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तबीयत खराब हो तो भी चाहते मेकअप में रहो:ऐसी फैमिली का रिश्ता खारिज किया, ‘शार्क टैंक’ से बदली किस्मत; अब सबकी संवार रही सेहत

नई दिल्ली17 दिन पहलेलेखक: ऐश्वर्या शर्मा
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मैं शयान्तनी मंडल, गुरुग्राम में रहती हूं। मैं कोलकाता में पली-बढ़ी। कई साल तक जॉब करने के बाद मैंने खुद का बिजनेस शुरू किया। मैं अपनी कमाई का कुछ हिस्सा लड़कियों की एजुकेशन के लिए डोनेट करती हूं। मैं चाहती हूं कि हर लड़की पढ़े-लिखे ताकि उन्हें अपने अधिकार पता हो। वह सही-गलत को पहचान सकें और जब उनके साथ कुछ गलत हो तो वो उसके खिलाफ आवाज उठा सकें।

पेरेंटिंग और स्कूलिंग के दौरान आई लीडरशिप क्वालिटी

मैं अपने पेरेंट्स की एकलौती औलाद हूं। मेरे पापा मर्चेंट नेवी में रहे हैं और मां हाउसवाइफ। बंगाल में लड़कियों की खूब इज्जत की जाती है। मैंने अपने घर में पापा को वो सारे काम करते देखा है जो मां करती हैं। उन्होंने कामों को लेकर कभी जेंडर का भेद नहीं किया और मुझे भी पूरी फ्रीडम दी।

मैं कोलकाता में गर्ल्स स्कूल में पढ़ी हूं। वहां मैं महिला के तौर पर स्ट्रॉन्ग बनी। क्योंकि वहां हर लड़की को सक्षम बनाने पर जोर दिया जाता है। लीडरशिप क्वालिटी भी मुझमें वहीं से आई।

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गलत हुआ तो आवाज उठाई

मेरा रिश्ता एक नामी गिरामी परिवार से जुड़ने जा रहा था। उस परिवार की समाज में छवि ऐसी थी कि वह महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देता है। वुमन फ्रेंडली काम करता है। लेकिन यह सब दिखावा था।

वह चाहते थे कि मैं टीचर की जॉब करूं, समय से घर आऊं। खाना बनाना न आना उनकी नजरों में पाप था। उनके अनुसार भले ही तबीयत खराब हो लेकिन मेकअप करना जरूरी था। उनकी सोच थी कि सफेद रंग के कपड़े मैं न पहनूं क्योंकि उस रंग का कनेक्शन विधवा औरतों से होता है।

शहर में रह रहे पढ़े-लिखे अमीर घर के लोगों की इतनी छोटी सोच देखकर मैं हैरान रह गई। हालांकि समय रहते मुझे उनकी सच्चाई पता चल गई और मैंने उनसे ताल्लुक खत्म कर दिया।

लेकिन इस किस्से के बाद मेरे दिमाग में यह बात बैठ गई कि जब यह चीजें मेट्रो सिटी में हो रही हैं तो गांव में तो महिलाओं का और बुरा हाल होगा और वह इन हालातों के साथ सहज हैं क्योंकि उन्होंने अपनी मां के साथ भी ऐसा होते देखा होगा। यह सोचकर अक्सर लड़कियां आवाज नहीं उठाती।

दिल्ली में जॉब शुरू की

मैंने दिल्ली के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी से ग्रेजुएशन की। इन 4 सालों में मैंने फैशन जर्नलिज्म, ग्राफिक्स डिजाइनिंग, कम्युनिकेशन टूल्स, मार्केटिंग जैसे तमाम विषयों की पढ़ाई की।

मैंने निफ्ट के बाद एक इवेंट कंपनी में जॉब की। उसके बाद इंटीरियर और होम फर्निशिंग कंपनी में भी काम किया। कुछ समय के लिए फैशन राइटर भी रही।

इस दौरान मुझे कॉन्टेंट, कम्यूनिकेशन जैसे कई विभागें को संभालने का मौका मिलेगा। मुझे इस काम में बहुत मजा आया क्योंकि उसमें सीखने को बहुत कुछ था। मेरी हमेशा कोशिश रहती है कि मैं ज्यादा से ज्यादा काम की जिम्मेदारी लूं और उसे अच्छे से करूं। कोई भी सीखा हुआ काम, पता नहीं भविष्य में कब काम आ जाए।

