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ये मैं हूं:मैंने इंजीनियरिंग- मार्केटिंग की, रिक्रूटमेंट एजेंसी खोली, पर नहीं बनी बात, फिर ऐसा किया कि दुनिया दीवानी हो गई

एक वर्ष पहलेलेखक: मीना

हमारा समाज आज भी महिलाओं के लिए उतना सुरक्षित नहीं हुआ है कि कोई माता-पिता अपनी बेटियों को निडर होकर घर से बाहर भेज सकें। मुझे घर से बाहर पढ़ने जाना था, लेकिन नहीं भेजा गया, मुझे बाहर नौकरी करनी थी, लेकिन नहीं जा पाई। हर बार समाज के तयशुदा पैमानों में रहकर ही अपनी प्रोग्रेस पर बल दे पाई। मुझे कुछ नया गढ़ना था, अपने लिए नया मुकाम बनाना था इसलिए बागी भी हुई और आबाद भी। ये शब्द हैं उभरती हुई बिजनेस वुमन भावना सिंह के।

पहली लड़ाई पढ़ाई पर

वुमन भास्कर से खास बातचीत में भावना कहती हैं, ‘मेरा जन्म जयपुर के एक राजपूत परिवार में हुआ। राजपूत परिवार में होने की वजह से यहां वे सभी कायदे मानने थे जिससे किसी की इज्जत पर न बन आए। सूरज ढलने से पहले घर आ जाना, बिना किसी की इजाजत घर से बाहर नहीं जाना और ऐसा कौन सा करियर चुना जाए जिससे मेरी शादी में दिक्कत न आए, ये भी तय करके मुझे दिया गया। इन तय पैमानों पर मैंने लड़ना शुरू किया। सबसे पहली लड़ाई मेरी पढ़ाई को लेकर हुई।

बिजनेस वुमन भावना सिंह कहती हैं कि 2014 में चेन्नई में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी मिली थी, मगर परिवारवालों ने जॉइन करने से मना कर दिया।
बिजनेस वुमन भावना सिंह कहती हैं कि 2014 में चेन्नई में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी मिली थी, मगर परिवारवालों ने जॉइन करने से मना कर दिया।

जेंडर के आधार पर भेदभाव नहीं सहना

मुझे जयपुर से बाहर पढ़ने जाना था, क्योंकि यहां अच्छे कॉलेज नहीं मिल रहे थे, लेकिन मुझे नहीं भेजा गया, क्योंकि लोगों को यह डर था कि बाहर जाने पर लड़कियां बिगड़ जाती हैं। मैं बाहर जाकर पढ़ाई नहीं करूंगी, पार्टी करूंगी, इसलिए मुझे नहीं जाने दिया गया। लेकिन जब कोई पुरुष सदस्य घर से बाहर जाकर पढ़ाई करता या रात तक घूमता है, तो कोई उससे सवाल नहीं करता। यह हमारा पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं को उनके तय पैमानों में ही आगे बढ़ने देता है। जेंडर के आधार पर भेदभाव की यह लड़ाई घर से ही शुरू हुई।

पहली लड़ाई में असफल हुई, दूसरी में जिद्दी हो गई

पहली लड़ाई में असफल हुई और दूसरी लड़ाई मैंने नौकरी के लिए लड़ी। साल 2014 में जब मुझे चेन्नई में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी मिली, तो परिवार ने जॉइन करने से मना कर दिया, क्योंकि उनका मानना था कि हमारे समाज की लड़कियां नौकरी नहीं करतीं। फैमिली में मम्मी मेरी बात समझ गई थीं, लेकिन पापा नहीं मान रहे थे।

मम्मी ने पापा को समझाने की कोशिश भी की, लेकिन मम्मी की भी नहीं सुनी गई। परिवार को मनाते-मनाते मेरा चेन्नई का ऑफर लेटर भी डिक्लाइन हो गया।

रुकावट परिवार नहीं, समाज है

मुझ पर नौकरी करने का फितूर छा गया था और परिवार से लड़ बैठी। चेन्नई में जिस कंपनी में नौकरी मिली थी, वहां के एचआर से बात की और उन्होंने मुझे जॉइन करने का आठ दिन का समय दिया। इन आठ दिनों में मैंने पापा को मनाया। आखिरकार वे मान गए और मुझे खुद चेन्नई छोड़कर आए।

मैं ऐसा बिल्कुल नहीं कह रही हूं कि मेरी तरक्की मेरा परिवार नहीं चाहता था, लेकिन हमारे समाज ने लड़कियों के लिए माहौल माकूल नहीं रखा है, जिस वजह से फैमिली उनके घर से बाहर जाने से डरती हैं। हालांकि, फैमिली ने मुझ पर भरोसा किया और चेन्नई जाने दिया।

इस नौकरी से पहले इंडियन नेवी का ऑफर लेटर मेरे पास आ चुका था, लेकिन जब वहां जॉइन करने की बात आई, तो मुझे फैमिली ने इसलिए नहीं जाने दिया, क्योंकि उन्हें लगता था कि ये नौकरी करके मेरी शादी में दिक्कतें आएंगी।

