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बदलाव को सलाम:पहली बार पीरियड्स आए क्लासरूम में, झेली शर्मिंदगी, आज वही लड़की ले रही पीरियड्स पर क्लास

एक महीने पहलेलेखक: मीना

बात थोड़ी पुरानी है। वो शनिवार था- मेरा फेवरेट दिन, क्योंकि उस रोज हमें कोई भी ड्रेस पहनकर जाने की छूट थी। मैं अपनी पसंदीदा सफेद रंग की झालर वाली फ्रॉक पहन कर गई। थोड़ी देर बाद लगा कि सब मुझे घूर-घूरकर देख रहे हैं। ध्यान दिया तो वे मेरी फ्रॉक की तरफ इशारा करते हुए मुझे इशारों ही इशारों में कुछ समझा रहे थे। बाथरूम पहुंची और देखा तो मेरी सफेद फ्रॉक लाल हो चुकी थी। उसपर खून के ताजा-लाल धब्बे थे। मैं बुरी तरह से डर गई। शायद मुझे कोई बीमारी हो गई थी, या फिर पता नहीं क्या हुआ था?

रीना शाक्य
रीना शाक्य

घर लौटी। मां से बात हुई। उन्होंने भी खुलकर कहने की बजाय फुसफुसाते हुए कहा कि ये बात पापा से न बताऊं। जिस पापा से मैं हर बात शेयर करती थी, उनसे मुझे फ्रॉक पर उस दिन लगे खून की बात छिपानी थी। मां ने ये भी बताया कि ये खून अब हर महीने दिखेगा। तब मुझे कायदों की पूरी किताब फॉलो करनी होगी, जैसे अचार नहीं छूना, घी नहीं छूना या फिर भगवान की मूर्ति से दूर रहना। ये पीरियड्स थे, जो मुझे भगवान से लेकर घी-अचार तक से दूर कर रहे थे।

'अचार छूने पर भगवान ने नहीं दिया शाप'

मैंने अचार छुआ तो वो डेढ़ साल तक मर्तबान में सुरक्षित रहा। मूर्ति छुई लेकिन मुझे कोई शाप नहीं लगा। हां, ये जरूर था कि उस घटना के बाद मैं इतना डर गई थी कि उसके बाद से स्कूल में मेरी उपस्थिति बहुत कम हो गई, खासकर पीरियड्स में तो मैं कभी नहीं जाती थी और अपनी ‘डेट’ के कुछ दिन पहले ही स्कूल जाना बंद कर देती थी। उस दिन मुझे स्कूल में कह रहे थे कि कैसी बेअक्ल लड़की है, इसे कुछ नहीं मालूम। जब बड़ी हुई तो देखा कि यह सिर्फ मेरी कहानी नहीं थी बल्कि हजारों लड़कियों की है। लाखों लड़कियां पीरियड्स की वजह से स्कूल छोड़ देती हैं।

'एक तो लड़की ऊपर से दलित, दोनों का संघर्ष झेला'

ग्वालियर में पली बढ़ीं, रीना शाक्य ने भास्कर वुमन को बताया कि एक तो मैं लड़की थी, दूसरी दलित। दोनों का संघर्ष एक साथ झेलना पड़ा। दलित होने की वजह से जातिसूचक गालियां सुनने को गाहे-बगाहे मिल जातीं, कोई जानबूझकर देता तो कोई अनजाने में। जब दलित लड़की एक्टिविस्ट बन गई, तो समाज के लिए गले की हड्डी बन गई। मेरे शहर में कोई नेता मर गया तो शोक सभा आयोजित की जाती, कोई गरीब, मेहनतकश मरता तो उसके लिए कुछ भी नहीं? शाम को वक्त पर लड़की को ही घर क्यों पहुंचना है, भाई को क्यों नहीं? पीरियड्स होने पर मैं अपवित्र कैसे हो गई, मेरी यौनिकता से समाज की इज्जत कैसे जुड़ी है? ऐसे तमाम सवालों का पिटारा मेरे पास हमेशा रहा। इन्हीं की खोजबीन में मैंने स्कूल पूरा होने के बाद 2011 में ऑल इंडिया डेमोक्रैटिक वुमेन्स एसोसिएशन (AIDWA) से जुड़ी। यहां से महिला मुद्दों की समझ और पैनी हुई।

2015 में बनाया संगठन

पीरियड्स के बचपन का किस्सा मेरे जहन में बसकर रह गया और इस वजह से साल 2015 में नींव शिक्षा जनकल्याण समिति की स्थापना की। इसके बाद मैं अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की अध्यक्ष भी बनी। अब मैं आरक्षण बिल, जज साहब के बिगडे़ बोल, माहवारी को मैला बताने वालों से सवाल, धार्मिक आडंबर जिनमें महिलाओं को फंसाकर उन्हें सोचने समझने लायक नहीं रहने दिया जाता, इन सब पर बात करती हूं। पति के हाथों से पिटने वाली महिलाओं को उनके हक बताने का भी मैं काम करती हूं। अब कहीं भी महिलाओं के खिलाफ कुछ होता मैं अपनी कलम की तलवार लेकर पहुंच जाती। फेसबुक पर खूब लिखती हूं क्योंकि फेसबुक पूछता है ‘व्हॉट्स इन योअर माइंड।’ जिंदा इंसान हमें चुप कराते हैं, लेकिन मैं महिला किसानों का मुद्दा हो, चाहें मुस्लिम महिलाओं के हक की बात... सभी पर अपनी राय रखती हूं। पीरियड्स का लाल रंग अब मेरे लिए ‘लाल सलाम’ बन गया है।

