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ये मैं हूं:कॉरपोरेट में डरकर नहीं डटकर काम किया, बॉस की चापलूसी नहीं की, बदतमीजी का जवाब थप्पड़ से दिया

7 महीने पहलेलेखक: मीना

मुझे मेरी मां बताती हैं कि जब मैं छोटी थी तब रोती थी तो किसी को पता नहीं चलता था कि मैं रो रही हूं। बचपन से ही पर्सनेलिटी एकदम शांत बच्चे की रही, लेकिन जब बड़ी हुई कॉलेज गई और नौकरी शुरू की तो देखा कि लड़की हूं और ऊपर से सुंदर तो पुरुषों की नजरें मेरे काम को नहीं मुझे आंकती। ऐसा एक बार नहीं कई बार हुआ। यही वजह है कि कई नौकरियां छोड़ीं और पकड़ी और आज अपना स्टार्टअप शुरू किया है और अब स्टार्टअप के जरिए गांव को शहर में लेकर आ रही हूं। ये शब्द हैं- जम्मू में जन्मी और दिल्ली में पली-बढ़ी सुरभि सप्रू के।

सुरभि ने अब अपना काम शुरू किया है।
सुरभि ने अब अपना काम शुरू किया है।

वुमन भास्कर से खास बातचीत में वे बताती हैं, ‘1992 में पापा के काम की वजह से हमारी फैमिली जम्मू से जयपुर आ गई थी। यहां मैंने 9वीं तक पढ़ाई की। सबसे पहली परेशानी मेरे लिए मेरी हाइट बनी। मैं स्कूल में बाकी बच्चों से लंबी थी। इस वजह से मेरा हुनर टीचर्स को दिखता नहीं था। एक बार की बात है। मैं 9वीं क्लास में ही थी। पिछले दो तीन सालों से कत्थक सीख रही थी और जब स्कूल में एक कॉम्पीटिशन के लिए मेरा सिलेक्श नहीं हुआ तो मुझे दुख हुआ। दरअसल, मेरी हाइट ज्यादा थी तो जब स्कूल में हम लोग कत्थक की प्रैक्टिस करते तो टीचर को आगे वाले बच्चे दिखाई देते मैं नहीं। ऐसे में उन्होंने छोटी हाइट वाले बच्चों को चुना। उस कॉम्पीटिशन में मुझे भी हिस्सा लेना था। तब मेरी मां ने मेरे हिस्से की लड़ाई लड़ी। उन्होंने टीचर्स को समझाया कि ये कई सालों से प्रैक्टिस कर रही है। फिर उस दिन से मुझे हर बार सरस्वती वंदना में शामिल किया जाने लगा। ये मेरी पहली लड़ाई थी जहां मां ने साथ दिया। इसके बाद की सारी लड़ाइयां मैंने खुद लड़ीं।
पहली लड़ाई में मां ने दिया साथ
मुझे लगता है कि हमारे पेरेंट्स का इतना मजबूत और वोकल होना जरूरी है कि अगर बच्चा कहीं कमजोर पड़े तो उसकी मदद कर पाए। मुझे ऐसे ही मां-पिता मिले। पापा का काम जब जयपुर से दिल्ली आ गया तो हम पूरी फैमिली इधर आ गए। 9वीं के बाद की पढ़ाई केंद्रिय विद्यालय से की। ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन दिल्ली विश्वविद्यालय से की।
