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पति की मारपीट से तंग आकर छोड़ा घर:बच्चे संग मेड के घर रात गुजारी, 'रंगभूमि' थियेटर से लोगों की जिंदगी में भर रही खुशी

नई दिल्ली4 महीने पहलेलेखक: भाग्य श्री सिंह

'पति से रात भर लड़ाई और मारपीट से तंग आकर मैंने अपने बच्चे के साथ सुबह जब घर छोड़ा तो मेरे पास रहने का ठिकाना नहीं था। 2 दिन मैं अपनी मेड के पास रही। इसके बाद सिर पर छत का इंतजाम हुआ। कुछ दिन डिप्रेशन में रही, लेकिन सपनों पर भरोसा था। हिम्मत करके दोबारा उठी और 'रंगभूमि : ए हैप्पी प्ले ग्राउंड' की नींव पड़ी।'

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में जन्मी चेतना मेहरोत्रा 'रंगभूमि : ए हैप्पी प्लेग्राउंड' नाम का थिएटर ग्रुप चलाती हैं। यह काव्यात्मक थिएटर है, जिसमें बिना स्क्रिप्ट के नाटक किया जाता है। वो इस अनोखी कला को 'ड्रामा फॉर लर्निंग एंड रिफ्लेक्शन ऑफ लाइट' कहती हैं। उनका उद्देश्य लोगों के चेहरे पर मुस्कान बिखेरना है। चेतना ने वुमन भास्कर से अपनी दास्तां साझा करते हुए बताया, 'घरेलू हिंसा से तंग आकर जब मैंने घर छोड़ने का फैसला लिया तो पति बच्चे को छीनना चाहते थे। शुरुआती सफर में मुश्किलें आईं, लेकिन साहस, उम्मीद और हुनर के दम पर मैंने हार नहीं मानी और थिएटर की शुरुआत की। '

दादी और मां हैं मेरी प्रेरणा

मैंने हमेशा अपनी दादी और मां को मजबूत महिला की तरह देखा। दादा जी काफी जल्दी गुजर गए थे, दादी ने अपने बलबूते पर 3 बच्चों को पाला। मेरी मां ने खुद के नाम पर सिलाई सेंटर खोला। हम बच्चे जिद करते कि दुकान को हमारा नाम दीजिए। लेकिन मम्मी ने अपनी पहचान के लिए इसे अपना ही नाम दिया। शुरू में ही मैंने दादी और मां को देखकर यह समझ लिया था कि किसी भी महिला की अपनी पहचान होनी जरूरी है।

सिंगल मदर चेतना के बेटे ने 4थी क्लास के बाद घर से पढ़ाई पूरी की।
सिंगल मदर चेतना के बेटे ने 4थी क्लास के बाद घर से पढ़ाई पूरी की।

12 साल की उम्र में सीखा कथक

मेरी शुरुआती पढ़ाई दून कल्चरल स्कूल से हुई। 12 साल की उम्र से ही मैंने कथक सीखना शुरू कर दिया था। मेरे स्कूल में डांस, कला जैसी चीजों को काफी बढ़ावा दिया जाता था। शनिवार को स्कूल में बोनफायर होता, मूवी दिखाई जाती और सब डांस करते। मुझे शुरू से ही ऐसा माहौल मिला। 12वीं कक्षा में उस समय में स्कूल में रिवाल्विंग स्टेज था। मैं जब उस पर डांस करती तो बहुत खुश होती।

कॉलेज ने दी हिम्मत और ताकत

दिल्ली यूनिवर्सिटी के कमला नेहरू कॉलेज से मैंने इंग्लिश लिटरेचर में हॉनर्स किया। यह मेरी जिंदगी का काफी क्रिएटिव फेज था और मैंने बहुत कुछ सीखा। कॉलेज में फैशन शो और डिबेट में पार्टिसिपेट कर मेरी हिचक एकदम खत्म हुई। नुक्कड़ नाटक में मैं अपनी टोली के साथ लोगों के बीच जाती और हम एक्टिंग के जरिए हम खास संदेश देते।

स्कूली बच्चों का अभिनय करतीं चेतना मेहरोत्रा।
स्कूली बच्चों का अभिनय करतीं चेतना मेहरोत्रा।

