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जुनून:कहानी उस बहू की जिन्होंने शादी के 15 साल तक संभाला घर और खोला अपना स्कूल

3 दिन पहलेलेखक: मीना

बनारस जहां इश्क भी है जुनून भी। मलंग लोग, मदमस्त गलियां, घाटों पर ‘गंगा’ के गंभीर ठहराव के बीच मेरा जन्म हुआ। हरतीरथ मेरा मोहल्ला जहां यौवन के पहले का सारा बसंत उमड़-घुमड़कर खिला। ऋषिकेश से अठखेली करती निकली गंगा बनारस में आकर जैसे शांत और ठहर जाती है, वैसे ही मेरे जुनून पर शादी के बाद पॉज लग गया। पर ये पॉज था ज्यादा समय तक नहीं रहा और एक दिन अपना स्कूल खोल लिया। हम बात कर रहे हैं मिठास और खटास के रस से भरा शहर बनारस की कल्पना यादव की।

डायरेक्टर करूणा यादव
डायरेक्टर करूणा यादव

भास्कर वुमन से बातचीत में करूणा कहती हैं, ‘चार बहनों के बीच बड़ी लड़की जिसके पास बहुत सपनों के साथ-साथ जिम्मेदारी का पुलिंदा भी। पिता जी की छोटी सी घड़ी की शॉप जिससे हमारा गुजारा चलता। बड़ी बेटी थी इसलिए लगता कि अपने पिता के लिए क्या कर जाऊं कि उनका हाथ बटाऊं? पर पिता चाहते थे कि बेटी खूब पढ़े-लिखे उनका नाम रोशन करे। उनका यही सपना करने के लिए मैंने खूब पढ़ाई की। बनारस से ही बीए किया।
‘अच्छा रिश्ता मिल गया और शादी हो गई’
स्कूल-कॉलेज तक खूब प्रतियोगिताओं में आना जाना। पैरों में जैसे स्प्रिंग लगी थी कि कहीं रुकते ही नहीं। उस उम्र में लगता कि मैं तारे भी तोड़ कर ला सकती हूं। खूब पढ़ती। नंबर वन आने की कोशिश करती। मां-पापा चाहते थे कि मैं टीचर बनूं, पर तब तक अच्छा रिश्ता मिल गया और मेरी शादी।
‘सबकुछ होने के बावजूद कुछ नहीं था’
मध्यमवर्गीय परिवार बिजनेसमैने फैमिली में आ गई। यहां बड़ी बहू नहीं थी तीसरे नंबर पर थी। जॉइंट फैमिली उनके रस्मों-रिवाज और उन्हीं में साड़ी से लिपटी मैं। बनारसी साड़ी की कमी नहीं हुई कभी। शरीर पर जेवरों की शोभा कम नहीं हुई। सबकुछ होने के बावजूद बहूत कुछ नहीं था।
‘सोशल लाइफ से हाउसवाइफ बन गई’
एक दिन पति पर घुटन का गुबार फोड़ दिया। इतना पढ़ी-लिखी। इतनी होनहार। सोशल लाइफ चाहती थी। हाउसवाइफ बनकर रह गई। आगे पीएचडी करनी थी क्योंकि नाम के आगे डॉ. करूणा यादव लगाने का ख्वाब था, लेकिन शादी के बाद जिंदगी ऐसी संपन्न हुई कि मैं मुंह ही नहीं खोल पाई कि किसी से कहूं कि मुझे कुछ और भी करना है। अपने सपनों को अपने मन में रखा। जिस घर में सभी बिजनेसमैन हों, घर में नौकरानी हो उस घर की बहू नौकरी की बात कैसे कहे?

बच्चों के साथ करूणा
बच्चों के साथ करूणा

मां के साथ-साथ टीचर भी बनी
इसी उधेड़बुन में तीन बच्चे हो गए। बच्चों के साथ-साथ मेरा भी सपना बड़ा हुआ। उनकी मां के साथ-साथ बेस्ट टीचर बन गई। उन्हें इतनी शिद्दत से पढ़ाती कि स्कूल में उनके बहुत अच्छे नंबर आते। पर ब्लैकबोर्ड तक न पहुंचने की कसक हमेशा रहती। ससुराल में भी सबकुछ संभालना था। कमतर तो कभी नहीं रही। न स्कूल में न घर में, तो ससुराल में कैसे रहती! अच्छी पत्नी बनी, बहू बनी, मां बनी और हर उस रिश्ते में जमी रही जो जरूरी थी।
ससुर जी ने दिया मौका
सबके सपने पूरे करते मेरे सपने धूमिल होने लगे। मालूम नहीं हुआ कि शादी के 15 साल निकल गए और मैं आज भी घर में ही हूं। कहते हैं ईश्वर के घर में देर है अंधेर नहीं। मेरे सब्र का फल मिला और ससुर जी ने मेरे भाव को समझा। मैं कुछ करना चाहती थी, उसके काबिल भी थी। उसकी भाप बाबू जी तक पहुंची तो उन्होंने मेरी मदद की। बात कुछ यूं हुई कि मेरी जेठानी की बेटी का एक्सीडेंट हुआ और उसे फैमिली डॉक्टर के पास लेकर गए।
...और ऐसे खुला स्कूल
बाबू जी ने डॉक्टर साहब से कहा कि हमारी एक जमीन खाली पड़ी, समझ नहीं आ रहा है कि उसका कैसे इस्तेमाल करूं? तो सुझाव आया कि करूणा को क्यों नहीं लेकर आते हैं। वो आपकी पढ़ी-लिखी और नॉलेजेबल बहू है और वो कुछ करना भी चाहती है। नर्सरी टू फीफ्थ तक तो बहुत अच्छे से चला सकती है। बस मेरे फादर इन लॉ घर आए और बोले करूणा आपको ये स्कूल खोलना है। इस तरह 2003 में खुला बसंत पब्लिक स्कूल। ये बनारस में ही है। आज मेरे स्कूल में 1310 बच्चे हैं और हर वर्ग से पढ़ने आते हैं। अगर मैं उस दिन ससुर का जी ये मौका नहीं अपनाती तो जिंदगी भर मलाल रहता कि कुछ कर नहीं पाई।

परिवार की मदद से खोला स्कूल
परिवार की मदद से खोला स्कूल

'आपमें जो हुनर है उसे अपनाएं'
नाम के आगे डॉक्टर लगाना था। वो तो नहीं कर पाई लेकिन आज अपने स्कूल की डायरेक्टर हूं। बच्चे को भी डॉक्टर बनाया है। हमेशा हर फील्ड में रहती थी और आज अपने स्कूल को भी नंबर वन बनाने की कोशिश है। जिस भी महिला में अपना जो भी हुनर है उसे आगे बढ़ाएं। परिवार की बंदिशों में न बधें रहें।

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