कांच की फैक्ट्री चलाने वाली ‘भाभी जी’:पति की मृत्यु के साथ सुहाग की सारी निशानियां उतार दीं, चूल्हा-चौका से निकल भट्टियों में झोंकी आग

3 दिन पहलेलेखक: मीना

अभी तक मैं एक पत्नी, मां, बहू और गृहिणी थी, लेकिन आज पूरे फिरोजाबाद में एक अकेली ऐसी महिला हूं जो कांच की फैक्ट्री चला रही है। लोग मुझे ‘भाभी जी’ कहते हैं। जोश और उपलब्धि से भरे ये शब्द ममता गुप्ता के हैं, जो अपनी बात रखते वक्त इतनी जोश से भर जाती है कि सामने वाला भी उनकी सफलता की खुशी से अछूता नहीं रहता।

पति की मृत्यु के बाद संभाला कारोबार
इटावा में जन्मी और फिरोजाबाद में ब्याही ममता गुप्ता वुमन भास्कर से खास बातचीत में कहती हैं, ‘साल 2003 में पति की हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई और उस वक्त मेरी गोद में तीन छोटे बच्चे थे। बड़ी बेटी 12 साल की और छोटा बेटा 2 साल का था।

पति का साथ छूटने के बाद लगा कि अब मैं अकेली क्या करूंगी? एकदम से दुखों का पहाड़ सिर पर टूट पड़ा। सामने बिलखते छोटे बच्चे दिखाई दिए तो लगा कि इनके लिए तो मुझे खड़ा होना पड़ेगा, अगर कुछ नहीं किया तो मेरे बच्चों की बेकदरी की मैं जिम्मेदार होऊंगी।

ममता गुप्ता का जन्म इटावा में हुआ। शादी फिरोजाबाद में हुई। पति की मृत्यु के बाद उन्होंने खुद और अपने बच्चों को संभाला।
ममता गुप्ता का जन्म इटावा में हुआ। शादी फिरोजाबाद में हुई। पति की मृत्यु के बाद उन्होंने खुद और अपने बच्चों को संभाला।

जब तोड़ीं सुहाग की चूड़ियां
अपनी लाल मांग को सूना होते और सुहाग की चूड़ियां टूटते देखा। लाल रंग के शादी के जोड़े को अलमारी में सहेजकर रखा और रखकर भूल गई। हिम्मत जुटाई और पति द्वारा चलाई जा रही कांच की फैक्ट्री संभालने पहुंच गई।

शादी के 13 साल बाद भी कभी घर से बाहर अकेले निकलना नहीं हुआ, क्योंकि जरूरत ही नहीं पड़ी, लेकिन पति के जाने के बाद बच्चों के लिए घर से बाहर कदम रखने की हिम्मत 15 दिन में ही जुटा ली। फैक्ट्री पहुंची तो लगा कि ये दूसरा ‘देश’ है। अभी तक जो महिला चूल्हा-चौका संभालती थी, अब अचानक से रेत, मिट्टी, भट्टी, मशीने और टूटे कांच का भंगार संभालने लगी। दुख की किरचें और गहरी होकर चुभने लगीं, लेकिन वो सभी कुछ सहा क्योंकि मुझे अपने बच्चे पालने थे।

चूल्हे की आंच से निकल पहुंची भट्टियों की आग में
चूल्हे की आंच सही थी अब भट्टी की आग सहने की भी आदत पड़ने लगी। मुझे पांच-दस हजार रुपए तक गिनने नहीं आते थे। एक गड्डी को दस बार गिनती, लेकिन अब लेबर को उनकी तन्ख्वाह देती हूं और लाखों रुपए तक गिनकर सामने वाले को थमाती हूं। मुश्किलों ने जिंदगी के हिसाब-किताब को गिनना सिखा दिया।

