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डोकलाम विवाद के 10 महीने बाद चीन ने तिब्बत में किया सैन्याभ्यास, सेना-नागरिक सामंजस्य पर जोर

अगस्त 2017 में पीएलए ने तिब्बत में 4600 मीटर की ऊंचाई पर 13 घंटे तक सैन्याभ्यास किया था।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Jun 29, 2018, 07:57 PM IST

डोकलाम विवाद के 10 महीने बाद चीन ने तिब्बत में किया सैन्याभ्यास, सेना-नागरिक सामंजस्य पर जोर

- भारत और चीन के बीच डोकलाम विवाद जून 2017 में शुरु हुआ और अगस्त तक चला था

- डोकलाम जैसी स्थिति दोबारा ना बने, इसके लिए दोनों देश लगातार कई स्तरों पर बातचीत कर चुके हैं

बीजिंग.चीन ने डोकलाम विवाद के 10 महीने बाद तिब्बत में सैन्याभ्यास किया। इसका मकसद नागरिकों और सेना के बीच सामंजस्य को मजबूत करना था। चीन के सरकारी न्यूज पेपर ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक, मंगलवार को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए), स्थानीय कंंपनियों और सरकार ने मिलकर तिब्बत के दूरदराज के इलाके में सैन्य-असैन्य एकीकरण को परखने के लिए अभ्यास किया। इससे पहले अगस्त 2017 में तिब्बत में पीएलए ने 4600 मीटर की ऊंचाई पर 13 घंटे तक अभ्यास किया था।

तिब्बत में की गई हालिया ड्रिल के बारे में चीन के विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह के अभ्यास बेहद अहम हैं। इसके पीछे चीन का मकसद भी नए युग की मजबूत सेना तैयार करना है। दलाई लामा की विरासत वाले क्षेत्र में सैन्य-असैन्य एकीकरण ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्विनघाई-तिब्बत पठार का इलाका बेहद विषम है। यहां सेना का साजो-सामान पहुंचाना कठिन है। इन हालात में सैनिकों को रसद, राहत और आपात सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए सेना ने सैन्य-असैन्य एकीकरण की रणनीति अपनाई है।

1962 की जंग में चीन को नहीं मिला था पूरा फायदा:सेना विशेषज्ञ सोंग झोंगपिंग के मुताबिक, बहुत अधिक ऊंचाई पर युद्ध के दौरान सबसे बड़ी चुनौती सिपाहियों को हथियार और साजो-सामान मुहैया कराना होता है। 1962 में भारत से लड़ाई जीतने के बावजूद चीन इसका पूरा फायदा नहीं उठा पाया था, क्योंकि सैन्य तंत्र से उसे पूरा सहयोग नहीं मिल पाया था। हालांकि, उस वक्त भी तिब्बत के निवासियों ने सिपाहियों को अस्थायी सहयोग दिया था, लेकिन ये ज्यादा टिकाऊ नहीं था।

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