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हमारे हक:आदिवासियों की जमीन और पहचान बचाने को लड़ रही ये लड़की, मां-भाई को खोकर भी नहीं रोकी जंग

6 दिन पहलेलेखक: मीना

मेरा हंसता खेलता घर था। मां-पापा, प्यारा सा भाई। बड़ा-सा मकान, लेकिन एक दिन सब किसी फिल्म की तरह खत्म हो गया। जमीन हाथ से निकल गई। भाई को मार दिया गया। हमारी हंसती-खेलती दुनिया एक पल में वीरान हो गई। मैं भी खूब हंसती थी, खेलती थी, नाचती थी, गाती थी, लेकिन जब अपने ही नहीं बचे तो किसके लिए खुशी मनाती। फिर अपनी पहचान के लिए, अपनों की जमीन के लिए और अपने लिए सिस्टम से लड़ने निकल पड़ी। ये शब्द हैं छ्त्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले की रहने वाली ‘तारिका तरंगिनी संघर्ष’ की।

आदिवासी परिवार से आने वालीं तारिका भास्कर वुमन से बातचीत में कहती हैं, ‘सिस्टम आपको मजबूर करता है कि उसका विरोध किया जाए। मुलायम शरीर भी उनकी लाठियों से सख्त हो जाता है, लेकिन हम आदिवासी हैं, जिन्होंने इस दुनिया को प्रोडक्टिविटी का पाठ पढ़ाया, जिन्होंने इस दुनिया को बताया कि किसी खाद्य पदार्थ का क्या टेस्ट होता है, जिन्होंने समतल जमीन पर रहने वाले लोगों को बताया कि जेंडर इक्वैलिटी क्या होती है... इतनी जल्दी लाठियों से डरेंगे नहीं। हम अपनी जमीन, अपने हक के लिए लड़ते रहेंगे।’

जमीन का ये संघर्ष मैंने जीवन की शुरुआत करते ही देखना शुरू कर दिया था। मेरी पैदाइश एमपी के बड़वानी में हुई, क्योंकि माता-पिता दोनों ही सर्विस में थे, तो ट्रांसफर होते रहते। प्राइमरी की पढ़ाई एमपी से ही की। 12वीं तक की पढ़ाई छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से की। उसके बाद नर्सिंग भी छत्तीसगढ़ से की और फिर तमनार कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में 16 साल नर्सिंग की सेवा दी। आदिवासियों की जमीन बचाने की ये लड़ाई साल 2000 से शुरू हुई। मां टीचर और पापा ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर थे। मां-पापा दोनों ही आदिवासियों की जमीन बचाने में लगे थे। मां को पुलिस कस्टडी में भी रखा गया। उनसे एसडीएम हमारी जमीन के दस्तावेजों पर जबरन साइन करवाना चाहते थे, लेकिन वे नहीं मानीं। लड़ते-लड़ते माता-पिता दोनों इस दुनिया से चले गए।

‘मेरे भाई की जान ले ली और उसे दुर्घटना बता दिया’
नौकरी लगने के चार पांच महीने के भीतर ही देखा कि हमारे तमनार ब्लॉक के साथ-साथ आसपास की कई गांवों की जमीनों का अधिग्रहण होने वाला है। ये वक्त 2003-2004 का था। हम आदिवासी हैं और संविधान ऐसा कोई अधिकार किसी को नहीं देता कि आदिवासियों की मर्जी के बिना उनकी जमीनें उनसे ली जाएं। जब मैं नौकरी करती थी तब जानती थी कि हमारी जमीनें हमारी मर्जी के बिना हमसे छीनीं जा रही हैं, लेकिन मैं कुछ कर नहीं पा रही थी। पापा बहुत जल्दी इस दुनिया से चले गए। उस समय ये लड़ाई मां और भाई लड़ रहे थे। मां के साथ मैं भी जाती और आदिवासियों को समझाते कि हमारी जमीनें इतनी सस्ती नहीं हैं, जितने में हमसे ली जा रही हैं। हमारे गांव प्राकृतिक संपदा से भरे पड़े हैं। अगर हमारी जमीन हमसे ले ली जाएगी तो यह हमारा बड़ा नुकसान होगा। 2007 के आसपास मेरे भाई की हत्या करवा दी गई, जिसे बाद में सड़क दुर्घटना साबित कर दिया गया। मेरा एक ही भाई था। भाई के गुजरने के बाद हमारी जमीनों पर यूनिवर्सिटी बनाई गई।

