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चुनौतियों से लड़ी, मुंडवाए सिर के बाल:लोग बोलते-बंदरिया लगती हो, लेबर हो लीडर नहीं-हद में रहो; तोड़ रही पुरुषों का गुरूर

नई दिल्ली4 महीने पहलेलेखक: भाग्य श्री सिंह

'मैं हमेशा से काफी एक्सपेरिमेंटल रही। एक अच्छी सेलरी वाली जॉब कर रही थी, लेकिन बंधे हुए रूटीन और काम के बोरिंग तरीके से तंग आकर मैंने कुछ नया और अपना शुरू करने का सोचा। 2019 में 'रंग कारवां' की शुरुआत एक्सपेरिमेंट के तौर पर की थी, लेकिन अब काम बढ़िया चल रहा है और हम इसे एन्जॉय कर रहे हैं।'

वुमन भास्कर से खास बातचीत में 'रंग कारवां' थियेटर ग्रुप की फाउंडर वंदना आशा से बताया, 'शुरू में जब मैंने घर पर रंग कारवां का आइडिया शेयर किया तो हर किसी ने मेरे फैसले पर सवाल उठाए। लेकिन कोरोना काल में मैंने अपनी टीम के साथ काफी ऑनलाइन काम किया। 2021 से हम चंपावत में हैं। यहां कारवां के तहत प्रांगण प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। टीम एजुकेशन, जेंडर और कम्युनिटी डेवलपमेंट पर भी काम कर रहे हैं।

वंदना आशा स्कूल के बच्चों को जरूरी स्किल सिखाते हुए।
वंदना आशा स्कूल के बच्चों को जरूरी स्किल सिखाते हुए।

वंदना बताती हैं, 'हम स्कूल में जा कर बच्चों की शिक्षा पर काम करते हैं। हमारा लर्निंग सेंटर भी है। लीडरशिप ट्रेनिंग, मेन्स्ट्रुअल हायजीन, जेंडर रोल के अलावा भी कई प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं।'

सफलता की राह में आए रोड़े कई

मैं 4 साल की उम्र से सरस्वती पूजा में परफॉर्म करती थी। मुझे कहानियां बहुत पसंद थीं। चंपक, नंदन, अपने से बड़ी कक्षा की हिंदी की कहानियों से ले कर तीज और करवाचौथ तक की कथा मैं पढ़ डालती थी। मैं बचपन से ही बहुत जिज्ञासु और विद्रोही स्वभाव की थी। मैं हमेशा से चीजों को लेकर कई सवाल पूछती और हर चीज को अपने नजरिये से परखती। मैं हमेशा से नियमों को तोड़ती और चीजों को अपनी तरह से करती।

करियर जर्नी का अकेलापन खलता है

अपनी करियर जर्नी में मैंने खुद को हमेशा अकेला ही महसूस किया। कोई मुझे बीए करने को कहता तो कोई एमए करने की सलाह देता। मीडिया स्टडीज की पढ़ाई का फैसला मेरा था। कोई गाइड करने वाला नहीं था। मैंने पोस्ट ग्रेजुएशन एम इन ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म में किया (स्पेशलाइजेशन इन टीवी एंड रेडियो)। ये मेरी लाइफ का टर्निंग पॉइंट था। लेकिन पहले सेमेस्टर में ही मुझे पता लगा कि मैं कितने पानी में हूं।

वंदना ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज से ग्रेजुएशन किया।
वंदना ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज से ग्रेजुएशन किया।

हालात बदलने के लिए खुद पहल जरूरी है

पढ़ाई में दिल नहीं लगता था इसलिए मैंने 'अंश' नाम की NGO संस्था में वालंटियर करना शुरू किया और भोपाल में ही थियेटर ज्वाइन किया। इसके जरिए मैंने कई छोटी-चोटी नई चीजें सीखीं। मैंने समझा कि अगर मुझे खुद कुछ करने की चाहत है तो शुरुआत मुझे ही करनी पड़ेगी। कोई दूसरा मेरी हेल्प करने नहीं आएगा।

