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रेड लाइट एरिया में की नौकरी:देह-व्यापार में महिलाओं की हालत देख छोड़ी जॉब, बेजुबान जानवरों के लिए करती हूं काम, रवीना टंडन भी फैन

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: दीक्षा प्रियादर्शी

सफर मुश्किल ही सही, लेकिन इरादे नेक हों तो रास्ते मिल ही जाते हैं। ये शब्द हैं हरियाणा के करनाल की विभा चुग के। विभा चुग नोएडा में ‘सखा एक पहल’ के नाम से संस्था चलाती हैं। उनकी संस्था में निठारी में रहने वाली करीब 80 महिलाएं काम कर रही हैं, ये महिलाएं क्रोशिया से डॉग्स स्वेटर, बच्चों के लिए सॉफ्ट टॉयज, फ्रॉक, सॉक्स, स्वेटर और पिलो कवर जैसी कई चीजें बनाती हैं।

विभा बताती हैं, ‘मैं तीन भाई-बहनों में पिता की सबसे लाडली रही हूं। बचपन से ही मैं 'ब्रेक द स्टिग्मा' यानी कुछ अलग कर दिखाने में विश्वास रखती थी। मैं अपने कॉलेज की पहली लड़की थी, जो वाइस प्रेसिडेंट बनी’। पढ़िए विभा की कहानी, उन्हीं की जुबानी-

रेड लाइट एरिया में लगी पहली नौकरी

1993 में गवर्नमेंट कॉलेज करनाल से ग्रेजुएशन करने के बाद मैं मास्टर्स करने के लिए कुरूक्षेत्र यूनिवर्सिटी चली गई। यूनिवर्सिटी के दिन बहुत मजेदार थे। मुझे लोगों से मिलना-जुलना, बातें करना हमेशा से पसंद था। यूनिवर्सिटी में रहने और अपने कोर्स के दौरान मुझे इसका पूरा मौका मिला। कॉलेज के साथ-साथ मैं एक एनजीओ के साथ इंटर्नशिप भी कर रही थी।

उसी दौरान दिल्ली पुलिस की तरफ से जरूरतमंद महिलाओं और बच्चों के लिए एक इनिशिएटिव शुरू किया था 'प्रयास', जिसे दिल्ली पुलिस के डीआईजी अमोद कंठ लीड कर रहे थे। इंटर्नशिप के दिनों में इन्होंने मेरा काम देखा था, इसलिए उन्होंने मुझे अप्वाइंट कर लिया। उनकी तरफ से मुझे मेरा पहला प्रोजेक्ट मिला शादीपुर रेड लाइट एरिया में, जहां मुझे महिलाओं और बच्चों की मदद और उन्हें जागरूक करने का काम दिया गया।

मुझे खास कर रेड लाइट एरिया में काम करने वाली महिलाओं को संबंध बनाते समय होने वाली बीमारियों के प्रति जागरूक करने और प्रोटेक्शन यूज करने के लिए समझाने और बच्चों की पढ़ाई के लिए काम करने के लिए कहा गया। मैंने इससे पहले महिलाओं को इतनी परेशानियों के साथ जूझते नहीं देखा था। कुछ दिनों तक काम करने के बाद मुझे समझ आया कि शायद सोशल वर्क मेरे लिए नहीं है। 23 साल की उम्र में ऐसी जगह पर काम करना, जिसे न कभी जाना, न देखा, मेरे लिए ये एक कल्चरल शॉक की तरह था। मुझसे वो सब देखा नहीं गया और मैंने नौकरी छोड़ घर वापस लौटने का फैसला किया। पापा को इस बारे में बताया तो उन्होंने भी इस फैसले में मेरा साथ दिया।

विभा के पिता ही उनके सबसे बड़े मेंटर रहे हैं।
विभा के पिता ही उनके सबसे बड़े मेंटर रहे हैं।

कंपनी के डायरेक्टर ने दी एमबीए करने की सलाह

पापा के साथ घर गई तो जॉब छोड़ने की बात को लेकर मम्मी बहुत नाराज हुईं। उन्होंने मुझे बहुत डांटा कि जब पढ़ाई सोशल वर्क में की, तो काम भी वही करना होगा। मां खुद पीडब्ल्यूडी डिपार्टमेंट में जॉब करती थी, तो वह नौकरी के महत्व को समझती थी। पिताजी ने मां को समझाया और मुझसे पूछा कि अब क्या प्लान है, क्या करोगी।

