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आकांक्षा शर्मा की स्ट्रगल स्टोरी:मायानगरी की चमक के पीछे छुपे काले अंधेरे से खुद को रखा दूर, बिना कनेक्शन के बॉलीवुड में बनाई जगह

11 दिन पहलेलेखक: पारुल रांझा

झुमरी तिलैया से रांची, राजस्थान और फिर मायानगरी। हिंदी सिनेमा के संगीत की नजम को समझने के सफर में मुझे बैक टू बैक रिजेक्शन मिले। एक पल आसमान की ऊंचाई छूती, तो अगले ही क्षण धरती पर उतर आती। मेरी मिडल क्लास फैमिली की जिंदगी एक रोलर कोस्टर राइड से कम नहीं थी। फैमिली में म्यूजिकल बैक्ग्राउंड का कोई नहीं, फिर भी सिंगिग को प्रोफेशन के तौर पर चुना। इसमें इतना रम गई कि 10वीं के बाद अपनी पढ़ाई तक छोड़ दी। शौक को पूरा करने के जूनून ने कभी हार नहीं मानने दी। आज कुछ करने और खुद को साबित करने के जज्बे ने ही मुझे सिंगर बनाया। शौकिया तौर पर गुनगुनाने से लेकर बॉलीवुड तक के इस सफर में मैंने कास्टिंग काउच को भी जाना। इसकी वजह से कई मौके गवाये। लेकिन कभी शॉर्टकट नहीं चुना। मुश्किल से मुश्किल रास्ता अपनाने को तैयार रही।

आकांक्षा शर्मा
आकांक्षा शर्मा

लोग कहने लगे, सिंगिंग में कुछ नहीं रखा

मुझे 9 साल की उम्र से ही सिंगिंग का ऐसा भूत सवार हुआ कि जब वक्त मिलता, सिर्फ गाने ही सुनती। लोगों का कहना था, सिंगिंग में कुछ नहीं रखा। लेकिन मैंने कॉन्फिडेंस नहीं गवाया। मुबंई जाने से पहले ही तय कर लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए हारना नहीं है। आग में तपने के बाद जैसे सोना खरा होता है, उसी तरह मुश्किलों ने मुझे मजबूत बनाया। मुझे याद है कि मुबंई से अचानक एक दिन ऑडिशन के लिए कॉल आया। अगले दिन वहां पहुंचना था। मैंने पापा से बात शेयर की, उन्होंने स्माइल के साथ कहा कि जरूर जाएंगे। पर मैं जानती थी कि एयर टिकेट्स के पैसे पेरेंट्स अफोर्ड नहीं कर सकते। टीचिंग के प्रोफेशन से जुड़े मेरे पेरेंट्स ने स्कूल से एडवांस लेकर मुझे मुबंई भेजा। ऑडिशन में एक मिनट में ही बाहर हो गई। लगा मानों किसी ने मेरे पंख काट दिए हो। उदास होकर वापस घर लौट आई। मेरे पापा हमेशा मेरे साथ खड़े रहे। एक बार फिर म्यूजिक प्रेक्टिस पर पूरा ध्यान देना शुरू किया।

विनर बनने के बाद शुरू हुआ असल सफर

मैंने पहली स्टेज परफॉर्मेंस 12 साल की उम्र में एक रियलिटी शो “छोटे उस्ताद” में दी। शो का विनर चुने जाने के बाद मेरा सफलता का सफर शुरू हुआ। जीत को मुठ्ठी में दबाए जब सपनों के शहर में बोरिया बिस्तर लेकर पहुंची, तब जाकर सिगिंग की दुनिया के उताड़-चड़ाव समझ आए। मायानगरी की चमक के पीछे छुपे काले अंधेरे से हमेशा खुद को दूर रखने की कोशिश की। भागती-दौड़ती मुंबई के साथ एडजस्ट होना मुश्किल था पर नामुमकिन नहीं। कोई जानने वाला नहीं, परिवार से दूर, सब कुछ नया, सब कुछ अलग। बीमार पड़ने पर भी किसी को नहीं बताती थीं।

2013 में जो जीता वही सुपर स्टार के फाइनल में पहुंची। सिंगिंग में पूरा ध्यान लगाने के लिए नॉर्मल लाइफ से पूरी तरह कट गई। मेरे सभी दोस्त मुझसे दूर हो गए, जिन्हें आज भी मैं सोशल मीडिया पर ढूंढती हूं। न जाने कितनी बार हारी, कितनी ही बार थकी। जब मेरे पास काम नहीं था तब भी कमजोर नहीं पड़ी। हर पड़ाव पर रिजेक्शन के उस दौर में “जी म्यूजिक” ने मेरी आवाज को पसंद किया। ये मेरे लिए किसी एचिवमेंट से कम नहीं रहा। फिर कुछ एलबम्स के लिए गीत गाए। जिंदगी के मकसद को एक नई दिशा मिली और वहीं से मेरा करियर शुरू हुआ। पहला गाना “तू अलविदा” ट्रैफिक फिल्म के लिए गाया। अरिजीत सिंह, जुबिन नौटियाल, जावेद अली, आयुष्मान खुराना जैसे नामी सिंगर्स के साथ अपनी आवाज शेयर की।

अब तक मैं 15 से 20 गाने गा चुकी हूं। शादी में जरूर आना, गोल्ड, अंधाधुन फिल्म्स में मेरे कई गाने खूब वायरल हुए। सोहणा सोहणा इतना भी कैसे तू सोहणा....तेरे इश्क में जोगी होना मेनू जोगी होना... गाने को लोगों की बेहद तारीफें मिलीं, जिससे मेरा हौसला बढ़ता गया। भले ही एक मुकाम पर पहुंच गई हूं, पर राजस्थान में पली बड़ी होने के चलते वहां के लोक गीत हमेशा जहन में रहेंगे। जिस जगह मेरा बचपन गुजरा, वहां की यादें कभी पुरानी नहीं होंगी। राजस्थान के लोक गीतों ने मेरा राजस्थानी मिट्टी से नाता जोड़े रखा है। मेरा लोक गीत “घूमरदार लहंगा” भी लोगों को काफी पंसद आया। एक कलाकार के तौर पर तारीफ मिलने से मेरा कॉन्फिडेंस काफी बढ़ा, तभी अपना यूट्यूब चैनल लांच करने का फैसला किया। थाने काजळियो बणां ल्युं... म्हारे नैणा में रमा ल्युं... राज पलकां में बंद कर राखुली... राज पलकां में बंद कर राखुली...गाने के यूट्यूब पर 100 मिलियन से ज्यादा व्यूज है। आज संगीत की पाठशाला की बदौलत मैं लोगों के दिलों में जगह बना पाई हूं। उम्मीद है कि मेरे नए गाने काजलियो रिटर्नस को भी लोग पसंद करेंगे।

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