‘जिन्होंने हजार रुपए भी नहीं देखे, उनसे जमीन ली जा रही’
जब मेरे मां-भाई, पिता कोई मेरे जीवन में नहीं रहे तो मैं फिर नहीं डरी और अकेली ही सड़क पर लोगों को जागरूक करने निकल पड़ी। 22 साल तक मेरी शादी हो गई। इस काम में पति ने भी साथ दिया। आंदोलन करने पर मुझ पर अटैक किए गए। 2016 में मुझे नौकरी भी छोड़नी पड़ी क्योंकि डिपार्टमेंट मुझे परेशान कर रहा था। हमारी जमीनें जबरदस्ती लेने के लिए आदिवासियों पर दबाव डाला गया। गांव में लोग पढ़े-लिखे नहीं थे। 20 रुपए को एक कोरी बोला जाता है। लोग कोरी में ही गिनती करते हैं। उन्हें नहीं मालूम था कि हजार रुपए कितने होते हैं। इस वजह से वे बेवकूफ बनते चले गए।
‘10 एकड़ जमीन 10 हजार से कम में नहीं दूंगा’
एक गांव वाले से मैंने पूछा कि तुम्हारी जमीन अधिग्रहण में जा रही है, देखो इस कागज पर तुम्हें साइन करना है। तो वह व्यक्ति बोला मेरी तो 10 एकड़ जमीन है, मैं दस हजार से कम में नहीं दूंगा। अब इस बात से समझा जा सकता है कि आदिवासी कितने भोले होते हैं। उनकी जमीन हड़पने वाले उन्हें लालच देते हैं कि तुम्हें शराब, गाड़ी, तेल के पैसे और खाने पीने के लिए पैसे देंगे, लेकिन इस सबका हासिल ये होते है कि ये भोले आदिवासी लालच देकर मरवा दिए जाते हैं। बहुत सी महिलाएं विधवा हो जाती हैं, बच्चे अनाथ हो जाते हैं। इस तरह से हमारे गांव बर्बाद किए गए। आदिवासियों के साथ आज भी ऐसी घटनाएं हो रही हैं।

‘हमारी पहचान मिटाई जा रही है’
सरकार ने 90 साल की लीज पर आदिवासियों की जमीनें ली हुई हैं। उनसे खरीदी नहीं हैं। अब 90 साल की लीज पर जमीन जाने पर हमारा नाम जमीनों से काट दिया जाता है। इतने समय बाद जब हमारी तीसरी या चौथी पीढ़ी आएगी, जब उनके पास दस्तावेज ही नहीं होंगे तब वे किस दम पर बोलेंगे कि ये हमारी जमीन है। जो हमारे मिसल बंदोबस्त (जमीनों के पचास साल पुराने रिकॉर्ड्स) हैं जिनसे हम प्रूव करते हैं कि हम आदिवासी हैं, हमारा वो मिसल रिकॉर्ड खत्म हो रहा है। जब ये रिकॉर्ड नहीं रहेगा तब हमारे कास्ट सर्टिफिकेट नहीं बनेंगे। इसके बाद हम कैसे प्रूव करेंगे कि हम आदिवासी हैं। ये सरासर हमारी पहचान मिटाने की साजिश है। कई लोगों की पहचान मिट भी चुकी है।
फैक्ट्रियां लगने से सेहत पर पड़ रहा असर
हमारे गांवों को मिटाकर इतनी फैक्ट्रियां लग चुकी हैं कि लोगों को कैंसर, सिलिकोसिस, टीबी और दमा जैसी बीमारियां हो रही हैं। मैं दिल्ली आई तो देखा कि यहां भी सरकार प्रदूषण को नहीं रोक पा रही तो सोचिए हमारे वहां का क्या हाल होगा। अभी जब मैं यहां सिंघु बॉर्डर पर आई हूं तब भी हमारे घर पर फैक्ट्रियां बढ़ाने के लिए जनसुनवाइयां हो रही हैं।