कस्टमर की सोच को नौकरी के दौरान समझा

यूं तो मैंने 12वीं में मेडिकल साइंस पढ़ी है। लेकिन हेल्थ और ब्यूटी विभाग से मैं मैन और ग्रोफर्स नाम की कंपनी से जुड़ी। यहां सेल्फ केयर ब्रैंड की समझ आई।

मैंने कंपनी में प्रोडक्ट लॉन्च, इंग्रीडिएंट, प्रोडक्ट कैसे और क्या काम करता है, कस्टमर टीम, डिजाइनर को समझाना, कॉन्टेंट, ब्रैंड कम्यूनिकेशन सब काम अकेले हैंडल किया। यहां मैंने काफी कुछ सीखा।

ग्रोफर्स जॉइन किया तो मैंने ब्यूटी और पर्सनल केयर डिपार्टमेंट के जरिए समझा कि कस्टमर्स को ब्यूटी और पर्सनल केयर में क्या चाहिए।

लोगों को इस चीज से दिक्कत नहीं कि उनकी स्किन खराब हो रही है या बाल झड़ रहे हैं। बल्कि उन्हें इस चीज से दिक्कत है कि वह अच्छे नहीं दिख रहे। इसके लिए वह 10 रुपए का भी शैंपू यूज करेंगे और हजार रुपए का भी।

कोरोना के दौर में नौकरी छोड़ बिजनेस करने का आया ख्याल

कोरोना की पहली वेव के समय ग्रोफर्स ने ब्यूटी और पर्सनल केयर डिपार्टमेंट बंद करने का फैसला किया और पूरे स्टाफ को ग्रोसरी में शिफ्ट होने को कहा। मुझे इसमें कोई रुचि नहीं थी।

मैंने सोचा कि यही मौका ही कि नौकरी से निकलकर अपना काम शुरू किया जाए। इसके बाद मैंने और मेरे बिजनेस पार्टनर ने पहला लॉकडाउन रिसर्च करने में गुजारा कि आखिर हम किस चीज का बिजनेस करें।

जब खुद हुई हेल्थ प्रॉब्लम, तब मिला बिजनेस का आइडिया

मैं ग्रेजुएशन के बाद से लगातार घर से दूर रह रही हूं। ऐसे में खाना-पीना और लाइफस्टाइल बिगड़ ही जाता है। जॉब जब चल रही थी तब सेहत पर ध्यान नहीं दिया था लेकिन लॉकडाउन लगा तब ध्यान गया कि मेरी स्किन खराब होने लगी है। जॉइंट्स में दर्द रहता है और नींद भी पूरी नहीं होती। यह सब न्यूट्रिशन की कमी की वजह से हो रहा था क्योंकि मैं अच्छी डाइट नहीं ले पा रही थी।

रिसर्च के दौरान पता चला कि न्यूट्रिशन सप्लीमेंट्स इन दिक्कतों को दूर कर सकते हैं। मार्केट में यह कई पाउडर, पिल्स और कैप्सूल के तौर पर मौजूद हैं लेकिन कैंडी नहीं।

फिर मेरे और मेरे बिजनेस पार्टनर के दिमाग में आया कि इसी का बिजनेस शुरू किया जाए। कैंडी टेस्टी भी लगती है, दवा जैसा फील भी नहीं कराती और शरीर को सेहतमंद भी रखती है। भारत में कैंडी के रूप में न्यूट्रिशन सप्लीमेंट मौजूद भी नहीं है।

जितनी सेविंग थी, सब बिजनेस में लगा दी

जब आप जॉब कर रहे होते हैं, तो आपको पता होता है कि महीने की 1 तारीख को सैलरी मिल जाएगी। लेकिन बिजनेस में ऐसा नहीं होता। मन में थोड़ा डर भी था कि अगर बिजनेस नहीं चला तो? फिर तुरंत दूसरा ख्याल आया कि अगर नहीं चला तो जॉब दोबारा शुरू कर लूंगी।

रिस्क लेकर मैंने अपने को-फाउंडर के साथ ब्यूटी एंड हेल्थ का बिजनेस शुरू किया और अपनी 6 साल की पूरी सेविंग लगा दी। हमने अपनी कंपनी का नाम “वॉट्स अप ब्यूटी” रखा।

