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दुनिया के सबसे बड़े युद्धाभ्यास में भारत समेत 25 देशों के साथ हिस्सा ले रहा अमेरिका, चीन को न्योता नहीं

चीन इससे पहले 2014 और 2016 रिमपैक में हिस्सा ले चुका है, कई मुद्दों पर अमेरिका से तल्खी के बाद उसे नहीं बुलाया गया।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Jul 02, 2018, 11:54 AM IST

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  • युद्धाभ्यास में 47 जंगी जहाज, 5 पनडुब्बी और 200 से ज्यादा एयरक्राफ्ट्स हिस्सा लेंगे
  • 25 देशों के साथ नौसैन्य अभ्यास में हिस्सा लेकर अमेरिका प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ अपनी साझेदारी बढ़ाना चाहता है

नई दिल्ली. अमेरिका और भारत इस साल दुनिया के सबसे बड़े नौसैन्य अभियान में हिस्सा लेने के लिए पर्ल हार्बर पहुंच चुके हैं। अमेरिका की तरफ से हर साल आयोजित होने वाले इस अभ्यास को रिमपैक नाम दिया गया है। इस साल इसमें कुल 26 देश हिस्सा ले रहे हैं। पहली बार ब्राजील, इजरायल, वियतनाम और श्रीलंका भी इस युद्धाभ्यास में शामिल किए गए हैं। हालांकि, दक्षिणी चीन सागर को लेकर जारी विवाद के चलते अमेरिका ने इस साल चीन को निमंत्रण नहीं दिया है। चीन 2014 से ही इस युद्धाभ्यास में शामिल हो रहा था।

अमेरिका की देशों को पास रखने की कोशिश
अमेरिका हर दो सालों में प्रशांत महासागर और इसके पास स्थित कुछ देशों को अपने साथ युद्धाभ्यास में हिस्सा लेने के लिए न्योता देता है। बताया जाता है कि अमेरिका इसके जरिए अपने से दूर स्थित देशों को कूटनीतिक तौर पर साथ रखने की कोशिश करता है। इस साल ये युद्धाभ्यास 27 जून से 2 अगस्त तक होना है। रिमैपक 2018 में करीब 47 जंगी जहाज, 5 पनडुब्बी और 200 से ज्यादा एयरक्राफ्ट्स हिस्सा लेंगे। साथ ही 25 देशों के करीब 25 हजार सैनिक भी इसमें शामिल होंगे। हालांकि ज्यादातर शिप, सबमरीन और एयरक्राफ्ट्स अमेरिका के ही होंगे। ये युद्धाभ्यास दक्षिणी कैलिफोर्निया के करीब हवाई द्वीप के पास ही किए जाएंगे। इस साल नौसैन्य अभ्यास में भारत की तरफ से स्वदेशी आईएनएस सहयाद्री भेजा गया है। शिवालिक क्लास का ये युद्धपोत अपनी गुप्त और जमीन में मार करने वाली क्षमताओं की वजह से भारतीय नेवी का अहम हिस्सा बन चुका है।

अमेरिका के लिए नौसैन्य अभ्यास क्यों जरूरी?
25 देशों के साथ नौसैन्य अभ्यास में हिस्सा लेकर अमेरिका प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ अपनी साझेदारी बढ़ाना चाहता है। साथ ही इसके जरिए वो दुश्मन देशों के सामने अपनी ताकत का नजारा पेश करना चाहता है। इस साल युद्धाभ्यास में सभी देश राहत और बचाव, डकैतों के खिलाफ कार्रवाई और नौसैन्य सुरक्षा ऑपरेशन में हिस्सा लेंगे। अमेरिका के तीसरे बेड़े की ओर से जारी बयान के मुताबिक, इसमें एंटी सबमरीन और एयर डिफेंस ऑपरेशन्स भी रखे गए हैं।

चीन को क्यों किया गया रिमपैक से बाहर?
2014 और 2016 में चीन भी रिमपैक में शामिल था। लेकिन, ट्रम्प प्रशासन में अमेरिका और चीन के रिश्ते लगातार बिगड़ते चले गए हैं। हालिया समय में दोनों देशों के बीच सैन्य और आर्थिक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। जहां अमेरिका ने चीनी सामानों पर अलग-अलग तरह के आयात शुल्क लगाए हैं, वहीं दक्षिणी चीन सागर को खोलने को लेकर भी उसके चीन के साथ उसके रिश्ते खराब हैं। इसी साल मई में चीन ने इस इलाके में मौजूद द्वीपों का सैन्यीकरण शुरू कर दिया था। यहां तक की पारासेल द्वीप पर उसने अपना एच-6के न्यूक्लियर बॉम्बर प्लेन भी तैनात कर दिया था। चीन की इस हरकत के बाद ही अमेरिका ने रिमपैक युद्धभ्यास से चीन को बाहर करने का ऐलान किया था।
2014 में पहली बार जब चीन को इस युद्धाभ्यास में हिस्सा लेने के लिए बुलाया गया था, तब उसने अपने युद्धक पोतों के साथ एक और शिप को अभ्यास पर नजर रखने के लिए भेज दिया था। इस पर अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने चीन की मंशा पर सवाल उठाए थे। हालांकि, चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने रिमपैक से बाहर किए जाने को अमेरिका का गुस्ताखी भरा कदम बताया था। वांग का कहना था कि चीन अपने क्षेत्र में किसी भी तरह का निर्माण कर सकता है।

यूएन में अमेरिका की अम्बेस्डर निकी हेली पिछले हफ्ते ही भारत में थी। यहां 20 मिनट के भाषण के दौरान उन्होंने करीब 14 बार हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) शब्द का इस्तेमाल किया था। इससे पहले मई में ही अमेरिकी सेना ने अपने प्रशांत कमांड का नाम बदलकर हिंद-प्रशांत कर दिया था। माना जा रहा है कि अमेरिका भारत को चीन के खिलाफ अपने अहम साझेदार की तरह देख रहा है। ऐसे में प्रशांत क्षेत्र में भारत की अहमियत बढ़ जाती है।

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