नवाबों के घर से निकली कथक डांसर:रायगढ़ के राजा ने दिया था क्लासिकल डांस को बढ़ावा, मैंने कथक में मिलाया बैले

नई दिल्लीएक महीने पहलेलेखक: संजय सिन्हा

बनारस घराने की सितारा देवी को पूरी दुनिया जानती है। वो सितारा देवी जिन्होंने कथक की बारीकियों से सभी को रू-ब-रू कराया। ऐसे ही रायगढ़ घराने की मशहूर नृत्यांगना हैं यासमीन सिंह। यासमीन ने कथक को नई दिशा दी। कथक के पारंपरिक डांस के तौर-तरीकों में बदलाव किया। उनके डांस के स्टेप्स देख लोग खो जाते हैं। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उन्होंने प्रदर्शन किया है। आज के ये मैं हूं यासमीन सिंह की कहानी, उन्हीं की जुबानी।

यासमीन सिंह ने गुरु-शिष्य परंपरा के तहत कथक सीखा और इसकी डिग्री भी ली।
यासमीन सिंह ने गुरु-शिष्य परंपरा के तहत कथक सीखा और इसकी डिग्री भी ली।

स्कूल से ही सीखने लगी थी कथक

मैं मध्यप्रदेश की रहनेवाली हूं। ग्वालियर, भोपाल और इंदौर तीनों जगह रही हूं। इंदौर के संत जोसेफ कॉन्वेंट से पढ़ाई पूरी की। मेरी मां ताहिरा हसन उत्तर प्रदेश के रामपुर के नवाब फैमिली से थीं। तब के समय की वह पोस्ट ग्रेजुएट रहीं थीं। पिता आरएफ हसन बैंक मैनेजर थे, इस वजह से उनका एक शहर से दूसरे शहर ट्रांसफर होता रहता था। मेरे दादा जी सिंधिया राजघराने में मंत्री रहे थे।

पढ़ाई के लिए 7 साल कथक से दूरी

मेरी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई भोपाल से हुई। तीसरी कक्षा के बाद इंदौर आ गई। यहां संत राफेल स्कूल में पढ़ाई की। वहां डांस को लेकर मेरे पैशन पर प्रिंसिपल ने मेरे पिता से कहा कि यासमीन को क्लासिकल डांस सिखाना बेहतर होगा। वहां स्कूल में कथक सिखाया जाता था। गुरु मधुकर ने मुझे कथक सिखाया। हालांकि, 10वीं में पहुंची तो पूरी तरह पढ़ाई पर फोकस किया। आगे एमए तक मैंने कथक से ब्रेक ले लिया।

रायगढ़ घराने में यासमीन ने कथक को मॉडर्न रूप में ढालने की कोशिश की है।
रायगढ़ घराने में यासमीन ने कथक को मॉडर्न रूप में ढालने की कोशिश की है।

स्विमिंग में नेशनल लेवल तक पहुंची

मैंने फाइन आर्ट्स, इतिहास और होम साइंस से ग्रेजुएशन किया। कॉलेज में आर्ट से जुड़ी सभी गतिविधियों में भाग लेती थी। पेंटिंग, डेकोरेशन, डिजाइनिंग। बरकतुल्ला विश्वविद्यालय से मैंने इतिहास में एमए किया। कॉलेज में स्टेज के साज-सज्जा का काम भी करती थी। स्पोर्ट्स में एक्टिव रही थी। बैडमिंटन, जूडो और स्विमिंग में भाग लेती थी। स्विमिंग में मैं नेशनल लेवल तक पहुंची।

ओडिसी डांस नहीं सीख पाई

मैं बेंगलुरु गई। नृत्यांगम में प्रोतिमा बेदी का ओडिसी सेंटर था। वहां कथक सीखने को नहीं मिला। जबकि बचपन से मैं कथक ही सीख रही थी। इसलिए ओडिसी नहीं सिख पाई।15-20 साल डेवलेपमेंट सेक्टर में जॉब किया। एडॉप्शन सेंटर में काम किया। बाद में सोशल वर्क में डिग्री लेने पर मैंने स्वच्छता पर काफी काम किया।

यासमीन द इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस से जुड़ी ऑर्टिस्ट रहीं हैं।
यासमीन द इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस से जुड़ी ऑर्टिस्ट रहीं हैं।

खैरागढ़ यूनिवर्सिटी से कथक में डिग्री ली

मैंने गुरु शिष्य परंपरा में कथक तो सीख लिया था। लेकिन 2005 में जब रायपुर आई तब खैरागढ़ विश्वविद्यालय के फर्स्ट ईयर ऑफ डिप्लोमा में एडमिशन लिया। फिर कथक में एमए किया। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में मैं टॉपर रही थी। फिर इसमें पीएचडी भी की। मुझे सीनियर फेलोशिप अवार्ड भी मिला। तब मैंने संस्थागत रूप से कथक के क्षेत्र में तालीम पूरी कर ली थी।

कथक के प्रेजेंटेशन पर रहा जोर

मैंने 2008 से कथक में परफॉर्मंस देना शुरू किया। साथ ही म्यूजिकल प्रोडक्शन बनाना शुरू किया। तब मैंने सोचा कि कथक को नई दिशा देनी चाहिए। कथक में बैले बनाना शुरू किया। कथक के कास्ट्यूम में बदलाव किया। लाइट्स डिजाइन की। ज्यादा फोकस कोरियोग्राफ पर रहा। म्यूजिक फ्यूजन पर काम किया। सामूहिक नृत्य में बदलाव किया। मैं 2014 तक सोलो परफॉर्मेंस देती रही। इस दौरान नृत्य नाटिकाओं पर काम शुरू किया।

रायगढ़ घराने में कई गुरुओं का योगदान

आजादी से बहुत पहले 1925-26 की बात है, जब रायगढ़ में राजा चक्रधर सिंह हुआ करते थे। 15 वर्ष तक उन्होंने लखनऊ और जयपुर घराने के गुरुओं को बुलाया। उन्होंने कथक को बढ़ावा देना शुरू किया। लोक नर्तक जिसे गंबत कहते हैं, उन्हें कथक की तालीम दिलवानी शुरू की। डांस कॉम्पिटिशन का आयोजन करवाते थे। उन्होंने कलाकारों को बढ़ावा दिया। राजा चक्रधर सिंह खुद क्लासिकल डांसर और तबला वादक थे। उन्होंने नई बंदिशें बनाईं। नृत्य, ताल, राग और इंस्ट्रूमेंट पर चार अलग-अलग किताबें लिखीं। रायगढ़ घराने से चार डांसर निकले, जिन्होंने पूरे मध्यप्रदेश में इसे लोकप्रिय बनाया।

सिविल सर्विसेज में थे पति, उनका मिला साथ

मेरे पति सिविल सर्विसेज में थे। एमए के बाद शादी की। मैं मुस्लिम परिवार से थी, जबकि वह आजमगढ़ के राजपूत परिवार से थे। लेकिन उनकी फैमिली शुरू से प्रगतिशील विचारों वाली रही थी। मेरे पति बचपन के ही दोस्त थे। एक तरह से फैमिली फ्रेंडस रहे। तब हमलोगों ने तय किया कि शादी करेंगे। इस तरह शादी हुई। पति ने और मेरे दो बच्चों ने हमेशा मेरे काम और मेरे पैशन को सपोर्ट किया।

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