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  • Terrible Slogans Were Being Heard All Around, We Had To Leave Our House Overnight, Now Kashmiri Literature Is My Favorite Work.

ये मैं हूं:चारों तरफ भयानक नारे लग रहे थे, हमें रातों-रात अपना घर छोड़ना पड़ा, अब कश्मीरी साहित्य ही मेरा पसंदीदा काम

10 महीने पहलेलेखक: मीना

‘19 जनवरी 1990 की वो रात मैं कभी नहीं भूल पाती। जब हर तरफ से भयानक नारे सुनाई पड़ रहे थे। कहीं घोड़ों के दौड़ने की सी आवाजें तो कहीं कोई कह रहा था कि नलों का पानी मत पीना उसमें जहर है। डर में कोई छत से कूदकर भागने को तैयार था तो कोई और तरीकों से। कहीं बच्चों की गाड़ी को बम से उड़ा दिया था तो कहीं किसी को अगवा करने की खबरें आ रही थीं। उस समय लग रहा था कि अगली सुबह नहीं देख पाएंगे। इस सोच के साथ हम वहां से निकले कि सरकार की मदद से हम वापस अपने घरों में आ जाएंगे, लेकिन वो दिन कभी आया ही नहीं? आज हर कश्मीरी के पास विस्थापन की दर्दनाक और नॉस्टैल्जिक कहानियां हैं।’ ये शब्द हैं प्रतिष्ठित लेखिका और संस्कृतिकर्मी अद्वैतवादिनी कौल के। वुमन भास्कर से बातचीत में अद्वैतवादिनी कहती हैं, ‘मेरा जन्म कश्मीर के श्रीनगर में हुआ। पिता जी टीचर, साहित्यकर्मी और आध्यात्मवेत्ता थे। कश्मीर में हमारा बहुत बड़ा परिवार था। मैं घर में अपने सभी भाई-बहनों में सबसे छोटी हूं। हमेशा से सबकी दुलारी-प्यारी रही। घर में पढ़ने-लिखने का माहौल मिला तो मेरी पढ़ाई में भी कोई कोताही नहीं बरती गई। ऐसे ही माहौल में मैं बड़ी हुई।

अद्वैतवादिनी कौल कश्मीरी साहित्य पर काम करती हैं।
अद्वैतवादिनी कौल कश्मीरी साहित्य पर काम करती हैं।

बचपन से अपने फैसले खुद लिए
डी.ए.वी. स्कूल से पांचवी तक की पढ़ाई की। इसके बाद हमें दूसरे स्कूल में जाना था। अब मुझे एहसास हो रहा है कि हमेशा से क्या चाहिए ये मुझे मालूम था और अपनी बात को लेकर मुझे बहुत आत्मविश्वास था। प्राइमरी में मैं थी और उसके बाद छठी किस स्कूल में पढ़नी है ये भी मैंने ही तय किया। ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद मैंने तय किया कि मुझे एम.ए. संस्कृत में ही करना है। इसके पीछे की वजह थी कि मुझे अहसास हो चुका था कि संस्कृत हमारी संस्कृति की वाहक है, जबकि समाज में संस्कृत को पुजारियों का और पूजा पाठ का विषय माना जाता था। मुझे भारतीय दर्शन बहुत आकर्षित कर रहा था।
पहला शोध प्रबंध ही बना पुस्तक
कश्मीर विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग नहीं था। परन्तु मेरे अपने बड़े भैया पंजाब यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे तो चंदीगढ़ आकर मैंने एम.ए. किया। कश्मीर यूनिवर्सिटी से 1983 में एमफिल किया और यहां बौद्ध आचार्यों पर लिखे मेरे शोध प्रबंध को इतना पसंद किया गया कि कश्मीर विश्वविद्यालय से इसे प्रकाशित करने के लिए अनुदान भी दिया गया। इस तरह मेरी पहली किताब पब्लिश हुई। 1989 में मुझे इसी विषय पर मेरे विस्तृत शोध पर पीएचडी की डिग्री भी मिल गई। इसी समय आतंकवाद की घटनाएं ज्यादा बढ़ गईं।
जितने भी हिंदू हैं वे यहां से चले जाएं…
1987 में शादी हुई और 1989 में बेटा हो गया। 13 दिसम्बर 1989 के दिन मेरे पति को चंडीगढ़ जाना पड़ा क्योंकि बड़े भैया दुर्घटना में गम्भीरता से हताहत हो गए थे। एक महीने बाद भैया घर अपने घर आ गये। भैया को देखने के लिए मैं 19 जनवरी 1990 को सुबह अपने 9 माह के बेटे को लेकर शाम जम्मू को पहुंच गई, अगले दिन जम्मू से चंदीगढ जाना था।
मेरी जिंदगी में ये तारीख पत्थर पर लिखी लकीर बन गई। रात में माइक पर जोरों से एक ही साथ आवाजें आने लगीं थीं कि जितने भी हिंदू पुरुष हैं वो महिलाओं को यहीं छोडकर कश्मीर से निकल जाएं। जिस समय ये सारे नारे लग रहे थे उस समय कश्मीर में मेरा ससुराल और मायका दोनों थे। मेरे घर वालों को घर से भागना पड़ा। रात को आवाजें आतीं कि जैसे घोड़े दौड़ रहे हैं। फिर कहीं से आवाजें आतीं कि नलों का पानी मत पीना क्योंकि उसमें जहर मिला हुआ है। लोग ऐसे डर गए थे कि उन्हें जो समझ आया वैसे वे वहां से भागे।