'पीरियड्स की वजह से हजारों लड़कियां छोड़ देती हैं स्कूल'
नींव ने एक सर्वे किया तो मालूम हुआ कि दलित लड़कियां केवल 8वीं या 9वीं तक ही पढ़ पाती हैं, क्योंकि उनमें बड़ा कारण पीरियड्स था। ज्यादातर लड़कियां कपड़ा इस्तेमाल करती हैं। स्कूल गांव से दूर होता है और लड़कियों को लंबा चलकर जाना होता है, तो उनकी जांघें छिल जाती हैं। सरकारी स्कूलों में पानी, साबुन तक नहीं होता, ऐसे में कपड़ा बदल नहीं पातीं, हाइजीन की कमी की वजह से लड़कियों को यूरीन इंफेक्शन तक हो जाते हैं। कपड़ा बांधकर जाती हैं, तो उन्हें डर लगता था कि कहीं कपड़ा निकल न जाए, इसलिए उन्होंने स्कूल जाना छोड़ दिया। निशुल्क पैड्स केवल महानगरों तक है, छोटे गांवों तक नहीं।

आदिवासी महिलाएं राख, अखबार और पत्तों का करती हैं इस्तेमाल
मध्यप्रदेश में कहीं पर भी स्कूलों में फ्री सैनिटरी नैपकिन्स नहीं मिलते। मैं आदिवासी समुदायों के साथ भी काम करती हूं। वहां आदिवासी महिलाएं चूल्हे की राख, अखबार, पत्ते इस्तेमाल करती हैं। कई जगह महिलाएं पैंटी नहीं पहनती, तो कपड़े को नाड़े से बांधकर कमर से बांधती हैं, जिसकी वजह से उनकी कमर पर निशान पड़ जाते हैं। इतनी मुश्किलों में माहवारी को वो झेलती हैं, लेकिन हम नवदुर्गा पर पत्थर की मूर्तियों को पूज सकते हैं, जिंदा लड़कियों को नहीं।
मुझे लगता है जब कोई महिला अकेले लड़ती है तो उसकी कोई नहीं सुनता, लेकिन जब संगठन साथ होता है तब सब उसकी सुनते हैं। ‘नींव’ के सहारे ग्वालियर में सावित्री बाई फुले की पाठशाला भी संचालित की, जहां बच्चों को माहवारी पर भी शिक्षा दी जाती है।

'अब खुलकर रखती हूं अपनी बात'

समाज में एक धारणा है कि दलित परिवारों के बच्चे कम पढ़ते हैं, लेकिन मैंने खुद इस सोच को तोड़ा। आज सोशल वर्क में एमए कर रही हूं। साथ ही बच्चियों को पढ़ाने का भी काम करती हूं। मैं हर वो काम करती हूं जो हमारी सीमाएं तय करता है। एक बार मैंने सोशल मीडिया पर ‘जामिया मिल्लिया इस्लामिया’ में आसामाजिक तत्त्वों के कॉलेज में घुस आने पर लिखा कि ‘ये नालायाक लिंग पकड़कर लड़कियों के सामने हस्तमैथून कर रहे हैं तो सीता माता भी ये कहेंगी, तुम से अच्छा तो रावण था नालायकों।’ बस इतना ही लिखा था कि मुझे गालियां पड़नी शुरू हो गईं। मेरे मेसेंजर पर अश्लील फोटो, गालियां और धमकियां आने लगीं। ऐसी स्थिति में भी डरी नहीं और बत्तमीजों को ब्लॉक कर दिया। उस समय लगा कि हम अपनी बात भी नहीं रख सकते। लड़के कितनी ही अश्लीलता कर लें वो बर्दाश्त है, लेकिन एक लड़की जब ऐसा पोस्ट लिख दे तो वो बर्दाश्त नहीं है। लोगों के दिमाग में बैठी मनुस्मृति दिख रही थी जिसे खत्म करना था। पुरुष समाज को लगता है कि लड़की को गाली दे दो, गुस्सा कर दो, बुरी तरह ट्रोल कर दो तो वो डर जाएगी, लेकिन हम लड़कियां हैं, इतनी जल्दी हार नहीं मानते। मेरे इस तरह खुलकर लिखने के बाद मैं लड़कियों के लिए आदर्श बनने लगी। मुझे लगता है कि हर लड़की को अपनी बात को कहना चाहिए और सच का साथ देना चाहिए। अगर आप सच्चे हैं तो आपको उस भगवान से भी नहीं डरना चाहिए जिसकी आप पूजा करते हैं।

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