पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

बर्फीली राहों की बाजीगर:पहाड़ों की बर्फीली चोटियां मेरा पहला प्यार है और अंटार्टिका साउथ पोल पहुंचकर मैंने अपने सपने को जिया

4 दिन पहलेलेखक: कमला बडोनी

मैं रीना कौशल धर्मशक्तू, स्कीइंग कर अंटार्टिका साउथ पोल पहुंचनेवाली पहली भारतीय महिला का खिताब जब मुझे मिला, तो यकीन हो गया कि यदि शिद्दत से सपनों का पीछा किया जाए, तो वो जरूर पूरे होते हैं।

अंटार्टिका साउथ पोल पहुंचने का अनुभव शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। इस मिशन के लिए अलग-अलग देशों की 8 महिलाओं को चुना गया था, लेकिन लक्ष्य तक सिर्फ 7 पहुंच सकीं, एक को वापस लौटना पड़ा था। इस सफर में हमारे साथ कोई गाइड नहीं था, हमें अपना सामान भी खुद उठाना होता था। वहां के माइनस 10 से 35 डिग्री सेल्शियस तापमान और तेज हवाओं के बीच शुरू में हम बहुत ज्यादा स्कीइंग नहीं कर पाते थे, लेकिन जब वहां के मौसम के मिजाज के मुताबिक हमने खुद को ढाल लिया, तो हम रोजाना 15 से 30 किलोमीटर स्कीइंग करने लगे।

वहां हमें एक के पीछे एक चलना होता था और सबसे आगे वाले के हाथ में नेविगेशन की कमान होती थी। डेढ़ घंटे स्कीइंग करने के बाद हम सिर्फ सात मिनट थकान मिटाने के लिए रुकते थे, क्योंकि उससे ज्यादा रुकने पर शरीर अकड़ने लगता था। प्यास लगने पर वहां पानी नहीं मिलता था, क्योंकि वहां सिर्फ बर्फ होती है इसलिए हम बर्फ को पिघलाकर पानी पीते थे। उस पानी को हम थर्मस में जमा कर लेते थे, ताकि वह फिर से बर्फ न बन जाए। शाम को हम जहां पहुंचते, वहां टैन्ट लगाकर रात गुजार लेते। सुबह उठने पर ठंड के मारे हाथ-पैर बुरी तरह जकड़ जाते, लेकिन उसी हाल में हम आगे बढ़ जाते थे।

अंटार्टिका के तट से 900 किलोमीटर स्कीइंग कर जब हम साउथ पोल पहुंचे, तो यकीन नहीं हो रहा था कि हमने ये कर दिखाया है। हम सब एक-दूसरे से गले लगकर रो रहे थे। 38 दिनों तक लगातार स्कीइंग करते हुए अंटार्टिका पहुंचना आसान काम नहीं था। हम 7 देशों की 7 महिलाएं अपने लक्ष्य को पाने के लिए जी जान से मेहनत कर रही थीं। 29 दिसंबर 2009 के दिन हमने अपना लक्ष्य हासिल किया और एक नया इतिहास रचा। हम वहां दो दिन ठहरे थे और मेरी जिंदगी के वो बेहतरीन दिन हैं। वहां का नजारा बहुत अलग था। नीचे दूर-दूर तक पसरी बर्फ की चादर और ऊपर कभी न खत्म होने वाला आसमान। ऐसा लगता था बस, थोड़ी देर बाद क्षितिज तक पहुंच जाएंगे, हमें धरती का कोना मिल जाएगा। धरती, आसमान, चांद-तारे, वहां से हर चीज खूबसूरत नजर आ रही थी, हर चीज को निहारने का अलग ही अनुभव था। वहां पर जीवन नहीं है, फिर भी गजब की ऊर्जा है। इतनी शांति मैंने कभी महसूस नहीं की। वहां पहुंचकर यकीन नहीं हो रहा था कि ये भी धरती का एक हिस्सा है। मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूं कि मुझे वहां जाने का मौका मिला। हमसे पहले भी कई लोगों ने वहां पहुंचने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो पाए। मेरी ख्वाहिश नॉर्थ पोल (उत्तरी ध्रुव) पहुंचने की भी है। मैंने दुनिया के एक छोर को छू लिया, अब दूसरे छोर को छूना चाहती हूं।

मेरा बचपन दार्जलिंग में बीता, इसीलिए शायद पहाड़ों से मुझे प्यार हो गया। बचपन में जब पहाड़ की चोटियों को देखती, तो मैं उन्हें छू लेना चाहती थी। फिर जब मैंने हिलेरी (एंडमंड हिलेरी और नोर्वे तेनजिंग सबसे पहले एवरेस्ट पर पहुंचे थे) को दार्जलिंग में देखा, तो पहाड़ों की ऊंचाई नापने की मेरी ख्वाहिश और पुख्ता हो गई। मैं भी उन जैसा बनना चाहती थी। अपनी इस ख्वाहिश को पूरा करने के लिए मैंने हिमाचल, लद्दाख, उत्तराखंड में ट्रेनिंग ली। अंटार्टिका पहुंचने से पहले मैं कैलाश, गंगोत्री-1, प्लूटेड पीक शिखरों पर चढ़कर लौट चुकी हूं।

शादी के बाद जब मैंने अंटार्टिका साउथ पोल मिशन के बारे में सुना, तो अप्लाई करने से खुद को रोक नहीं पाई। इसके लिए लगभग 130 भारतीयों ने अप्लाई किया था। मैं खुशनसीब हूं कि मेरा सलेकशन हो गया और मैं अपने सपने को साकार करने की राह पर चल पड़ी। मेरे पति लवराज भी माउंटेनियर हैं इसलिए वो मुझे और मेरे काम को अच्छी तरह समझते हैं। मेरे अंटार्टिका जाने के फैसले और तैयारी में उनका बहुत बड़ा योगदान है। जब मैं अंटार्टिका मिशन से लौटी, तो लवराज दिल्ली एअरपोर्ट पर बैंड-बाजा के साथ मेरे स्वागत में खड़े थे।

मैं ये मानती हूं कि जीवन में आगे बढ़ने या बड़ी उपलब्धि हासिल करने के लिए हमें अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलना चाहिए। जो हम आसानी से कर सकते हैं, उसे करने की बजाय जो करना मुश्किल है, उसे करने का जोखिम उठाकर ही हम कुछ नया कर सकते हैं। 2010 में जब मुझे राष्ट्रपति द्वारा ‘तेजिंग नोर्गे नेशनल एडवेंचर अवॉर्ड' मिला, तो काम करने का हौसला और बढ़ गया। प्रकृति ने मुझे बहुत कुछ दिया है, अब मैं प्रकृति का कर्ज चुकाना चाहती हूं। फिलहाल मैं पंडित नैन सिंह माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट, उत्तराखंड की ओएसडी हूं और पर्वतारोहण को बढ़ावा देने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रही हूं। मैं लोगों को पर्यावरण का महत्व और उसे बचाए रखने के बारे में बताती हूं, ग्रुप माउंटेनियरिंग के लिए जाती हूं। मैं खुशनसीब हूं कि मैं अपने काम के साथ अपने सपने को जी रही हूं।

खबरें और भी हैं...