कश्मीरी में अराजकता बढ़ने पर अद्वैतवादिनी को अपने परिवार के साथ दिल्ली आना पड़ा।
कश्मीरी में अराजकता बढ़ने पर अद्वैतवादिनी को अपने परिवार के साथ दिल्ली आना पड़ा।

भागकर हमें दिल्ली आना पड़ा
मेरे अपने घर में पति की दादी और उनके पेरेंट्स थे। उन्हें लेकर जम्मू आई। जम्मू में किराए का एक कमरा लेकर चार महीने काटे कि शायद कश्मीर में हालात सुधर जाएं और हम घर लौट आएं। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हालात बिगड़ते ही गये। फिर पति और हम दिल्ली निकल आए। मेरे हस्बैंड का पब्लिशिंग का काम था तो उनके कुछ कॉन्टेक्ट दिल्ली में भी थे। यहां आकर दो कमरों का सेट किराए पर लेकर रहने लगे। मई की तपती दुपहरी में हम दिल्ली आए थे। मेरे पति कश्मीरी हिन्दू समाज में एक कार्यकर्ता भी थे। विस्थापित कश्मीरियों के सम्बन्ध में कार्य कर रहे थे कि उनकी आंख में हेमरेज हो गई। कहते हैं न जब मुसीबत आती है तो चारों तरफ से आती है।
घर गुजारा करने के लिए अब मेरे पास च्वॉइस नहीं थी। मुझे काम चाहिए था। विधि का विधान देखिए कि उसी समय एक विद्वान ने सांस्कृतिक केंद्र इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स के बारे में बताया। वहां जाकर मैंने जॉब के लिए आवेदन पत्र दिया और दो महीनों के भीतर मुझे यहां नौकरी मिल गई। यहां से घर चलाने का छोटा-सा सहारा मिल गया। हमारे बुजुर्ग वापस घर जाने की नाकाम उम्मीद में ही चल बसे। आज जब भी इन बातों को याद करती हू्ं तो दिल छलनी होने लगता है।
कश्मीर की संस्कृति को समझने की सोची
1991 से आई.जी.एन.सी.ए. में नौकरी करते हुए मुझे नई डायरेक्शन मिली। यहां काम करते हुए विभिन्न ग्रंथों को लेकर अपनी सांस्कृतिक अवधारणाओं को समझना, कई विषयों को आपस में जोड़ कर देखना- इस प्रकार परंपराओं के धारा प्रवाह की एकरूपता को समझा। कई सारी परियोजनाओं के अन्तर्गत बहुत से ग्रन्थों का सम्पादन किया। बहुत सी संगोष्ठियों, प्रदर्शनियों, सम्मेलनों इत्यादि का आयोजन कराया। संस्था में मुख्य सम्पादक और शोध एवं प्रकाशन विभाग के अध्यक्ष पद को संभाला।
इसी बीच मुझे मेरे कश्मीर की, जो मुझसे छीन लिया गया है, उसकी संस्कृति की विस्तार से जानकारी प्राप्त करने की लालसा जग गई। मैंने नियम बनाया कि कोई भी शोध-पत्र लिखना हो, शैक्षिक संगोष्ठियों में प्रस्तुति देनी हो, वह सब कश्मीर से जुड़ा होगा। इस संस्था में काम करते हुए मेरे मन-मस्तिष्क को पोषण मिलता रहा।
आज कश्मीर को कोई याद करता है तो सबसे पहले आतंकवाद ध्यान में आता है। लेकिन कश्मीर की यह पहचान नहीं है। अतः कश्मीर की संस्कृति को पहचानना मेरे लिए जरूरी था। मैंने कश्मीर की संस्कृति से जुड़े विभिन्न पहलुओं को जाना और इससे मुझे बहुत गौरवान्वित महसूस हुआ। कश्मीर के सांस्कृतिक अवदान को लेकर यहां के बौद्ध दर्शन और साहित्य, शैव दर्शन, संस्कृत साहित्य, कला, लोक साहित्य इत्यादि से सम्बन्धित रिसर्च पेपर लिखे, जिनको भारत और विदेश की शैक्षिक संस्थाओं के द्वारा प्रकाशित किया गया है।

अद्वैतवादिनी इन दिनों शैव योगिनी पर काम कर रही हैं।
अद्वैतवादिनी इन दिनों शैव योगिनी पर काम कर रही हैं।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की संस्थापक और विख्यात कला मर्मज्ञा डॉ. कपिला वात्यायन के 2020 में निधन होने पर उनके लिए स्मृति ग्रंथ का संपादन किया। इस स्मृति ग्रंथ के लिए विश्व के सुप्रसिद्ध विद्वानों और कला मर्मज्ञों ने भारत के विभिन्न भागों से और विदेशों से लेख भेजे हैं। शोध के लिए कई विषयों में रुचि है। अभी कश्मीर की 14वीं सदी की शैव योगिनी लल्लेश्वरी के वाखों पर रिसर्च कर रही हूं।
आत्मविश्वास से सबकुछ जीता जा सकता है
जीवन में इतनी बड़ी त्रासदी देखने के बाद भी हमने हार नहीं मानी और जीवनयापन करने की हर पॉजिटिव कोशिश की। अब मुझे लगता है कि हम सभी में एक शक्ति है जो शिव में है। हमें उस शक्ति को पहचानना है और सही रास्ते पर चलकर काम करना है। खुद पर भरोसा करके महिलाएं अपना नसीब स्वयं बदल सकती हैं।