• Hindi News
  • Women
  • This is me
  • Tried To Kill Twice, Remained In Drip, Underwent Treatment For 2 Years, Today Identified As Portrait Artist

ये मैं हूं:दो बार जान देने की कोशिश की, डिप्रेशन में रही, 2 साल इलाज चला, आज पोट्रेट आर्टिस्ट के रूप में पहचान

8 महीने पहलेलेखक: संजय सिन्हा

मैं पढ़ाई में अव्वल थी। तभी लाइफ में भूचाल आ गया। शादी हुई, लेकिन पति अब्यूजर निकला। जो हमसफ़र बना, उसी ने हर पल बेइज्जत किया। इस हद तक मेंटली, इमोशनली टॉर्चर किया कि डिप्रेशन में रहने लगी। दो बार जान देने की कोशिश की। लंबे समय तक ट्रॉमा में रही। अवसाद का इलाज चला, डिवोर्स हुआ। इन सबसे उबर कर मैंने खुद को संभाला और पैशन को अपना करिअर चुन लिया। आज लोग मुझे पोट्रेट आर्टिस्ट के रूप में जानते हैं।

परियों की तस्वीरें बनाती थी

भास्कर वुमन से खास बातचीत में रूपम गंगवार कहती हैं मैं उत्तर प्रदेश के फरूखाबाद के कायमगंज तहसील की रहनेवाली हूं। गांव से ही मेरी पढ़ाई हुई। जब मेरी उम्र 7-8 साल की रही होगी तब छोटे बच्चों की पत्रिकाएं, चंपक,नंदन आदि खूब पढ़ती थी। उसमें जो परियों की तस्वीरें होतीं थीं उन्हें हुबहू कागज पर उतार लेती थी।

पापा ने मोटिवेट किया

होली-दीवाली जैसे त्योहार में खुद से ग्रीटिंग कार्ड बनाती और रिश्तेदारों को भेजती। सब यही कहा करते कि हमें तुम्हारे हाथ का बना कार्ड ही चाहिए, मार्केट वाला नहीं।

मेरे कस्बे में ग्रेजुएशन के बाद पेंटिंग पढ़ने के लिए कोई कॉलेज नहीं था। मैंने सोचा कि आगे अंग्रेजी में ग्रेजुएशन कर लूंगी। लेकिन पापा ने मोटिवेट किया कि अगर तुम पेंटिंग में करिअर बनाना चाहती हो तो इसमें ही आगे बढ़ो। और उन्होंने मुझे हायर स्टडीज के लिए कानपुर भेजा। मैंने यहां दयानन्द गर्ल्स कॉलेज से पेंटिंग में पोस्टग्रेजुएशन किया और कॉलेज में टॉप किया, यूनिवर्सिटी में मेरा चौथा स्थान था। कानपुर के ही एएनडी कॉलेज से मैंने बीएड और एमएड भी किया।

पेंटिंग और एजुकेशन दो विषय में नेट क्वालिफाई किया

2008 में जैसे ही मेरी स्टडीज पूरी हुई, रिजल्ट आया तभी नौकरी भी मिल गई। मेरठ के डिग्री कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में ज्वाइन किया। हालांकि यह कांट्रैक्चुअल जॉब महज एक वर्ष के लिए थी। मैं थोड़ी उलझन में थी, पर पापा ने कहा कि अभी ज्वाइन करो, अच्छा न लगे तो छोड़ देना। धीरे-धीरे मन रमता गया, कांट्रैक्ट भी आगे एक्सटेंड होता रहा।

2011 में शादी हुई, सब कुछ बदल गया

घर में केवल मैं और पापा थे। जब मैं छोटी थी, तब ही मम्मी गुजर चुकी थीं। पापा ने मुझे पाला। खुद खाना बनाते। टीचर की नौकरी भी करते और मेरी देखभाल भी। जब नौकरी लग गई, सब कुछ सेट हो गया, तब शादी की बारी आई।

