ये मैं हूं:साइकिल चलाकर 40 किमी दूर गई ताकि अचार बेचने के लिए बाजार मिले

नई दिल्ली5 महीने पहलेलेखक: मरजिया जाफर

राजकुमारी देवी से ‘किसान चाची’ बनने का सफर आसान नहीं था। मेरी उम्र 65 साल से ज्यादा है लेकिन काम करने की लगन मुझ में 20-22 साल की लड़की से भी अधिक है। मैं बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के आनंदपुर गांव की रहने वाली हूं।

पिता की तरह टीचर बनना चाहती थी, लेकिन मैट्रिक के बाद शादी हो गई। फिर बच्चे। अपनी ख्वाहिश पति को बताई लेकिन मेरी सौतेली सास ने मेरे सपनों का गला ये कह कर घोंट दिया कि दो बेटियां हो गईं हैं। उसके लिए दहेज जुटाओ न कि पढ़ाई में पैसे लगाओ। लोग बेटियों को अभिशाप समझते हैं। बेटी की मां बनने के बाद मुझे परिवार वाले हीन भावना से देखते।

पैसे कमाना है बस यही सोचा

पति ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे। घर में पैसों की तंगी थी। फिर मैंने सोचा कि कुछ भी करके पैसे तो कमाना है। पति के साथ मैंने खेतों में काम करना शुरू किया। उनको मेरा खेतों में काम करना पसंद नहीं था। वो नहीं चाहते थे कि मेरे घर की इज्जत इस तरह खेतों में काम करे।

एक आम महिला से ‘किसान चाची’ तक का सफर। मुजफ्फरपुर के सरैया की राजकुमारी देवी महिला किसानों के लिए प्रेरणा बनी।
एक आम महिला से ‘किसान चाची’ तक का सफर। मुजफ्फरपुर के सरैया की राजकुमारी देवी महिला किसानों के लिए प्रेरणा बनी।

पीछे मुड़कर नहीं देखा

मुझे कई बार मना भी किया कि कुछ कर लेंगे, तुम खेतों में काम मत किया करो। मैं तो पैसा कमाने और अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने के लिए कमर कस चुकी थी। मैंने पीछे मुड़कर कर नहीं देखा।

जैविक तरीके से उत्पादन बढ़ाया

1990 से मैंने घर की हालत सुधारने के लिए पति के साथ मिलकर खेती की। जैविक तरीकों से खेती कर उत्पादन को बढ़ाया। इसकी वजह से किसान मुझे जानने लगे।

ट्रेनिंग ली और अचार बनाना शुरू किया

घर पर अचार बनाना हर महिला को आता है, लेकिन इसका बिजनेस कैसे करें, इसकी अधिक जानकारी नहीं थी। 2002 में विज्ञान केंद्र से फूड प्रोसेसिंग की ट्रेनिंग ली और छोटे स्तर पर अचार बनना शुरू किया। मेरे बनाये अचार, देश-विदेश में पसंद किए जाते हैं।

मुझे अपने बच्चों का भविष्य बनाना था, इसलिए खेतों में उतरी जिसे मर्दों का काम माना जाता था, आज इसमें हूं सफल।
मुझे अपने बच्चों का भविष्य बनाना था, इसलिए खेतों में उतरी जिसे मर्दों का काम माना जाता था, आज इसमें हूं सफल।

तबीयत खराब हुई पर हौसला नहीं छोड़ा

तबीयत थोड़ी खराब जरूर हो गई थी, लेकिन मैं दोबारा काम पर लौटी। मुझे थोड़ी देर के लिए भी खाली बैठना पसंद नहीं है। डॉक्टर ने अभी साइकिल चलाने से मना किया है लेकिन दूसरी महिलाओं के साथ मिलकर अचार बनाने का काम मैं आज भी करती हूं। खेती में बेटा साथ देता है। जबकि, प्रोडक्शन का काम मैं खुद ही संभालती हैं।

साइकिल चलने की शुरुआत

अचार बेचने के लिए मैं आसपास के इलाके में टेम्पो, बस से जाती थी। बस का लंबा इंतजार बहुत समय बर्बाद करता था। इसलिए मैंने साइकिल चलाना सीखा। अचार के छोटे-छोटे पैकेट बनाकर साइकिल से 30 से 40 किमी की दूरी पर जाती। लोगों को इसका स्वाद चखाती ताकि लोग पसंद करें और अचार खरीदें। उस समय मुझे लोग हीन भावना से देखा करते थे, लेकिन आज वही समाज के लोग मुझे काफी इज्जत देते हैं।

ऐसे मिला किसान चाची नाम

2007 में मुझे किसान श्री से सम्मानित किया गया। इस वजह से ‘किसान चाची’ नाम का टैग मिला, जो अचार और मुरब्बे के लिए मशहूर है। 2015 और 2016 में केबीसी में शामिल हुई।

घर से बाहर निकली तो कई अवसर मिले

घर से बाहर निकलने के बाद, कई तरह के अवसर मिले। कृषि विज्ञान केंद्र में आयोजित होने वाले मेलों में मैं हमेशा भाग लेती थी। कई महिला समूह से भी जुड़ी मेहनत करती गईं। रास्ते खुलते गए। कुछ भी सोच समझकर नहीं किया। जैसे अवसर मिलते गए काम करती गई।

लाखों महिलाओं के लिए बनी रोल मॉडल, पद्मश्री से हो चुकी हैं सम्मानित।
लाखों महिलाओं के लिए बनी रोल मॉडल, पद्मश्री से हो चुकी हैं सम्मानित।

पुरस्कार

साल 2003 में कृषि मेला के दौरान लालू प्रसाद ने मुझे पुरस्कार दिया। 2006 में ‘किसान श्री सम्मान’ मिला।

11 मार्च 2019 को मुझे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने ‘पद्मश्री से सम्मानित किया

महिला किसान के लिए प्रेरणा

मैंने खेती की जिन-जिन नई तकनीकी को सीखा, उसे आस-पास की महिलाओं तक भी पहुंचाया। हर महिला, खेती में योगदान देती थी। पुरुष खेती करते हैं, तो भंडारण का काम महिलाएं ही संभालती हैं। लेकिन उन्हें पैसे नहीं मिलते, इसलिए महिलाओं की ज्यादा कद्र नहीं थी। मैंने उन्हें समझाया कि जो भी समय मिले, उसमें कुछ न कुछ प्रोडक्ट्स बनाओ और उसे बेचो। ऐसा करने से महिलाएं आत्मनिर्भर महसूस करती हैं। देखा जाए, तो हर किसी के पास कोई न कोई हुनर होता है, बस उसे इस्तेमाल करना जरूरी है।

किसान चाची का संदेश

मैं हमेशा ही नई तकनीकी और समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में यकीन रखती हूं। इस उम्र में भी मैं मशरूम उगाने और इससे प्रोडक्ट्स बनाने के बारे में महिलाओं को जागरूक कर रही हूं । सिर्फ चावल उगाने से नहीं होगा, महिलाओं को उससे पापड़ और पोहा बनाना भी सीखना चाहिए।

खुद के प्रोडक्ट्स, खुद बेचें और मुनाफा कमाएं। जिस काम में महिलाएं माहिर हैं, उससे फायदा तो उठाना ही चाहिए। मेरे गांव की हर महिला एक समूह के साथ मिलकर काम करती है और आत्मनिर्भर होने के प्रयास में लगी है।