मैंने न्यूज वेबसाइट में इंटर्नशिप की। लेकिन जब मुझे टोका जाता था कि नहीं ये न्यूज जाएगी, ये नहीं तो मुझे महसूस हुआ कि मैं इस काम के लिए नहीं बनी हूं। 5 साल जर्नलिज्म की पढ़ाई करने के बाद समझ आया कि मुझे मीडिया फील्ड में काम नहीं करना। मैं NGO के जरिए इटारसी की संस्था 'भारत कॉलिंग' से जुड़ी और महिला उद्योगपतियों से जुड़ा काम शुरू किया। 5 महीने में वहां रहकर मुझे आर्ट की कमी महसूस हुई। हमेशा खालीपन महसूस हुआ। तब मुझे समझ में आया कि मुझे थियेटर और विजुअल आर्ट्स के जरिए ही महिलाओं और बच्चों के लिए काम करना है।'

नए सफर की शुरुआत

'मुझे थियटर ऑफ़ ओप्रेस के बारे में पता चला। इस थियेटर फॉर्म को ब्राजील के अगस्तो बॉयल ने डिजाइन किया था। इसका मकसद उत्पीड़न से ग्रसित लोगों की परेशानियों को नाटक के जरिए लोगों तक पहुंचाना और उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाना है। यहीं से मेरी असली जर्नी शुरू हुई। वर्कशॉप में मैंने काफी कुछ सीखा।'

नुक्कड़ नाटक के जरिए सामाजिक मुद्दों से लड़ाई

'नवगुरुकुल' नाम की एक संस्था है जो गांव के ऐसे बच्चों, जिनके पास पढ़ाई के साधन नहीं हैं, उन्हें सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग सिखाती है। यहां लड़कियों के साथ हमने ईव टीजिंग, बॉडी इमेज इशू, टॉक्सिक मैसक्युलैनीटी और सेक्सुअल हैरेसमेंट जैसे मुद्दों से कैसे डील करना है। हमने नुक्कड़ नाटक के जरिए समाज को कई सन्देश दिए।

वंदना 'रंग-कारवां' के जरिए सामाजिक विकास के लिए काम कर रही हैं।
वंदना 'रंग-कारवां' के जरिए सामाजिक विकास के लिए काम कर रही हैं।

इसके बावजूद एक कमी खल रही थी इसलिए मैंने मोटी कमाई वाली जॉब छोड़ दी। मुझे लगा हो जाएगा जैसा कि अब तक होता आया था। लेकिन सच कहूं तो इसके बाद से मैं ठीक-ठाक पैसे नहीं कमा पाई हूं। लेकिन मैं जो कर रही हूं उसमें मुझे बहुत खुशी और संतुष्टि मिलती है।

रंग-कारवां की नींव ऐसे पड़ी

2019 में मैंने एक एक महीने अलग-अलग NGO के साथ काम किया। तभी मुझे 'रंग कारवां' नाम सूझा। रंग का मतलब थियेटर और कलर भी। और कारवां इसलिए क्योंकि लोग मेरे साथ जुड़ते जा रहे थे और कारवां बनता जा रहा था। पूरे कोरोना काल में जब पूरी दुनिया लॉकडाउन की वजह से घरों में कैद थी, तब मैंने दिमाग की चुल्ल को अंजाम देते हुए 'रंग कारवां NGO' की नींव रखी। इसे रजिस्टर किया, फंडिंग की और पूरी टीम लेकर आई।

वंदना टीम मेंबर्स को प्रोजेक्ट के बारे में समझाती हुईं।
वंदना टीम मेंबर्स को प्रोजेक्ट के बारे में समझाती हुईं।

बिना जानकारी के शुरू किया काम

बिना तैयारी के मैं एक बार फिर सोशल आंत्रप्रेन्योरशिप (कारोबार) के अनजाने समुद्र में गोते खा रही थी। मुझे इसके बारे में कुछ नहीं पता था, बिना फंड के काम किए जा रही थी। किसी ने बताया कि तुम इसके लिए पैसे जुटा सकती हो। मैंने इसके लिए कई ट्राई किया। फिर मैंने अपने काम की मार्केटिंग शुरू की। मैं अपनी काम से पूरे पैशन से जुड़ी थी और मेरी टीम भी मेरे साथ होती थी। अभी भी काम का बजट 15 लाख होता है, लेकिन हमारे पास लगभग 5 लाख रुपये ही होते हैं। फिर भी हम सर्वाइव कर रहे हैं।

