सीतापुर से सशक्तिकरण तक:ग्रामीण महिलाओं की ऐसी ‘नारी अदालत’ जहां बिना पैसे और सिफारिश के मिलता है न्याय

23 दिन पहलेलेखक: मीना

‘सीतापुर के एक ब्लाक में कीचड़, गाद और पानी से भरे तालाब में महिलाओं का एक झुंड लगा हुआ है। ये महिलाएं इस तालाब से कोई खजाना नहीं ढूंढ़ रहीं बल्कि किसी महिला की डेड बॉडी ढूंढ़ रही हैं। उस महिली का डेड बॉडी जिसे गांव में प्रचारित कर दिया गया है कि वो भाग गई है। पर असल में घरेलू हिंसा के मामले में उस मारकर तालाब में फेंक दिया गया। पुलिस दूर खड़ी तमाशा देख रही थी और कह रही थी ये महिलाएं पागल हो गई हैं तालाब में कुछ नहीं है, लेकिन महिलाओं के इस समूह ने उस तालाब से लाश ढूंढ़कर निकाली। ये कोई आम महिलाएं नहीं बल्कि नारी अदालत की वे चीटियां थीं जो किसी भी महिला के साथ हिंसा होने पर उनके घर सूंघते हुई पहुंच जातीं।’ 2008 में घटी इस घटना का जिक्र करते हुए सीतापुर की नारी अदालत की मुखिया अनुपम लता बताती हैं नारी अदालत की महिलाओं ने ये कोई पहला मामला नहीं सुलझाया था बल्कि इससे पहले भी महिला हिंसा, दहेज, हत्या से लेकर जमीन विवाद के मामले भी सुलझाए हैं।

सीतापुर की नारी अदालत
सीतापुर की नारी अदालत

‘महिला सामाख्या’ में जिला कार्यक्रम समन्वयक रह चुकीं अनुपम लता भास्कर वुमन से बातचीत में कहती हैं, ‘महिला सामाख्या भारत सरकार का कार्यक्रम था जो पिछले साल ही बंद हो गया। उसी कार्यक्रम से जन्मा नारी अदालत सीतापुर में आज भी बिना बजट के चल रहा है। सीतापुर में इस नारी अदालत की शुरुआत महिलाओं के साथ मिलकर हमने की। एक ऐसी अदालत जहां महिलाएं ही महिलाओं के मुद्दे बिना पैसे के सुलझाती हैं। दोनों पक्षों के मुद्दे लिखे जाते हैं और फिर आपसी सहमति से फैसला लिया जाता है। महिलाओं को जोड़ने के लिए जब हमने स्वंय सहायता समूह बनाने शुरू किए थे तब बहुत मुश्किलें सामने आईं। जब पहली बार महिलाओं को जोड़ने निकली तो पुरुषों ने हमें देखकर घर के दरवाजे बंद लिए। महिलाएं घर में कैद हो गईं। उनके पुरुष कहते, अरे पता नहीं कहां से आई हैं, तुमको बेंच देंगी, तुमको बहका देंगी। इनके साथ मत जाओ...ऐसे इल्जाम लगते।
मैं कोरा कागज थी
जब ‘महिला सामाख्या’ में काम शुरू किया तब कोरा कागज थी। महिलाओं के मुद्दे समझ नहीं आते थे। मैं खुद रूढ़िवादी विचारधारा से ग्रसित थी। आठवीं के बाद ताऊजी ने कहा, रामायण पढ़ने लायक पढ़ाई हो गई है। अब बंद करो, लेकिन मैंने अपने ननिहाल में जाकर चुपके से हाई स्कूल का फॉर्म भरा और इंटर तक की पढ़ाई छुपछुपाकर की। मेरे पिताजी बचपन में ही एक्सपायर हो गए। जब महिला सामाख्या से जुड़ी तब तो ग्रेजुएशन भी पूरा नहीं हुआ था। अब एमए हो गया है। महिला सामाख्या में इतना मान-सम्मान मिला और जब 1998 से फील्ड में निकली तो महिलाओं की मदद करने का मौका मिला। मैंने जिस गांव में जैसी परेशानियां दिखीं वैसे महिलाओं के समूह बनाए।
जब महिलाओं को मिला सम्मान
कोई गरीबी-हिंसा से जुड़ा, कोई शिक्षा से कोई सरकारी योजनाओं से तो कोई कानूनी मदद के लिए जुड़ा। हर महिला की अलग परेशानी थी वो उस परेशानी को लेकर हमारे साथ जुड़ी। 6 महीने बाद महिलाओं की ट्रेनिंग ‘महिला सामाख्या’ के ऑफिस में हुई। महिलाओं को जब दफ्तर में रहना, खाना, बिस्तर सबकुछ की व्यवस्था मिली तो वे खुश हुईं। क्योंकि अभी तक महिलाओं को पैर की जूती समझा जाता था और जब उन्हें यहां सम्मान और प्यार मिला तो वे खुश हुईं और बैठकों में शामिल होना शुरू कर दिया। महिलाएं कहतीं, ‘इतना सम्मान तो हमें मायके और ससुराल में भी नहीं मिलता। ये नारी सशक्तिकरण का स्वतंत्र कार्यक्रम था।’

