ये मैं हूं:40 पार की उम्र में बनी मिसेज इंडिया वर्ल्ड, अब थैलेसीमिया पीड़ित बच्चियों की बचा रही हैं जान

6 दिन पहलेलेखक: मरजिया जाफर
  • 40 के बाद ग्लैमर वर्ल्ड में कदम रखने वाली अंजुम खान मानती हैं कि हर औरत जन्म से ही ग्लैमरस होती है। बस उसे एक प्लेटफार्म चाहिए। औरतें अपने अंदर की खूबसूरती पहचानें और कुछ वक्त खुद के लिए निकालें। इसी जज्बे के साथ डेजल मिसेज इंडिया वर्ल्ड प्लेटिनम का खिताब जीता। अंजुम ग्लैमर से अलग थैलेसीमिया पीड़ित लड़कियों की मदद भी कर रही हैं। भास्कर वुमन से उन्होंने बातें शेयर कीं।

मैं महाराष्ट्र के नासिक से हूं। मैं अपने जिन सपनों को पूरा नहीं कर सकी, उसे पूरा करने की चाहत मुझे ग्लैमर की दुनिया में लेकर आई। डेज़ल इंडिया ने मुझे मौका दिया। सपनों की नगरी मुम्बई में करिअर बनाना चाहती थी लेकिन मौका नहीं मिल पाया। मेरे सपने मुझे अंदर ही अंदर झिंझोड़ रहे थे। मैंने अपनी हर जिम्मेदारी के साथ अपनी ख्वाहिशों को भी पूरा किया है।

रिश्तों की खूबसूरती को निखारा

मैंने मां, बेटी, बहन और पत्नी के तौर पर हर रिश्तों की खूबसूरती बरकरार रखने के साथ-साथ नारित्व का दर्जा सबसे ऊपर रखा है। अपने लिए तो सब जीते हैं लेकिन मैं उनके लिए जीती हूं जिन्हें मेरी जरूरत है।

औरत जन्म से ही ग्लैमरस होती है: अंजुम खान
औरत जन्म से ही ग्लैमरस होती है: अंजुम खान

प्रतियोगिता का हिस्सा बनने से पहले की तैयारी

मुझे मिसेज इंडिया वर्ल्ड में आने से पहले तैयारी करने का मौका नहीं मिला। लेकिन विश्वास था कि मैं इस कॉम्पिटिशन को जीतूंगी और उन महिलाओं के लिए कुछ करूंगी जो हालात के दबाव में आकर अपनी सपनों को मार देती हैं।

एनजीओ की शुरुआत कब की

2009 की बात है। देवस हेल्थ एंड डेवलपमेंट फाउंडेशन की शुरुआत की। मैं कुछ अलग करना चाहती थी। एक ऐसा ब्लड बैंक बनाना चाहती थी जो सिर्फ महिलाओं के लिए काम करे। मैंने देखा कि कितने लोग खून की कमी या सही समय पर ब्लड न मिलने पर जान गंवा देते हैं। इसके लिए मैंने समता ब्लड बैंक सेंटर की शुरुआत की। इस सेंटर से जरूरतमंदों को फ्री में और समय पर ब्लड मिलता है।

थैलेसीमिया पीड़ित लड़कियों की मदद का जज्बा
थैलेसीमिया पीड़ित लड़कियों की मदद का जज्बा

एक हादसे ने थैलेसीमिया पर काम करने को प्रेरित किया

ब्लड बैंक में महिलाओं के साथ एक लड़के को जॉब पर रखा। कुछ दिन बाद उसने ऑफिस आना छोड़ दिया। मैंने सोचा कि वुमन स्टाफ के साथ वो कम्फर्ट नहीं है। एक दिन अचानक उसका भाई ऑफिस आया और बोला कि वो अब इस दुनिया में नहीं है। मैं बिलकुल खामोश हो गई। उसने बताया कि भाई लम्बे समय से थैलेसीमिया की बीमारी से पीड़ित था। इससे पहले मुझे थैलेसीमिया रोग के बारे में कुछ नहीं पता था। इस हादसे ने मुझे परेशान कर दिया। मैं एक्सपर्ट्स से मिली। गूगल पर सर्च किया और थैलेसीमिया पीड़ित के लिए काम करना शुरू किया। मैंने थैलेसीमिया से पीड़ित 99 लड़कियों को गोद लिया है। उनके इलाज में उनकी मदद कर रही हूं।

सपनों की उड़ान बाकी है

जिस तरह से मैंने अपने आप को तलाशा, उसी तरह हर औरत खुद को पहचाने। लड़कियों को हायर एजुकेशन मिले ताकि वो भी दूसरों की मदद कर सकें। बाकी किस्मत का लिखा जरूर मिलता है बशर्ते मेहनत हो। जिस तरह मुझे रैंप ने रफ्तार दी है, शायद आप का प्लेटफॉर्म कुछ और हो, उसे जरूर ढूंढें।