ब्लाइंड डेट से की शादी

इस दौरान मेरे दोस्त ने मुझे एक शख्स से मिलने को कहा। मुझे बड़ा एडवेंचरस लगा, क्योंकि मैं जिसे जानती नहीं थी उससे मिलने जा रही थी। लोग अमूमन ऐसी मुलाकातों से डरते हैं, लेकिन मैं उत्साह से भरी थी। मैं शख्स से मिली, बातचीत की, कॉफी पी। पहली मुलाकात अच्छी रही तो हम आगे भी मिले। करीब डेढ़ महीने बाद उन्होंने मेरे माता-पिता से मिलने की इच्छा जताई और रिश्ते को आगे बढ़ाने की बात की। मैंने मीटिंग अरेंज की और मां-पापा को सब ठीक लगा और मेरी शादी हो गई।

बुरे सपने में बदली शादी

शादी के शुरू के 4 साल ठीक रहे। इसके बाद पति मेरे साथ दोबारा दिल्ली आए। तभी से मारपीट का सिलसिला शुरू हुआ। मैं प्रेग्नेंट हुई, लगा सब ठीक हो जाएगा। लेकिन कुछ भी ठीक नहीं हुआ। हालात दिन-ब-दिन खराब होते गए। बेटा बड़ा हो रहा था। कई बार पति ने उसके सामने ही हाथ उठाया। एक बार उन्होंने मेरा लैपटॉप फेंका और लड़ाई की। बेटा मेरे पास आया और उसने कहा कि कोई बात नहीं। सब सही हो जाएगा। मैंने सोचा जब इतने छोटे बच्चे को यह बात समझ आ सकती है तो इस आदमी को क्यों नहीं समझ आ रही है।

चेतना थिएटर के जरिए लोगों के जेहन में बैठे डर को निकालती हैं।
चेतना थिएटर के जरिए लोगों के जेहन में बैठे डर को निकालती हैं।

माता-पिता नहीं चाहते थे रिश्ता टूटे

मैं अपने बच्चे को ऐसा बचपन और परवरिश नहीं देना चाहती थी इसलिए मैंने घर छोड़ने का फैसला लिया। मेरे पास बचत के 25,000 रुपये थे। मुंबई जैसे महंगे शहर में रहने के लिए मुझे पेरेंट्स से आर्थिक मदद लेनी पड़ी। तब मैंने उन्हें बताया कि मेरे जीवन में क्या चल रहा है। वो नहीं चाहते थे कि मैं अलग रहूं,लेकिन पानी सिर से पार हो गया था।

कांटों भरा रहा शुरुआती सफर

पहले मैं पेरेंट्स और पति की वजह से थिएटर नहीं कर पाई थी। लेकिन अब करना चाहती थी। 35 साल की उम्र में मैं दुविधा के दोराहे पर थी। जिसका एक रास्ता नौकरी की तरफ जाता था और दूसरा थिएटर। मैंने बहुत सोचा तो इरादा किया कि अब कुछ अपना ही करना है। जिंदगी शायद दूसरा मौका न दे इसलिए मैंने अपने सपने जीने के ठानी। थिएटर के लोगों से कांटेक्ट किया और छोटे मोटे प्रोजेक्ट लिए जिसमें 4 से 5 हजार रुपये मिल जाते थे। घर का खर्चा चलता रहा। कई बार बैंक अकाउंट में केवल 300-400 रुपये ही होते। मैं नहीं जानती थी कि अगला दिन मेरे लिए क्या लेकर आएगा। लेकिन लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया।

चेतना, रोशन और अपने ग्रुप के साथ थिएटर परफॉर्म करती हुईं।
चेतना, रोशन और अपने ग्रुप के साथ थिएटर परफॉर्म करती हुईं।