अनुपम लता
अनुपम लता

ऐसे बनी नारी अदालत
महिलओं के जुड़ने पर मालूम हुआ कि किसी महिला को जड़ी-बूटियों की समझ है तो उसको स्वास्थ्य कोर टीम में शामिल कर दिया। किसी को योजनाओं में दिलचस्पी थी तो उनको पंचायत कोर टीम, महिलाओं के दुख दर्द से दोस्ती रखने वाली को कानून कोर टीम और जो महिलाएं शिक्षा से जुड़ी थीं उन्हें शिक्ष कोर टीम में रखा गया। जब इन टीमों पर काम होने लगा तो कानून टीम से ही नारी अदालत का मंच निकलकर आया। इस अदालत के पास कोई जमीन विवाद में सताई महिला तो कोई घरेलू हिंसा की शिकार आती है। दहेज से लेकर महिलाओं के साथ बलात्कार जैसे मामलों पर भी नारी अदालत काम करती है।
पति मीटिंग में पीटने लगते थे…
हमने गांव की महिलाओं को बोल बसंतो जैसे फिल्में दिखाकर, नाटक और पोस्टर के जरिए कानून की समझ दी। महिलाएं अनपढ़ थीं लेकिन ये तो जानती थीं कि जिस घर में मारपीट होती है वहां घर बिखर जाते हैं। बिचारी महिलाएं नारी अदालत की मीटिंग में बैठी होती थीं और उनके पति परमेश्वर आकर उन्हें घसीटकर मीटिंग से घर ले जाते थे और कहते ‘खाना हम खुद निकालकर खाएंगे। तुम आकर मीटिंग करोगी।’ पहले महिलाएं जब पिटती थीं तब कोई उन्हें बचाने नहीं जाता था लेकिन अब सीतापुर में एक भी महिला पिटती है तो नारी अदालत की महिलाएं उन्हें बचाने चली जाती हैं। ये संगठन की ताकत होती है।
पुरुष भी समझने लगे नारी अदालत की अहमियत
ये कोई पहली नारी अदालत नहीं थी बल्कि उत्तर प्रदेश में 2020 तक 19 जिलों में 150 नारी अदालतें चल रही थीं, लेकिन अब इनमें से कितनी चल रही हैं मालूम नहीं। पहले जो पुरुष अपनी पत्नियों को बैठकों में आने से मना करते थे अब वे भी उन पर भरोसा करने लगे। इसके पीछे की वजह थी कि अगर घर में कलेश होगा और मामला थाने-कचहरी पहुंचेगा तो उसमें पैसा लगेगा और परिवारों के पास पैसा होता नहीं। इसलिए वे नारी अदालत को अच्छा मानते थे। क्योंकि यहां तीन चार महीने में मामला निपट जाता था।
अब हमारी अदालत में पड़ोस के गांवों के भी मामले आते हैं। नारी अदालत का लेटर पैड बना दिया था। जब भी कोई मामला आता तो हम दोनों पक्षों के पास लेटर भेज देते और फलां तारीख पर उन्हें बुलाते। लोग लेटर देखकर ही डर जाते थे। कोई विधायक का सोर्स लगाकर आता था तो किसी को लेकर आता था, लेकिन जब यहां आते थे तो देखते कि ये तो महिलाएं ही बैठी हुई हैं।

फिल्म, नाटक और पोस्टर के जरिए दी जाती है महिला मुद्दों की समझ
फिल्म, नाटक और पोस्टर के जरिए दी जाती है महिला मुद्दों की समझ

सर्विस करने जुड़ी थी पर ये आंदोलन था
मैं महिला सामाख्या कार्यक्रम में सर्विस के लिए जुड़ी थी लेकिन ये तो पूरा आंदोलन था। यहां काम करते-करते रात को देर हो जाती। आवासीय ट्रेनिंग होती तो रात के 10 बज जाते। तब घर में सुनने को मिलता कि अरे दिन भर काम करो रात में घर आओ। ये सब भी शुरुआती दौर में हुआ बाद में सब ठीक हो गया।
महिला सामाख्या कार्यक्रम बेशक बंद हो गया है लेकिन सीतापुर में नारी अदालत आज भी गांव की महिलाओं के सहयोग से चल रही है। नारी अदालत में महिलाओं को काम करने का पैसा नहीं मिलता था। वे सहयोग के लिए जुड़ती थीं। हमारी महिलाओं को रानी लक्ष्मीबाई अवॉर्ड और शांति नोबेल पुरस्कार से भी नवाजित किया गया है। अब सीतापुर में छेड़छाड़, मारपीट के मामले कम हुए हैं।
नारी अदालत में काम करके ये समझ आया कि कोई भी नीति अगर बनती है तो उसे सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रखना चाहिए बल्कि जमीन पर उतारना चाहिए। महिलाओं के मुद्दों को उनके पास जाकर उन्हें समझाना चाहिए। जिन महिलाओं को महिला सामाख्या ने तैयार किया है, वो आज भी दूसरी महिलाओं की मदद में जुटी हैं। तो सरकारों को ऐसे कार्यक्रम बनाने चाहिए जिनसे जमीनी स्तर पर महिलाओं को मदद हो।

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