है। अब हमारा और तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं है। इस घटना के बाद मुझे परिवार ने बागी कहना शुरू कर दिया।
अब दो साल हो गए हैं घर वालों से बात नहीं हुई है। अब मुझे ये समझ आ गया है कि जरूरी नहीं है कि दुनिया में सभी आपके काम को और आपको सराहेंगे। दुनिया बहुत कठोर है। मैंने मम्मी-पापा के बारे में सोचना छोड़ दिया। ब्लॉग, इंटरफेथ टॉलरेंस पर काम शुरू कर दिया। बच्चों को एक-दूसरे के धर्म के बारे में मोहब्बत सिखाते हैं। ससुराल वालों ने मुझे इतना प्यार दिया कि कभी मायके की याद नहीं आने देते।
हर महिला के दिमाग को पोषण जरूरी
अब हमारी लाइफ पढ़ने-लिखने और काम करने में ही निकलती है। अब मैं हर महिला को यही कहना चाहूंगी कि जरूरी नहीं कि पेरेंट्स हमेशा आपके साथ होंगे। अगर आपको कुछ बनाना है तो खुद के लिए खड़े हों। अपने दोस्त ठीक से चुनें। ताकि मुसीबत के समय वे आपकी मदद करें। पढ़ाई करें और जो पढ़ रहे हैं उस पर लिखें, बोलें और नॉलेज बटोरें। आप दिमाग को पोषण देना सीखें।

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