बिजनेस 22 लाख रुपए से शुरू किया था लेकिन प्रोडक्ट मार्केट में आते ही इतना पॉपुलर हो गया कि 25 लाख रुपए की हर महीने सेल होने लगी। यह देख बहुत खुशी हुई। हमारे पहले प्रोडक्ट की कैंडी अच्छी स्किन, नाखून और बालों की हेल्थ से संबंधित थी।

शयान्तनी मंडल अपनी के को-फाउंडर वैभव के साथ
शयान्तनी मंडल अपनी के को-फाउंडर वैभव के साथ

दूसरा प्रोडक्ट लॉन्च करने के नहीं थे पैसे, 500 इन्वेस्टर्स ने किया रिजेक्ट

हमें अपने बिजनेस को एक ही प्रोडक्ट तक सीमित नहीं रखना था। लेकिन दूसरा प्रोडक्ट लॉन्च करने के लिए हमारे पास पैसे नहीं थे। हमने कई इन्वेस्टर्स से फंड रेज करने के लिए कॉन्टेक्ट किया। लेकिन कोई हम पर पैसा लगाने को तैयार नहीं था। हमें 500 से ज्यादा इन्वेस्टर्स ने रिजेक्ट किया। वो एक ऐसा दौर था जब मुझे थोड़ा डर लगा क्योंकि हमारा बिजनेस अच्छा चल रहा था और मैं इसे हमेशा ऐसा ही रखना चाहती थी। लेकिन फिर किस्मत पलटी।

दरअसल जब मैं बिजनेस को लेकर रिसर्च कर रही थी, तब मैं खर्चे कम करने के लिए दोबारा कोलकाता रहने लगी थी। इसी दौरान 'शार्क टैंक' शो का विज्ञापन टीवी पर आ रहा था। मैंने और बिजनेस पार्टनर वैभव ने इसमें भाग लेने के लिए फॉर्म भर दिया था। आखिरकार हमारा सिलेक्शन हुआ और पिछले साल अगस्त में शूटिंग हो गई। लेकिन तब हमें यह नहीं पता था कि सोनी चैनल पर यह एपिसोड आएगा भी या नहीं। इस बारे में हमने किसी को नहीं बताया था।

27 फरवरी 2023 को यह एपिसोड दिखाया गया। उसके बाद से बिजनेस में अच्छी ग्राेथ हो गई। अभी मार्केट में हमारे 3 प्रोडक्ट हैं।

कमाई का 1% हिस्सा बच्चियों की एजुकेशन को जाता है

मैं भले ही बिजनेस कर रही हूं लेकिन महिला सशक्तिकरण पर हमेशा फोकस रहता है। मैं चाहती हूं कि देश की हर बच्ची पढ़े। इसलिए जब कारोबार शुरू किया तभी सोच लिया था कि जो भी कमाऊंगी, उसका 1% हिस्सा बच्चियों की शिक्षा को दूंगी ताकि वह स्कूल जा पाएं।

इसके लिए मैंने ‘गिव इंडिया’ नाम की एनजीओ से संपर्क किया। मेरा मानना है कि अगर हम लड़कियों की एजुकेशन पर इन्वेस्ट करेंगे तो उसका रिटर्न समाज को अच्छे रूप में ही मिलेगा।

कुछ लोगों के कमेंट्स ने दिल दुखाया

लड़की अगर बिजनेसवुमन हो तो लोग सोचते हैं कि उन्हें बहुत आसानी से सब कुछ हासिल हो गया होगा क्योंकि वह एक ‘लड़की’ है।

उन्हें लगता है कि लड़की सुंदर है और स्माइल करेगी तो बिजनेस करने में दिक्कत नहीं आएगी। मुझे कुछ लोगों से ऐसे कुछ सुझाव भी मिले। एक व्यक्ति ने मुझसे कहा कि आप अपनी ब्रैंड की फेस बन जाओ क्योंकि लड़कियों को लोग देखना पसंद करते हैं। यह सुझाव मुझे अच्छा नहीं लगा। अगर वह नारी सशक्तिकरण का उदाहरण देने के तौर पर मुझे ब्रैंड ऐंबैस्डर बनने के कहते तो मुझे ज्यादा अच्छा लगता।

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