मुझे किसी से पता चला कि एक फॉर्मा कंपनी में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव की जरूरत है। मैंने पापा से कहा कि मुझे ये जॉब करनी है। मां ने कहा, ‘पागल हो गई हो क्या, ये जॉब तो सिर्फ लड़के करते हैं।’ मैंने कहा कि मैं यही जॉब करूंगी। मैंने इंटरव्यू दिया। शायद मैं पहली फीमेल थी पूरे शहर में जो ये इंटरव्यू देने गई। खुशी की बात ये थी कि मुझे हायर कर लिया गया। मैं टारगेट पूरा करने में सफल रही, इसलिए साल भर में मुझे एरिया सेल्स मैनेजर बना दिया। 2 साल बाद मुझे उस कंपनी का रीजनल सेल्स मैनेजर बना दिया गया, जिसके बाद मैंने उस रीजन में तीन-चार लड़कियों को हायर किया।

मुझे कंपनी के डायरेक्टर ने सजेस्ट किया कि तुम सेल्स में अच्छी हो, तुम्हें आगे के करियर के लिए एमबीए जरूर कर लेना चाहिए। मैंने उनकी बात मानी। एक बार फिर पिताजी ने मेरा सपोर्ट किया और मेरा एडमिशन आईएमटी गाजियाबाद में करवा दिया। यहां पढ़ाई करने के बाद 2000 कैंपस सेलेक्शन में एक अमेरिकन कंपनी, जो हेल्थकेयर सेक्टर के लिए काम करती है, उन्होंने मुझे हायर कर लिया। हायर करने के बाद 2 महीने की ट्रेनिंग के लिए मुझे अमेरिका भेज दिया। अमेरिका में मेरी पूरी ट्रेनिंग जॉन हॉपकिंस हॉस्पिटल में हुई थी।

साइंस बैकग्राउंड से न होने के बावजूद विभा ने वह टर्मिनोलॉजी सीखी जो हेल्थकेयर में इस्तेमाल की जाती है।
साइंस बैकग्राउंड से न होने के बावजूद विभा ने वह टर्मिनोलॉजी सीखी जो हेल्थकेयर में इस्तेमाल की जाती है।

शादी के लिए छोड़ी जॉब

मल्टीनेशनल कंपनी के साथ जुड़ने के बाद साल 2003 में मुझे शादी के लिए जॉब छोड़नी पड़ी। मैं अपने हसबैंड मुकेश चुग को शादी से पहले से जानती थी। हम दोनों कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में साथ पढ़े। वो मैकेनिकल इंजीनियर हैं और जब घर में शादी की बात चल रही थी तो इजिप्ट में काम कर रहे थे। उस समय मैंने प्यार और जॉब में से प्यार को चुना और हमारी शादी हो गई।

मैं पति के साथ इजिप्ट और पेरिस में रही। हालांकि, हम 6 महीने बाद ही इंडिया वापस आ गए। हम नोएडा में रहने लगे, वापस आकर मैं दुनिया की जानी-मानी फार्मा कंपनी मर्क फार्मा के साथ जुड़ी।कुछ मेडिकल कंडीशन के कारण मैं बायोलॉजिकली मां नहीं बन पाई। 2008 में मैंने बेटी 'कायना' को गोद लिया। 6 महीने में ही ए़डॉप्शन का प्रोसेस पूरा हो गया। इसके लिए भी लोगों ने मुझे कहा कि बहुत समय लगेगा, आईवीएफ के लिए ट्राई कर लो, अपना बच्चा अपना ही होता है। हालांकि, सभी के दबाव में आकर हमने ट्राई किया, लेकिन आईवीएफ भी सफल नहीं रहा। मेरी बेटी के आने के कुछ सालों बाद यानी 2017 में, जब मुझे लगा कि उसे मेरी ज्यादा जरूरत है, मैंने जॉब छोड़ दी और फिर मैं घर में रहने लगी।

विभा की लाइफ में दो ऐसे मौके आए जब उन्होंने करियर छोड़ परिवार को चुना।
विभा की लाइफ में दो ऐसे मौके आए जब उन्होंने करियर छोड़ परिवार को चुना।

इस दौरान मैं अपने घर की छत से अक्सर कुछ बच्चों को मिट्टी में खेलता देखती। एक दिन मुझे पता चला कि ये एक क्रेच है, जिसे ऋषि पाल सिंह नाम के व्यक्ति चलाते हैं। उन्होंने गरीबों के बच्चों के लिए अपने घर का एक एरिया क्रेच बना दिया था, जहां वो बिना पैसे लिए बच्चों को पूरा दिन रखते और उन्हें एक वक्त का खाना भी देते। मेरा मन हुआ कि मैं उनकी मदद करूं। ​​​​मैंने उन बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। बाद में सोसाइटी की कुल 25 महिलाएं जुड़ीं और ऐसे कर के ये स्कूल चल गया। बाद में स्कूल 5वीं तक हो गया। मैं उस समय उन महिलाओं को सखा बुलाती थी।

