चलने-फिरने में लाचार, YouTube के वीडियो से चल पड़ी जिंदगी:सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित हूं, पर लड़ रही दिव्यांगों के लिए लड़ाई

नई दिल्ली18 दिन पहलेलेखक: ऐश्वर्या शर्मा

मैं जयपुर की प्रिया शर्मा हूं, जो पैदाइशी सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित हूं। बच्चे जब चलना सीखते हैं, तब मैंने व्हीलचेयर का दामन थामा। मुझे पढ़ने का बहुत शौक है, लेकिन कई स्कूलों ने मुझे एडमिशन देने से मना कर दिया।

मैंने घर पर रहकर पढ़ाई की। नेट का एग्जाम पास किया। अब पीएचडी करना चाहती हूं। लेकिन मुझे दुख है कि मेरा शहर और राज्य मेरे जैसे दिव्यांग लोगों के लिए फ्रेंडली नहीं है।

राजस्थान को डिसेबल्ड फ्रेंडली बनाने के लिए मैंने एक ऑनलाइन मुहिम शुरू की है ताकि मेरी आवाज राज्य सरकार तक पहुंचे।

बचपन से ही शुरू हो गया था संघर्ष

मेरे पापा पुजारी हैं और मां हाउसवाइफ। 2 साल की उम्र तक पता ही नहीं चला था कि मुझे कोई दिक्कत है। 5 साल की थी तो खुद से बैठ भी नहीं पाती थी। पेरेंट्स ने इलाज भी करवाया जो सफल नहीं हो पाया।

लोग मां को ताने सुनाते थे कि ऐसी औलाद होने से तो बेहतर है बच्चा ना हो। वहीं, कई लोगों ने मुझे ‘बेचारी’ बोला। सबको लगता था कि मैं पढ़ नहीं पाऊंगी और पढ़ भी ली तो 10वीं ही पास कर पाऊंगी। लेकिन मैंने इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन की, NET क्लियर किया। अब इतिहास में ही पीएचडी करने की तैयारी कर रही हूं। मैं इतना पढ़ पाऊंगी, किसी ने मुझसे ऐसी उम्मीद नहीं की थी।

घर पर बैठकर पूरी की पढ़ाई

मुझे कई स्कूलों ने दाखिला देने से मना कर दिया था। लेकिन सत्यम पब्लिक स्कूल ने मुझे एडमिशन दे दिया। यहां से मैंने 8वीं तक पढ़ाई की। इसके बाद दूसरे स्कूल में एडमिशन लेकर 10वीं और 12वीं की।

मैंने घर बैठकर ही पढ़ाई की। केवल परीक्षा देने स्कूल जाती। कॉलेज भी ऐसे ही किया क्योंकि दिव्यांग बच्चों के लिए कहीं सुविधा ही नहीं है। ना तो क्लास रूम दिव्यांगों के लिए फ्रेंडली हैं और ना ही टॉयलेट।

कई प्रतियोगी परीक्षाएं दीं, किसी सेंटर पर सुविधा नहीं मिली

मैं पीएचडी में एडमिशन के साथ ही सरकारी नौकरी की भी तैयारी कर रही हूं। इसके अलावा अगर मौका मिलता है तो मैं पुरातत्व विभाग के साथ भी काम करना चाहूंगी। मैंने कई सेंटर पर जाकर प्रतियोगी परीक्षाएं दीं लेकिन कहीं भी दिव्यांगों के लिए रैम्प नहीं मिला।

व्हीलचेयर की सुविधा भी नहीं थी। हर सेंटर पर सीढ़ी मिली। ऐसे में मेरी व्हीलचेयर को 2 लोग आगे से पकड़ते और 2 पीछे से, जैसे मैं मरीज हूं। मुझे तब बहुत बुरा लगता।

फिल्म देखने का शौक लेकिन सिनेमा हॉल नहीं जा पाती

मुझे पढ़ने का और फिल्में देखने का बहुत शौक है। लेकिन मैं हॉल तभी गई थी जब मैं मम्मी-पापा की गोद में थी। उसके बाद कभी नहीं गई।

मेरा सिनेमा हॉल जाकर फिल्म देखने का बहुत मन करता है लेकिन कोई डिसेबल्ड फ्रेंडली नहीं हैं। मैंने कुछ हॉलों में फोन कर पूछा भी था कि व्हीलचेयर वालों के लिए क्या सुविधा है पर हर जगह से निराशा हाथ लगी।

घूमना भी हो जाता है मुश्किल

मुझे ऐतिहासिक स्मारक बहुत पसंद हैं लेकिन मैं वहां भी नहीं जा पाती क्योंकि हर जगह सीढ़ियां हैं। यही नहीं, एक बार मैं अपने भैया-भाभी के साथ उदयपुर घूमने गई थी। उस वक्त ट्रेन में मुझे 4 लोगों ने मिलकर चढ़ाया और उतारा।

होटल पहुंचे तो उसके गेट के बाहर 2 सीढ़ी बनी थीं। किसी दिव्यांग के लिए 2 सीढ़ी चढ़नी भी भारी पड़ती है। ऐसे में घूमना के बारे में सोचना ही मुश्किल लगता है।

यू-ट्यबू पर विराली मोदी का वीडियो देख जगी उम्मीद

2017 में ही मेरे दिमाग में आया था कि मुझे दिव्यांगों की समस्या के बारे में आवाज उठानी चाहिए। लेकिन पता नहीं था कि क्या करूं।

फिर मैंने एक दिन यू-ट्यूब पर एक्टिविस्ट और मोटिवेशनल स्पीकर विराली मोदी का वीडियो देखा। इसी वीडियो के जरिए मुझे पिटिशन के बारे में पता चला। फिर मैंने गूगल पर इस बारे में और सर्च किया।

इस जानकारी के आधार पर मैंने 'चेंज डॉट ओआरजी/हमारे लायक दुनिया बनाओ' कैंपेन शुरू किया। वहां मैंने 2 महीने पहले ऑनलाइन मुहिम चलाई। इस पिटिशन पर अब तक 1890 लोगों ने साइन किया है।