• Hindi News
  • Women
  • This is me
  • Quit Software Engineer's Job With Big Money, Started Business With Clippings With Village Women, Work Going On From Instagram

ये मैं हूं:सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मोटी रकम वाली नौकरी छोड़, गांव की महिलाओं के साथ शुरू किया कतरनों से बिजनेस, इंस्टाग्राम से चल रहा काम

5 दिन पहलेलेखक: मीना

‘बड़ी कांच की इमारतें। एसी से जड़े ऑफिस। सब तरफ चमकती दीवारें। सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मेरी वेल पेड जॉब। सबकुछ होते हुए भी मुझे खुद में खालीपन लगता। रोज ऑफिस जाती और बिना किसी संतुष्टि के वापस लौटती। जब नौकरी शुरू की थी तब तो खूब मजा आ रहा था। पांच दिन काम करते और शनिवार-रविवार पार्टी, लेकिन ये पार्टी-वार्टी का चस्का कुछ दिन बाद खत्म हो गया और फिर मैं अपने आप से ही पूछने लगी कि क्या मैंने ये सब करने के लिए ही पढ़ाई की थी? शायद, नहीं। तीन साल बाद प्रमोशन मिल रहा था और सैलरी भी बढ़ रही थी लेकिन मैंने सब कुछ छोड़ दिया और ‘कला’ की स्थापना की। ये शब्द हैं आंत्रप्रेन्योर ज्योति के।

ज्योति राजस्थान में गांव की महिलाओं के साथ काम करती हैं।
ज्योति राजस्थान में गांव की महिलाओं के साथ काम करती हैं।

राजस्थान में काम करने वाली ज्योति वुमन भास्कर से कहती हैं, ‘मैं हरियाणा में पली-बढ़ी। बीटेक भी यहीं से किया। विप्रो में नौकरी मिली और मैं ग्रेटर नोएड आ गई, लेकिन यहां सबकुछ ठीक नहीं लग रहा था। एक खालीपन रोज सताता। फिर, मैंने शनिवार रविवार अनाथ आश्रम में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया।
बच्चों को पढ़ाने में मन जमता था
इन बच्चों को पढ़ाते हुए अहसास हुआ कि मुझे इनके साथ ज्यादा मजा आता है। दिन बहुत खुशी-खुशी कटता है। विप्रो में तीन साल निकालने के बाद जब मुझे प्रमोशन मिल रहा था और साथ में सैलरी भी बढ़ रही थी। तब मैंने उस नौकरी को ‘टाटा बाय-बाय’ कर दिया। उस वक्त सभी दोस्त कह रहे थे कि पागल हो गई हो, जो इतनी अच्छी नौकरी छोड़ कर रेत में जा रही हो। गांव में जाकर काम करोगी। पर, पापा ने मेरा सपोर्ट किया।
गांधी फेलोशिप के साथ शुरू हुआ बिजनेस का सफर
मैंने गांधी फेलोशिप का फॉर्म भर दिया। 2016 से 2018 तक फेलोशिप चली और फेलोशिप के लास्ट ईयर में मुझे राजस्थान के झुनझुन जिले का नवलगढ़ ब्लॉक मिला। यहां स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के दौरान एक स्टूडेंट की मम्मी रुकसार बानो से मेरी मुलाकात हुई।

ज्योति ने 'कला' की शुरुआत कर महिलाओं को रोजगार दिलाया।
ज्योति ने 'कला' की शुरुआत कर महिलाओं को रोजगार दिलाया।