जन सुनवाइयों से भी नहीं निकलता हल
अगर हमारी 6 पंचायतें इन जनसुनवाइयों से प्रभावित हो रही हैं तो पर्यावरण संरक्षण मंडल इन 6 पंचायतों को नोटिस देता है कि यहां पर फलां कंपनी लगने वाली है। इससे पॉल्युशन होगा, आप लोगों को अगर आपत्ति है तो जनसुनवाई में आकर आप अपनी बात रखें। अगर आपत्ति नहीं है तो समर्थन करें। ऐसे में इन जनसुनवाइयों में उन लोगों को अपनी बात रखने का मौका मिलना चाहिए जो प्रभावित होंगे, लेकिन वहां फैक्ट्रियों में काम करने वाले दूसरे राज्यों के मजदूरों से कंपनियों के फेवर में बात रखवाई जाती है। गांव के लोगों में जिला प्रशासन और पुलिस डर का माहौल पैदा करता है। उन्हें धमकाया जाता है कि अगर विरोध करोगे ‘तो तुम्हें देख लेंगे।’

तीन खदानों को आने से रोका
अभी मेरे दो बेटे हैं। नौकरी जाने के बाद भी आदिवासियों के लिए लड़ रही हूं। सरकार को पत्र भेजती हूं। लोगों को समझाती हूं। अभी हाल के समय में हमारे यहां तीन बड़ी खदानें आने वालीं थीं। इन खदानों को आने से पहले हमने सीएम को पत्र लिखा कि अगर ये खदानें आईं तो हमारा तमनार ब्लॉक खत्म हो जाएगा। दूसरी बात, इन खदानों में हमारी जमीनें जाएंगी, हमारी पहचान खत्म हो जाएगी। इस पर सरकार ने एक साल के लिए जांच रखी और कहा गया कि ये पुरातात्विक जमीन नहीं है। इसलिए इस पर अधिग्रहण किया जा सकता है, लेकिन ये मामला अभी अटका हुआ है, क्योंकि अब आदिवासी जागरूक हो गए हैं। अब वे विरोध करते हैं।

जनपद को नगर पंचायत बनने से रोका
हमारे क्षेत्र में जनपद पंचायतें होती हैं, कई पंचायतों से मिलकर जनपद पंचायतें बनती हैं। हाल के दिनों में हमारी जनपद पंचायतों को नगर पंचायत बनाने की कोशिशें चल रही हैं। अगर नगर पंचायत बन गई तो फिर वे आदिवासी क्षेत्र नहीं रह जाएंगे वो जनरल क्षेत्र हो जाएगा। इस मामले पर भी मैंने आदिवासियों से बात करके सीएम को लेटर भेजा और फिर वहां से नगर पंचायत नहीं बनाने का ऑर्डर आया। ये सफलता 2020 में मिली। जो लोग आदिवासी नहीं हैं, उन्हें आदिवासी का जाति प्रमाण पत्र देकर सरकारी नौकरियां दी जा रही हैं। ऐसे एक हजार लोगों को मैं जानती हूं। इसके खिलाफ मैंने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में पीआईएल डाली जिसके बाद हाई कोर्ट ने सीबीआई को जांच के लिए निर्देश दिया है। अंतिम फैसले का अभी इंतजार है।

‘जब तक जान है तब तक लड़ूंगी’
कई प्रदर्शनों से मुझे घसीटकर निकाला गया। बेइज्जती की गई। आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं, लेकिन मुझे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि मुझे मेरी जमीन के लिए लड़ना है। आज व्यवस्था ने जैसे लाल किला, इंडिया गेट, ताजमहल, अयोध्या मंदिर को संहेजकर रखा है वैसे ही हम आदिवासियों के देवस्थल हैं, जिन्हें मिटाने की तैयारी की जा रही है। अपनी इन परेशानियों को लेकर मैं किसान आंदोलन में सिंघू बॉर्डर पर आई, क्योंकि हम आदिवासी तो किसान ही हैं। हम पहले प्रताड़ित हैं। इस कानून से सबसे ज्यादा हम प्रभावित होंगे।

यहां युनाइटेड सिख के साथ मिलकर लोगों को दवा दी। सेवा की। जब तक जिंदा हूं तब आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ूंगी। क्योंकि ऐसे में अगर हम जिंदा भी रहे तो क्या फायदा क्योंकि तब तक हमारी पहचान मिट जाएगी। आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। इसलिए मैं सभी से ये निवेदन करना चाहती हूं कि आप पैसा तो कमा लेंगे लेकिन पहचान चली जाएगी तो इस पैसे का भी क्या करोगे। इसलिए विरोध करें और अपने हक के लिए लड़ें।

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