फैक्ट्री में जाने के बाद पहली बार जब पहला ऑर्डर लेने एक क्लाइंट के पास गई तो जाने से पहले बहुत घबराहट हो रही थी कि कैसे बात करूंगी? कैसे अपने माल के बारे में बताऊंगी? कैसे बताऊंगी कि मैं कांच से हैंडलूम, ट्यूब, लैम्प वगैरह बनाती हूं।

ममता के मुताबिक, 'मैंने कभी हजार रुपए तक नहीं गिने थे, लेकिन आज लाखों गिनती हूं।'
ममता के मुताबिक, 'मैंने कभी हजार रुपए तक नहीं गिने थे, लेकिन आज लाखों गिनती हूं।'

क्लाइंट्स ने दी हिम्मत
पर क्लाइंट्स ने ही मेरी हिम्मत जुटाई। उनकी मदद से ही मैं आगे बढ़ी। पति के पुराने क्लाइंट्स थे तो आगे काम करने में बहुत दिक्कत नहीं आई। सब मदद को आगे आए और मेरा काम संभालने में मेरी मदद की।

ऐसा नहीं है कि 18 साल कांच की फैक्ट्री चलाने में कोई कठिनाई, चुनौती नहीं आई। फैक्ट्री में ज्यादातर मर्द हैं। फिरोजाबाद कांच की नगरी है और यहां पुरुषों की ही धाक चलती है। ऐसे में एक महिला का पैर जमाना आसान नहीं होता। शुरू में इस बिजनेस में दूसरों को लगा कि ‘अरे ये अकेली महिला क्या कर लेगी?’

कुछ ने ठगने की सोची
कईयों ने मुझे माल पहुंचाने पर पूरे पैसे तक नहीं दिए। किसी-किसी ने समय पर पैसे नहीं लौटाए, लेकिन जब कभी किसी पुरुष को लगा कि मैं औरत हूं और मुझे ठगा जा सकता है, वहीं मेरी नजर सख्त हो गई। मेरी आंखों में दबंगई, सामने वालों को साफ नजर आ जाती और मैं प्यार से न सही तो दबंगई से पैसे वसूल लेने में कामयाब होती।

वो महिला जो अब तक किसी से बात नहीं कर सकती थी, बात करने में शर्माती थी, फैक्ट्री मालिक बनते-बनते दबंग बन गई। मेरी आवाज बदल गई। नर्मी और नजाकत कहीं खो गई। चाल भी मर्दाना हो गई। अभी जब फैक्ट्री में जाती हूं तो कांच बनाने में जो मटिरियल यूज होता, उसे अपने हाथ से मिक्स करके लेबर को देती हूं, ताकि माल अच्छा बने। क्वालिटी मेरा परम धर्म है।

ममता ने जीवन में कभी हार नहीं मानी और पूरे परिवार की जिम्मेदार अकेले संभाली।
ममता ने जीवन में कभी हार नहीं मानी और पूरे परिवार की जिम्मेदार अकेले संभाली।

बेबाक और दबंग हो गई हूं
अब तो मैं हर मंच पर भी अपनी कहानी बिना झिझक बताती हूं। कई सम्मान मिल चुके हैं। महिलाएं जब मेरी कहानी सुनती हैं तो प्रेरित और प्रभावित होती हैं। कई तो मेरी पीठ थपथपाती हैं और मैं नम आंखों से उनका शुक्रिया करती हूं। सभी का ये प्यार मुझे आगे बढ़ने का होसला देता है।

अब मैं हर महिला को यही कहती हूं कि परिस्थितियां जो भी हों, कभी हार न मानें। आप महिला हैं तो क्या हुआ, हिम्मत नहीं हारनी है। शरीर बलवान होना जरूरी नहीं, मन से बलवान और सोच से शक्तिमान बनें। ऐसा कोई बिजनेस नहीं जो हम महिलाएं नहीं कर सकतीं।

कल पढ़ें चूड़ियों के नगर से एक और कहानी…

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