अब तक जिंदगी में लगभग चीजें ठीक चल रही थीं लेकिन जब कॉरपोरेट की दुनिया में आई तो असली दुनिया का सच दिखाई दिया।
ग्रेजुएशन के बाद पांच साल तक इंवेंट मैनेजमेंट का काम किया। यहां जिंदगी को नया एंगल मिला। लाइफ के बड़े सबक मुझे नौकरी में आकर ही मिले। ग्लैमर की इंडस्ट्री में ये ट्रेंड बना लिया है कि स्मार्ट और गोरी लड़की ‘उसी लेवल’ की होगी। वह सुंदर लड़की कितना ही अच्छा काम करे लेकिन उसके काम से ज्यादा उसके शरीर को तरजीह दे जाती है और जो लड़कियां इस सोच के खिलाफ लड़ती हैं तो उन्हें अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि ये मेरे साथ ही हुआ है, जबकि इंडस्ट्री में काम करने में हर लड़की इस नजरिए को झेलती है।
जब मैं डायरेक्टर के चुंगल में नहीं फंसी
मुझे एक इंसीडेंट याद आ रहा है। मैंने कंपनी में काम शुरू किया। वहां दो डायरेक्टर थे। उस कंपनी में कोई लड़की नहीं थी। मैंने कंपनी के चपरासी से पूछा कि यहां कोई लड़की क्यों नहीं है? तो उसने जवाब दिया कि मालकिन उन्हें निकाल देती हैं। वहां काम करते हुए 3 महीने हुए तब मुझे एक बड़े होटल में एक बड़े इंवेंट में भेजा गया। वहां मुझे जरूरत से इंपोर्टेंस मिल रही थी। सबका मेरे प्रति इंपोर्टेंस वाला बिहेवियर बहुत अटपटा लग रहा था। बाद में मुझे मालूम हुआ कि कंपनी के एक डायरेक्टर ने स्टाफ को कह रखा था कि सुरभि मेरी गर्लफ्रेंड है। ये सुनकर मैं दंग रह गई। मैं तनफनाई हुई उस डायरेक्टर के पास गई और मेरी शिकायत कंपनी के मालिक की वाइफ के पास पहुंची। इस कंपनी में यही चल रहा था जो लड़की इस डायरेक्टर के चुंगल में नहीं फंसती थी उसकी शिकायत कंपनी के प्रमुख के पास भेज दी जाती और फिर उनकी वाइफ उस लड़की को निकाल देतीं। गलती मर्द करते थे और दोष लड़कियों पर मढ़ दिया जाता था। उस अनुभव के बाद मैंने नौकरी छोड़ दी। हालांकि, कंपनी मालिक की वाइफ ने मुझसे बाद में भी कहा तुम नौकरी मत छोड़ो। इसके बाद मुझे उस ऑफिस में झांसी की रानी कहा जाने लगा क्योंकि मैं बॉस की चापलूसी नहीं करती थी। जो गलत था उसे मुंह पर बोल देती थी।