भावना कहती हैं-लड़कियों के पास खुद को प्रूव करने का सीमित समय होता है। मैंने खुद को प्रूव किया और आज परिवार को मुझ पर नाज है।
भावना कहती हैं-लड़कियों के पास खुद को प्रूव करने का सीमित समय होता है। मैंने खुद को प्रूव किया और आज परिवार को मुझ पर नाज है।

कुल 6 महीने की नौकरी और घर वापसी कर ली

जब मैं चेन्नई गई तो ये मेरी जिंदगी का पहला मौका था, जब घर की दहलीज से बाहर निकली। अब तक सारी चीजों के लिए पापा पैसे देते थे, चेन्नई आकर अपने रूम का रेंट, राशन, सारे बिल, ये सब कुछ मैं अपनी सैलरी से कर रही थी। चेन्नई में मैं कुल छह महीने नौकरी कर पाई और इतने में घर से चिट्ठियां आने लगीं कि मैं वापस घर आ जाऊं, क्योंकि मम्मी अकेली पड़ गई हैं। भाई भी बाहर पढ़ने चला गया और मैं भी बाहर आ गई। मैं भावनाओं में बह गई और चेन्नई की नौकरी छोड़ दी। जयपुर वापस आ गई।

महज 1000 में शुरू की रिक्रूटमेंंमट एजेंसी

जयपुर आने के बाद यहां काम ढूंढना शुरू किया, लेकिन कुछ खास नहीं मिला। फ्रीलांसिंग काम किया, लेकिन काम में किक नहीं मिल रही थी। इसके बाद मैंने खुद की रिक्रूटमेंट एजेंसी शुरू की। ये एजेंसी मात्र 1000 रुपए में शुरू की और यहां से शुरू हुई मेरी बिजनेस वुमन बनने की जर्नी।

लड़की होकर लड़कों से बात नहीं कर सकती

मेरे मन में शुरू से था कि मैं अपना खुद का काम शुरू करूं और ये शुरू भी हो गया। अब मेरे पास बहुत क्लाइंट्स आने लगे लेकिन लोग ये कहने लगे कि लड़की होकर आदमियों से बात करती है। ऊपर से इस बिजनेस में उतना फायदा भी नहीं हो रहा था जितना मैं इसमें मेहनत कर रही थी। चूंकि मैं लड़की थी इसलिए क्लाइंट से पैसे निकालना भी मेरे लिए मुश्किल भरा काम होता था। आखिरकार हार मानकर मुझे ये वेंचर बंद करना पड़ा। 2017 में मैंने डिजिटल मार्केटिंग के बारे में पढ़ना शुरू किया और फिर अपनी डिजिटल मार्केटिंग की एजेंसी शुरू कर दी।

कौन सा करियर अपनाना है, तय नहीं कर पा रही थी

अब जब मैं अपने अनुभवों का निचोड़ देखती हूं तो मैंने एमटेक करने, सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग में काम करने, रिक्रूटमेंट एजेंसी से लेकर मार्केटर बन गई। अब तक मेरी जर्नी में ये साफ नजर आ रहा है कि मुझे एक प्रॉपर करियर पाथ नहीं मिला। किसी एक तरह के करियर को न चुन पाने की असमंजस, सिर्फ मेरी नहीं बल्कि मेरे जैसे कई युवाओं की थी। इसी असमंजस को खत्म करने के लिए मैंने अपस्किल्स एक नया वेंचर शुरू किया। डिजिटल मार्केटिंग तो चल ही रही है।

भावना कहती हैं-हम लड़कियां आगे बढ़ने की राह में बहुत बार गिरती हैं, लड़खड़ाती हैं, लेकिन हार नहीं मानतीं और जिद्दी होकर अपने सपनों को पूरा करती हैं।
भावना कहती हैं-हम लड़कियां आगे बढ़ने की राह में बहुत बार गिरती हैं, लड़खड़ाती हैं, लेकिन हार नहीं मानतीं और जिद्दी होकर अपने सपनों को पूरा करती हैं।

डिप्रेशन का शिकार और योगिनी बनना

इन सब कामों के बीच जिंदगी में ऐसे मौके भी आए जब मैं डिप्रेशन का शिकार रही। पर्सनल लाइफ में बहुत कुछ ठीक नहीं चल रहा था। कई-कई घंटे वॉशरूम में बैठी रहती थी। फिर मैंने योग और मेडिटेशन शुरू किया। अब योगिनी के नाम से भी जानी जाती हू्ं।
योगिनी और बिजनेस वुमन की जुबानी
अपस्किल्स के जरिए मैं युवाओं को एक करियर पाथ देती हूं कि वे कैसे अपने सपनों का मुकाम हासिल कर सकते हैं। युवाओं को उनकी नौकरी के अनुसार प्रशिक्षित करती हूं। अब मैं सभी युवाओं को यही कहना चाहूंगी कि आप जो करना चाहते हैं उसे आज ही कर डालो। उसे अगर टालती रहोगी तो वो बात हमेशा टलती रहेगी। जिंदगी में जो करना है, अभी करें। बाद के लिए नए मौकों को छोड़ दें।