निशिता राजपूत:जिन्होंने क्राउड फंडिंग से जुटाई 34 हजार लड़कियों की स्कूल फीस

एक महीने पहलेलेखक: श्वेता कुमारी

घर में बेटा हुआ तो ढोल-नंगाड़े बजवा दिए गए, बात जब पढ़ाई-लिखाई की आई तो बेटे को प्राइवेट स्कूल में और बेटी को सरकारी स्कूल में धकेल दिया। मैंने ये गैर-बराबरी बचपन से अपने आसपास देखी। भविष्य की बेटियों के साथ ऐसा नहीं देखना चाहती थी इसलिए अपने बल पर उनके लिए स्कूल की फीस जमा की। मैं किसी बहुत रईस खानदान से नहीं थी, लेकिन एक लड़की की जिंदगी में एजुकेशन का महत्त्व जानती हूं। अगर मैं खुद पढ़ी-लिखी नहीं होती, तो आज शायद 34, 500 बेटियों के लिए 3 करोड़ 80 लाख रुपये स्कूल फीस जमा नहीं कर पाती। ये बातें हैं गुजरात के वडोदरा की निशिता राजपूत की।

मैं न किसी संस्था से जुड़ी हूं और न मेरा अपना कोई फाउंडेशन है, लेकिन शिक्षित बेटियों को देखने का मेरा सपना है। मैं लोगों से बेटियों के लिए फंड मांगती हूं और फीस जमा करती हूं। इसी साल जनवरी में मेरी शादी हुई है। अपनी शादी की गैर जरूरी खर्चों को किनारे कर उन पैसों से मैंने 251 बच्चियों की स्कूल फीस जमा की और 21 लड़कियों के नाम से 5 हजार की एफडी कराई। बच्चियों की पढ़ाई के लिए मैंने 11 साल पहले काम शुरू किया, तब से आज तक कुल 34,500 बच्चियों के लिए 3 करोड़ 80 लाख रुपये स्कूल फीस के तौर पर जमा कर चुकी हूं। मुझे हमेशा से लगता था कि शिक्षा पर अधिकार जेंडर देखकर तय नहीं किया जाना चाहिए। फिर भी बदहाली, अशिक्षा और लड़के-लड़की के बीच समाज में ऐसा अंतर है, जो कहता है कि लड़कों की शिक्षा लड़कियों की शिक्षा से ऊपर होनी चाहिए। ये बात मुझे हमेशा खटकती रही और इसीलिए आज से 11 साल पहले मैंने तय किया कि मैं छात्राओं की शिक्षा के लिए काम करूंगी।

मेरे इस फैसले की शुरुआत 151 बच्चियों के साथ हुई। ये वो दौर था, जब किसी के दरवाजे पर जाती और बच्चियों की फीस भरने के लिए उनसे मदद मांगती, तो ज़्यादातर लोग पल्ला झाड़ लेते, लेकिन जिन लोगों ने मदद की उसके बाद से उन्होंने मेरासाथ नहीं छोड़ा। मुझे जब भी कहीं से कोई फाइनेंशियल हेल्प मिलती, उस डोनेशन की ट्रान्स्पेरन्सी बनाए रखने के लिए मैं डोनर्स तक बच्चों का बायोडाटा शेयर करती, जिससे उन्हें इस बात की जानकारी रहे कि उनके पैसे किस बच्चे की पढ़ाई पर खर्च हो रहे हैं।

अपनी कोशिशों के बाद आज मुझे इतनी मदद मिल रही है, जिससे हर दिन मैं कई बच्चियों के सपने पूरे कर पा रही हूं। मजेदार बात ये है कि इन 11 सालों के सफर में मेरी टीम सिर्फ दो की रही। मैं और मेरे पापा। हम दोनों मिलकर सारा काम देखते हैं। चूंकि मैं कोई संस्था नहीं चला रही, इसलिए लोगों को अपने साथ जोड़ना मेरे लिए नामुमकिन है। मेरा काम स्कूल और डोनर्स के बीच एक ब्रिज बनने का है। मुझे मेरा बचपन याद है, जब मैं और पापा सड़क किनारे बच्चों को केले और बिस्कुट देने जाया करते थे, तब उनका जोर इस बात पर रहता था कि इंसान अपने लिए सबकुछ करने की हिम्मत रखता है, लेकिन दूसरों के भले के लिए कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं है।

एक बार मैं अपने पापा के साथ कहीं गई थी, वहां मुझे एक बूढ़ी अम्मा दिखीं, जो सूखे चावल खा रही थीं। जब मैंने जानना चाहा कि वे ऐसा रूखा-सूखा खाना क्यों खा रही हैं, तब पता चला कि उनके आगे पीछे-कोई नहीं है और एक परिवार उन्हें टिफिन दे जाता है। घर लौटकर भी मेरा मन उन बूढ़ी अम्मा की सोच में खोया रहा। उनका घर इतना दूर था कि चाहते हुए भी हर दिन उन तक अपने घर से खाना पहुंचाना मुश्किल था। उस समय हमने एक तरकीब निकाली। अम्मा के आस-पास रहने वाली एक महिला से संपर्क किया, जो हर दिन टिफिन बनाकर उन तक पहुंचाती और बदले में उन्हें पैसे मिलते। इससे दो चीजें हुई, अम्मा को अच्छा खाना मिला और उस महिला को फाइनेंशियल हेल्प। एक अम्मा से शुरू हुआ ये सफर आज 204 बुजुर्गों तक जा पहुंचा है। इससे बूढ़े अम्मा-बाबा को अच्छा खाना और कई महिलाओं को घर बैठे रोजगार मिल सका है। हमारी ये कोशिश भी पूरी तरह से डोनेशन पर चल रही है।

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