स्कूल के बच्चों से मिला 'रंगभूमि' का आइडिया

कांदिवली के एक स्कूल ने परमानेंट टीचर के तौर पर काम करने के लिए बुलाया। मैंने हमेशा कॉर्पोरेट में एडल्ट्स के साथ काम किया था इसलिए मैं यह काम करना नहीं चाहती थी। लेकिन पैसे का जुगाड़ करना भी जरूरी था इसलिए मैंने हामी भरी। जब मैं क्लास में पहुंची तो बच्चों में गजब का उत्साह था। वो यह जान कर खुश थे कि उन्हें बैठकर पढ़ाई नहीं करनी होगी। इस क्लास में वो खुद को जाहिर कर पाएंगे। तब मेरे दिमाग में 'रंगभूमि' का आइडिया क्लिक किया।

चॉइस मेरे लिए आध्यात्मिक शब्द

पाउलो कोएलो की किताब अल्केमिस्ट में लिखा है 'पूरी शिद्दत से कोशिश करो, पूरी कायनात मदद करेगी'। यह बात एकदम सच है। मेरे पूजा घर में देवी की मूर्ति के साथ एक किताब रखी है चॉइस। यही मेरे जीवन का मूल है। टॉक्सिक शादी से निकल कर थियेटर शुरू करने के पीछे मेरी 'चॉइस' ही थी।

थिएटर के जरिए बच्चों में खुशियां बिखेरतीं चेतना।
थिएटर के जरिए बच्चों में खुशियां बिखेरतीं चेतना।

बेन रिवर्स की वर्कशॉप की अटेंड

जब मैंने निश्चय किया और चुनाव किया तो यूनिवर्स ने भी मेरी मदद की। अफ्रीका से बेन रिवर्स उसी साल बड़ौदा थियेटर वर्कशॉप के लिए आए और महज 5 हजार रुपये में मैं 15 दिन की वर्कशॉप कर पाई। कुल 30 लोग थे जिसमें से सिर्फ मैं ही प्लेबेक थियेटर कर रही हूं।

प्यार को दोबारा चुना

मैंने अपनी जिंदगी में दोबारा प्यार को चुना। मेरे नए पार्टनर काफी संवेदनशील, केयरिंग और लविंग हैं। वो मुझे मेरे पास्ट ट्रॉमा से उबरने के लिए पूरा समय दे रहे हैं। वो मुझे कॉफी भी बना कर देते हैं और बहुत ख्याल रखते हैं। मैं, मेरा बेटा और पार्टनर तीनों खुशी-खुशी साथ रहते हैं।

चेतना देश और विदेश में शो करती हैं और लोगों को प्लेबैक थिएटर सिखाती हैं।
चेतना देश और विदेश में शो करती हैं और लोगों को प्लेबैक थिएटर सिखाती हैं।

एप्लाइड थिएटर है रंगभूमि

'रंगभूमि' दरअसल एप्लाइड थिएटर है। इसे ‘थियेटर ऑफ थेरेपी’ कह सकते हैं। इंडिया में कोई यह नहीं सिखाता था। हमने दो साल पहले 'रंगभूमि' एप्लाइड थिएटर कोर्स लॉन्च किया है। यह दरअसल काव्यात्मक थिएटर है। इसे एकाएक नाट्य प्रदर्शनी भी कहते हैं जिसमें बिना स्क्रिप्ट के अभिनय किया जाता है। हम इंडिया में कई जगह वर्कशॉप कर चुके हैं। हम कॉर्पोरेट से भी जुड़े हैं। इसमें हम महिलाओं के साथ होने वाले पे गैप और भेदभाव पर काम करते हैं। हम ओपन वर्कशॉप करते हैं। थिएटर के जरिए हम बॉडी ट्रॉमा को बाहर निकालते हैं।

घरेलू हिंसा के खिलाफ उठाएं आवाज

लड़कियों को यह सिखाना बंद करना चाहिए कि जहां शादी होगी वहीं से अर्थी भी उठेगी। अगर पार्टनर कुछ गलत करे या आप अच्छा महसूस न करें, वहीं से संभल जाना चाहिए। पार्टनर मारपीट करें तो शुरू में ही अपने गार्जियन को बताएं ताकि सब समय रहते ठीक हो जाए और आपको खून के घूंट न पीना पड़े। गलत रिश्ते से तुरंत बाहर आना चाहिए। पेरेंट्स को लड़कियों को शुरू से ही स्किल सिखानी चाहिए ताकि परेशानी आने पर लड़कियां अपनी आजीविका कमा सकें।

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