तू अट्रैक्टिव नहीं है, पति ताने देता

बरेली में मेरी शादी हुई। पापा को छोड़ कर ससुराल आ गई। लेकिन यहां मेरे जीवन का डार्क फेज शुरू हो गया। बात-बात पर पति टॉर्चर करता। ताने देता। मैं खुद को ब्रिलिएंट समझती थी, लेकिन उसने कभी भाव नहीं दिया। वो कहता तू कहीं से अट्रैक्टिव नहीं है। तेरी आंखें अच्छी नहीं हैं। तुझे बात करने की अक्ल नहीं है। तेरे दांत अच्छे नहीं हैं। मेरा सारा आत्मविश्वास डगमगा गया। पति को मुझसे और मेरे परिवार से कोई लगाव नहीं रहा।

पापा को नहीं बताया, मेरे साथ क्या हो रहा

मैं जो झेल रही थी, उसे कभी पापा को नहीं बताया। जैसे हर लड़की को यही लगता है कि चाहे कुछ हो जाए, अपनी परेशानी के बारे में किसी को नहीं बताऊंगी। मैं भी सहती रही। लेकिन कब तक। मैं डिप्रेशन में रहने लगी। शादी के पहले ही साल मैंने सुसाइड की कोशिश की। स्थितियां फिर भी नहीं संभली। पति जहां नौकरी करता था, न तो वहां ले जाता था, न ही कभी बात करता था। डेढ़-दो साल के बाद मैंने फिर जान देने की कोशिश की। मेरे कॉलेज की नौकरी भी छूट गयी।

मायके आ गई

इस बार पापा को पता चल गया कि मेरे ससुराल में कुछ भी सही नहीं चल रहा। फिर वो मुझे घर ले आए। मेरा इलाज शुरू हुआ। एम्स में दो साल तक इलाज चला। डिपार्टमेंट ऑफ साइकेट्री के हेड डॉ. श्रीनिवास से मैं गिड़गिड़ाती थी कि मुझे कोई ऐसी दवा दे दीजिए जिससे जिंदगी के पिछले तीन साल भूल जाऊँ। डॉक्टर समझाते कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। लेकिन तब मुझे नहीं लगता था कि कभी नॉर्मल हो पाऊंगी।

खुद से डिवोर्स के लिए आगे आई

मेरी हालत देख पापा ने निर्णय ले लिया था कि अब वापस ससुराल नहीं भेजना है। मेरे मन में यह चलता था कि लोग क्या कहेंगे। नौकरी पर नहीं जा रही, न ससुराल। गांव के लोग क्या सोचेंगे। समझौते की कोशिशें हुईं लेकिन पति का रवैया रूखा और उपेक्षापूर्ण ही था, तब मैंने और पापा ने तलाक का डिसाइड किया और खुद से डिवोर्स के लिए आगे आई। एक साल की प्रक्रिया के बाद 2016 में मेरा डिर्वोस हो गया।

लेकिन मैं हताशा और अवसाद से नहीं उबर नहीं पा रही थी, साइक्रिएटिस्ट की सलाह पर फिर से जीवन को आगे बढाने की दिशा में प्रयास किये। बदायूं में एक कॉलेज ज्वाइन किया।

इस दौरान बदायूं में एक प्राइवेट कॉलेज ज्वाइन किया। यहां मैंने पेंटिंग पढ़ाना शुरू किया। स्टूडेंट्स मिले। मेरा पैशन यहां दिखने लगा। धीरे-धीरे मैं अपने पास्ट से दूर होती गई। मैंने किसी को बताया भी नहीं कि मैं तलाकशुदा हूं। 2019 तक मैंने जॉब किया।

कोविड से पहले नौकरी छूट गई

तब पिता काफी बीमार चल रहे थे। कॉलेज, घर और हॉस्पिटल्स सब एक साथ मैनेज होना बहुत ही मुश्किल हो रहा था। उधर छुटि्टयां अधिक लेने से करने मैनेजमेंट का रवैया भी निगेटिव होने लगा। इसलिए मैंने नौकरी छोड़ दी। आगे पापा का दिल्ली में ट्रीटमेंट कराया।