महिलाओं के पास नहीं थे आजीविका के स्रोत
24 साल की उम्र में रुकसार के तीन बच्चे थे। वे सब मध्य प्रदेश से आए हुए थे। वो ऐसी मां थीं जो बस अपने बच्चों को पढ़ाना चाहती थीं, पर उनके पास पैसे नहीं थे। उनके पति भी काम नहीं करते थे। तब मुझे लगा कि मैं इन महिलाओं के लिए क्या करूं कि इनके बच्चे पढ़ पाएं और इन्हें भी काम मिल पाए। तब मैंने पांच औरतों के साथ मिलकर हर औरत से 30-30 रुपए जमा किए। दर्जी के पास जाकर कतरनें लेकर आए और फिर छोटे-छोटे पाउच बनाए।
ऐसे हुई ‘कला’ की शुरुआत
इन पाउचिस को हमने अपने दोस्तों को दिखाया और बेचा। तब मुझमें थोड़ा मोटिवेशन आया कि हम इन महिलाओं के साथ मिलकर कुछ काम शुरू कर सकती हूं। तब 2018 में कला की शुरुआत हुई। अभी हम इंस्टाग्राम के जरिए ही अपने प्रोडक्ट्स बेचते हैं। इनमें ऊन के बने गर्म कपड़े से लेकर ज्वेलरी तक होती है। रक्षाबंधन पर राखी भी ऊन की बनाते हैं और छोटे-छोटे बैग भी ऊन के बनाते हैं।
पूरा बिजनेस इंस्टाग्राम से चलता है
अभी हमारा सारा बिजनेस इंस्टाग्राम से ही चल रहा है। इन प्रोडक्ट्स की डिजाइनिंग, स्टिचिंग सब कुछ गांव की महिलाएं ही करती हैं। ऐसे कपड़े जो टेलर के लिए खराब होते हैं। वह जब उन्हें फेंकने को होता है तो उन्हें हम ले लेते हैं। क्योंकि वे कतरनें हमारे काम की होती हैं।
आज गांव की ही बेटियों को जोड़कर मॉडलिंग भी कराती हूं और प्रोडक्ट्स के फोटो का शूट उनके साथ कराती हूं, जिसके पास अच्छा फोन होता है उससे फोटो शूट करते हैं। अभी 10 महिलाएं मेरे साथ जुड़ी हुई हैं। लैपटॉप बैग, पाउचिस, क्रोशिए के काम, स्कार्फ, मफलर ये सब हमारी महिलाएं बनाती हैं।

ज्योति गांव की बेटियों को मॉडल बनाती हैं।
ज्योति गांव की बेटियों को मॉडल बनाती हैं।

अब महिलाएं अपने काम खुद कर लेती हैं
अब हमारे साथ जुड़ी महिलाएं यूट्यूब से नए-नए डिजाइन खुद सीखती हैं। वॉट्सऐप और इंस्टाग्राम चला लेती हैं। जब हमारा काम थोड़ा ठीक चल गया तो हमने उस पैसे से सिलाई मशीन खरीदी। पुराना स्मार्टफोन खरीदा। हमने इस छोटे से बिजनेस से लाखों नहीं कमाएं हैं बल्कि महिलाओं ने अपनी आजादी कमाई है। पहले इस गांव की महिलाएं घर से कहीं बाहर नहीं जा पाती थीं लेकिन, पिछले तीन साल में वे जयपुर अकेले चली जाती हैं। घर वालों को या आसपास किसी को भी कोई जरूरत है उसे पूरा करने के लिए तैयार रहती हैं। कला के लिए फैब्रिक खुद खरीदने जाती हैं। बना हुआ सामान खुद सोशल मीडिया पर पोस्ट कर लेती हैं।
मेरे पापा किसान हैं और हरियाणा जैसे राज्य में लड़कियों को वैसे ही बहुत बाहर नहीं निकलने दिया जाता लेकिन मेरे पेरेंट्स ने मुझे आगे बढ़ने से कभी नहीं रोका। आज मेरी तीन महीने की बेटी है, जिसके साथ इस बिजनेस को संभालती हूं। ससुराल भी इस काम में बहुत सपोर्ट करता है।

कपड़ों की कतरनों को जोड़ कर बनाती हैं प्रोडक्ट्स
कपड़ों की कतरनों को जोड़ कर बनाती हैं प्रोडक्ट्स

जो करना है उसे कर डालो
आपको जो करना है उसे कर डालो। सोचो मत। किसी काम को शुरू करने में चुनौतियां तो आती हैं लेकिन उनसे घबराओ मत, आगे बढ़ो। ऐसा जिंदगी में बहुत बार होगा कि आपके दोस्त अपनी अच्छी-अच्छी सेल्फी डाल रहे होंगे और दिखा रहे होंगे कि वे अपनी जॉब से कितने खुश हैं, लेकिन आप हिम्मत न हारें। आपने जो सोचा है उस पर अड़े रहें। क्योंकि उस काम में जब सफलता मिलेगी तो वो आत्मसंतुष्टि सबसे बड़ी होगी।