जब पुरुषों की बदतमीजी देखी तो सहा नहीं, जवाब दिया।
जब पुरुषों की बदतमीजी देखी तो सहा नहीं, जवाब दिया।

मालिक के मुंह पर फेंक कर मारे पैसे
इस कंपनी के बाद मैंने एक होटल में नौकरी शुरू की। वहां मुझे पैकेज अच्छा मिला। एकदम क्रीम जॉब थी। उस पैकेज को देने के पीछे की भावना बुरी थी। जब मालिक को मालूम हुआ कि मैं नौकरी छोड़ने वाली हूं तो मुझे कैबिन में बुलाया और लालच देने लगे। बोलने लगे कि ‘मैं तुम्हें गाड़ी दूंगा, खाने की भी यही व्यवस्था होगी, तुम्हें कुछ नहीं करना होगा।’ बस मैं जो मांग रहा हूं, तुम्हें वो देना होगा।’ ये सब सुनने के बाद मैंने उस मालिक को कहा कि आपको मेरी शक्ल देखकर क्या लगता है कि मैं कोई कठपुतली हूं और मुझे जैसे नचाएंगे मैं वैसे नाचूंगी। मैं यहां काम करने आती हूं और आप मुझे उसका पैसा देते हैं। इसके अलावा आपका और मेरा कोई रिश्ता नहीं है। तमतमाए चेहरे के साथ केबिन से बाहर निकली और आधे से ज्यादा ऑफिस को बताया कि ये मालिक मुझसे स्पेशल डिमांड कर रहा है। उसके बाद वो नौकरी छोड़ दी। जो पैसे मुझे दिए गए उन्हें मैं उनके मुंह पर मारकर निकली। जिन मालिकों की मर्जी के खिलाफ गई ये सभी बहुत पहुंच हुए अमीर आदमी थे। सबके बड़े सोर्स थे, लेकिन मैं डरी नहीं। मुझे जो बुरा लगा उसके खिलाफ तुरंत आवाज उठाई। कॉरपोरेट में कॉम्प्रोमाइज करके काम नहीं किया। बचपन में इतनी शांत लड़की रही लेकिन दुनिया ने सिचुएशन ऐसी थी कि आग बनना पड़।
कई लोगों को यह भी लगता है कि मेरे ही साथ ऐसे अनुभव हो रहे हैं तो मुझमें ही कुछ खराब होगा, जबकि ऐसा नहीं है। हर लड़की ऐसे अनुभवों को झेलती है बस मेरी तरह थप्पड़ मारकर बाहर नहीं निकलती, उसे सहती रहती है।
जो लड़के किसी लड़की को छेड़ते हैं या छेड़ने की कोशिश करते हैं तो वे खुद भीतर से बहुत डरे हुए होते हैं क्योंकि वे कुछ गलत करने जा रहे हैं। जैसे इनकी कोशिशों के खिलाफ कोई लड़की बोल देती है वे तुरंत घबरा जाते हैं। मैं कॉलेज में भी ऐसी ही थी। कई लड़के लड़कियों को प्रपोज करते हैं लेकिन कॉलेज में मेरी पर्सनेलिटी इतनी दंबग थी कि कोई भी मुझसे पंगा लेने से डरता।
नॉलेज बनी मुसीबत
कॉरपोरेट में माना जाता है कि लड़की सुंदर है, लंबी है और नॉलेजेबल है। तो आपकी नॉलेज व सुंदरता ही आपके लिए मुसीबत बन जाती है। अब एक नौकरी के लिए मैं अपनी शक्ल तो बदल नहीं सकती थी, तो मैंने उस सोच के खिलाफ लड़ाई लड़ी। मेरे घर वाले कहते थे कि इसकी शादी कैसे होगी? लेकिन विधि का विधान देखिए मेरे रिश्ता आया तो फेसबुक से। मेरे ससुर ने मुझे फेसबुक पर ही देखा था और पसंद कर लिया। अब ससुराल जो मिला है वो बहुत सपोर्टिव है।

पति के साथ परिवार का भी मिल रहा साथ।
पति के साथ परिवार का भी मिल रहा साथ।

अपना स्टार्टअप किया शुरू
इवेंट मैनेजमेंट के बाद मीडिया में भी काम किया, लेकिन वहां वर्क कल्चर ऐसा है कि पर्सनल लाइफ की वाट लग जाती है। अब 2019 में अपना स्टार्टअप शुरू किया है जिसका नाम कार्मार है। कार्मार एक संस्कृत शब्द है जिसका मतलब आर्टिजन्स और आर्ट है। इस स्टार्टअप के जरिए मिट्टी के बर्तनों को प्रमोट कर रहे हैं। कॉसेप्ट ये है कि इस तरह के काम को प्रमोट करके हम गांव को शहर में ला रहे हैं। इससे लोगों की हेल्थ को फायदा होगा।
गलतियों का ट्रेंड सेटर न बनें
अब हर लड़की को यही कहूंगी कॉरपोरेट में कॉम्प्रोमाइज करके कभी नौकरी न करें। आपमें काबिलियत है तो हजारों नौकरियां आपके लिए हैं। सिर्फ नौकरी में ही नहीं बल्कि कहीं भी कॉम्प्रोमाइज न करें। जहां आप ठीक हैं वहां न झुकें। गलतियों का ट्रेंड सेटर न बनें। जब आपकी इज्जत पर बात आ जाए तो कभी न झुकें।

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