कोविड में पोर्ट्रेट बनाना शुरू किया

पापा जैसे ही ठीक हुए, और मैं दुबारा जॉब ढूंढने की कोशिश कर ही रही थी कि तभी मार्च 2020 में कोविड आ गया। टोटल लॉकडाउन लग गया।

तब मैंने पेंटिंग में ही करिअर को शक्ल देना शुरू किया। सोशल मीडिया पर कई पेंटिंग पोस्ट करती थी। इस तरह लोग सराहते। लोग कहते कि हमारा पोर्ट्रेट बना दीजिए, जो पैसे होंगे दे देंगे। इस तरह ऑर्डर लेना शुरू किया।

एक हजार का था पहला ऑर्डर

पहला ऑर्डर एक हजार रुपये का लिया। फिर धीरे-धीरे पोर्ट्रेचर लाइफ में सेट होती गई। एक पोर्ट्रेट के पांच हजार मिल जाते हैं। यह भी साइज के ऊपर डिपेंड करता है। बड़े साइज के पोर्ट्रेट के 20 हजार तक मिलते हैं। कैनवस ऑयल पोर्ट्रेट की रेंज और हाई हैं पर महंगा होने की वजह से लोग कम बनवाते हैं।

सेलेब्रेटीज के भी पोर्ट्रेट बना रही

फिल्म अभिनेता आशुतोष राणा, प्रियंका चोपड़ा, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, आलिया भट्ट, अटल बिहारी वाजपेयी, योगी आदित्यनाथ आदि के पोर्ट्रेट बना चुकी हूं। पोर्ट्रेट देखने के बाद आशुतोष सर ने काफी सराहना की। कहा कि आपकी पोर्ट्रेट को हमेशा देखता था, लेकिन जन्मदिन के मौके पर मेरा पोर्ट्रेट बनाकर गिफ्ट दे दिया। आगे भी जब मौका मिलेगा, सेलेब्रेटीज बनाऊंगी।

कानपुर यूनिवर्सिटी से रिसर्च का प्लान

मैंने दोबारा से पढ़ाई करना शुरू किया है। कानपुर यूनिवर्सिटी से रिसर्च के लिए आवेदन किया है। अपने काम को और निखारना है। जो चीजें छूट गईं थीं उन्हें पूरा करना है। सोशल अवेयरनेस के लिए भी काम करना है

अपने विचार बदलें

मैं उस तरह की लड़की थी जो यही सोचती थी कि मरते मर जाओ, लेकिन अपनी समस्या को शेयर नहीं करो। त्याग और समर्पण से पति का दिल जीतने की कोशिश करो। लेकिन फिर भी प्रताड़ना ही मिली। मैं जितना बर्दाश्त करती गई पति उतना ही ज्यादा हद तक शारीरिक- मानसिक कमियां निकलता गया। सब कुछ सहने के बाद मेरे विचार बदल गए। मेरा यही कहना है कि अच्छी लड़की बनने के चक्कर में सदमा मत झेलो। गलत करो नहीं, गलत झेलो नहीं।

बेटी को दहेज नहीं, फ्लैट दो

गार्जियन को भी यही कहना चाहती हूं कि तलाकशुदा बेटी नाम डुबाती नहीं बल्कि नाम उठा भी सकती है। अपनी बेटी के टैलेंट को निखरने का पूरा मौका दें उसे हर सम्भव सपोर्ट दें और उसमें आत्मविश्वास भरें, आपकी बेटी जिंदगी में कभी फेल नहीं होगी, और अगर फेल हो भी गई तो दुबारा उठ खड़ी होगी।

और हां बेटियों को खूब सारे दहेज के रूप में ससुरालियों को कैश और सामान के बजाय उसे एक फ्लैट खरीद कर दें, अगर भविष्य में चीजें बिगड़ी तो बेटी के पास कम से कम अपनी एक छत तो होगी।