बेजुबान जानवरों के कारण मिला महिलाओं को रोजगार

कोरोना के बाद सारे स्कूल बंद हो गए। उस समय किसी का बाहर तक निकलना बंद हो गया था। ऐसे में सड़क पर रहने वाले कुत्तों को खाने के लिए कुछ नहीं मिल पाता था। घर के पास सड़क पर रहने वाले कुत्ते भूख से रात भर रोते थे। मुझ से रहा नहीं गया। मैं रोजाना उन कुत्तों को खाना देने लगी। इसके लिए मेरे साथ सोसाइटी के लोग भी जुड़े। इस दौरान मुझे कुछ पुलिस वालों ने कहा कि आप जानवरों को तो खाना खिला रही हैं, थोड़ी मदद इंसानों की भी कर दीजिए।

हालांकि, उस समय तक मुझे लगता था कि कितनी भी परेशानी हो इंसान तो किसी तरह खुद का पेट भर ही लेते हैं। पशुओं को खाना खिलाने के दौरान एक लड़का मेरी मदद करता था, वो निठारी में ही रहता था। वो मुझे एक महिला के घर ले गया। जब मैं निठारी गई तो मुझे समझ आया कि मैं कितनी गलत थी। शाम का समय था महिला आटा गूंध रही थी। मैंने देखा कि उसने आटे में दो चम्मच लाल मिर्च मिला दी। मैं हैरान रह गई और कहा कि ये आपके बच्चों के लिए बहुत हानिकारक है। उसने मुझे जो जवाब दिया वो आज भी मुझे याद है। उसने कहा, 'मैडम ये हानिकारक जरूर है, लेकिन इससे मेरे बच्चे कम खाना खाएंगे।' उसने बताया कि​​​​​​ ऐसा कर के वो एक वक्त का खाना दो वक्त चला लेती है।

रवीना टंडन ने भी मेरे काम को सराहा

मैंने थोड़ी रेकी की तो मुझे पता चला कि वहां रहने वाली ज्यादातर महिलाओं को सिलाई, कढ़ाई, बुनाई का काम आता है। उसके बाद मैं हर महीने जो 30 हजार रुपए बेजुबान जानवरों के खाने के लिए लगाती थी, उससे मैंने इन महिलाओं के लिए ऊन खरीदा। फिर मैं उन्हीं की गलियों में बैठकर उनसे क्रोशिया से डॉग्स स्वेटर, सॉफ्ट टॉयज, फ्रॉक, स्वेटर, सॉक्स जैसे कई तरह के प्रोडक्ट बनवाने लगी। मैंने इस संस्था को ‘सखा एक पहल’ के नाम से रजिस्टर किया। सोशल मीडिया पर इसके लिए पेज बनाया। हमारे प्रोडक्ट के लिए आज पूरे देश, यहां तक कि विदेशों से भी ऑर्डर आते हैं। शुरुआत में मेरे साथ सिर्फ 30 महिलाएं जुड़ी थीं। आज मैं 80 महिलाओं को काम देने में सफल हो पाई हूं।

हम आज भी निठारी एरिया में रहने वाले कुल 400 डॉग्स को खाना खिलाते हैं और उनकी देखभाल करते हैं। रवीना टंडन, जो एक बहुत बड़ी डॉग लवर हैं, उन्हें जैसे ही मेरे काम के बारे में पता चला, उन्होंने खुद मेरे काम की तारीफ की। मुझसे मिलकर मेरा मनोबल भी बढ़ाया। उनके अलावा हम मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत से भी मिले, वो भी हमारे काम की तरीफ कर चुके हैं। उन्होंने संस्था के लिए काम करने वाली एक महिला से हमारी बनाई हुई राखी भी बंधवाई।

रवीना टंडन भी विभा के काम की सराहना कर चुकी हैं।
रवीना टंडन भी विभा के काम की सराहना कर चुकी हैं।

आने वाले दिनों में हम बच्चों के कपड़े और खिलौनों पर ज्यादा फोकस करने वाले हैं। छोटे बच्चे प्लास्टिक के खिलौने मुंह में डालते हैं। ऐसे में ऊन के इस्तेमाल से बने ये प्रोडक्ट एक अच्छा रिप्लेसमेंट है। मेरा सपना है कि मैं इसी तरह काम करूं और ज्यादा से ज्यादा महिलाओं की मदद कर सकूं।

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