काम से लगाए लोगों की जुबान पर ताले

मर्दों भरी दुनिया में 22 साल की लड़की का ये कहना कि मैं अपनी संस्था खुद शुरू करूंगी काफी मुश्किल है। इस सेक्टर में बुजुर्ग लीडर हैं। कोई मुझ पर यकीन नहीं करता। पेरेंट्स कहते थे अच्छा खासा करियर छोड़ कर तुम क्यों खाई में पैर डाल रही हो। लोगों ने कहा- तुम लीडर नहीं, लेबर हो, चुपचाप 9 से 5 की जॉब करो और घर जाओ। आज मैं 27 साल की हूं। अब मेरा काम देखकर लोगों के मुंह पर ताले लग गए हैं।

वंदना शुरू से ही विद्रोही स्वभाव की रही हैं।
वंदना शुरू से ही विद्रोही स्वभाव की रही हैं।

जब लगा अब नहीं हो पाएगा

इस बीच कई ऐसे फेज आए जब मुझे लगा छोड़ो हटाओ, नहीं करना। टीम में काफी उतार चढ़ाव आए। कोर डायरेक्टर ने टीम छोड़ दी तो मुझे अपने फैसले पर अविश्वास हुआ। लेकिन आसपास के लोगों ने मुझे विश्वास दिलाया कि तुम पिछले 4 सालों से इस पर टिकी हुई हो और तुममें जो जज्बा है कि तुम इसे आगे बढ़ा सकती हो। टीम में लड़ाई-झगड़े होते हैं। लोग छोड़ कर जाते हैं। ये जर्नी का एक पार्ट है। इसके लिए काम छोड़ने की जरूरत नहीं है।

टीम वर्क, सोशल-इमोशनल लर्निंग की पाठशाला

मैं एप्लाइड थियेटर करते हैं। मैं थियेटर को लाइफ और लर्निंग में बदलते हैं। हमारा मकसद ऐसे सेशन डिजाइन करना होता है कि लोगों को इसके जरिए खास सामाजिक सन्देश दे पाएं। हम जेंडर से जुड़े भ्रामक तथ्यों का खंडन करते हैं। कई तरह की एक्टिविटी गेम्स खेल कर हमने संदेश दिया कि जेंडर रोल किस तरह से काम करता है। काम में महिला-पुरुष जैसा कुछ नहीं होता। कोई भी कैसा भी काम कर सकता है। हम टीम वर्क और लीडरशिप सिखाते हैं। हम सोशल और इमोशनल लर्निंग सिखाते हैं। हम बच्चों, युवाओं और महिलाओं के लिए काम करते हैं।

घर में जेंडर रोल थे काफी अलग

मेरे पापा बिहार से हैं और मां यूपी से। लेकिन मेरा जन्म वेस्ट बंगाल के पानागढ़ में हुआ था। करीब 7 साल बाद हम इलाहबाद चले गए। इसके बाद हरियाणा और फिर दिल्ली चले गए। फिर वापस इलाहाबाद आ गए है। मेरी स्कूलिंग देश के अलग -अलग हिस्सों के केंद्रीय विद्यालय से हुई। इसीलिए मेरी भाषा में कोई एक्सेंट नहीं है और यह पूरी तरह न्यूट्रल है। मैं हर 2 मिनट में अपना एक्सेंट बदल सकती हूं। मेरे पापा का नेचर काफी सॉफ्ट और मां मेंटली और इमोशनली बहुत स्ट्रांग हैं। हमारे घर में जेंडर रोल बहुत अलग है। मुझे हमेशा से ऐसा लगा कि लड़कियां स्ट्रांग होती हैं। ये नॉर्मल बात है। घर का माहौल बहुत खुला हुआ था। मेरे पेरेंट्स मेरे लिए काफी सपोर्टिव थे।

वंदना आशा हमेशा से कला प्रेमी रही हैं।
वंदना आशा हमेशा से कला प्रेमी रही हैं।

मैं सबसे अलग हूं

बचपन में दोस्त मुझे मेरे चेहरे को लेकर बुली करते थी। कई बंदरिया बुलाते। बॉडी इमेज से निकलने में मुझे काफी समय लगा। इसलिए मैं लोगों को इससे निकालना चाहती हूं। मेरी प्रेरणा मेरी जिज्ञासा था। मैं हमेशा से कुछ अलग करना चाहती थी। कुछ अलग करने की ही खोज में मैंने काफी अलग-अलग स्ट्रीम चुनीं। मैं बहुत सोचती नहीं थी बस मन में ख्याल आता और मैं उस पर फोकस करके टार्गेट हासिल करती जाती हूं।

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