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अल-नीनो के कारण सामान्य से कम रह सकता है मानसून, जून के बाद असर देखने को मिल सकता है

वरिष्ठ मौसम विज्ञानी काइल तापले ने कहा कि कम बारिश से भारत में सोयाबीन, मूंगफली और कपास की फसलें प्रभावित हो सकती हैं।

Bhaskar News | Last Modified - Mar 14, 2018, 04:53 AM IST

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    भौगोलिक आंकड़ों पर काम करने वाली निजी अमेरिकी संस्था रेडिएंट सॉल्यूशंस ने यह अनुमान जताया है। - सिम्बॉलिक इमेज

    सिंगापुर. इस बार मानसून की बारिश सामान्य से कुछ कम रह सकती है। वजह है अल-नीनो। जून के बाद इसका असर देखने को मिल सकता है। भौगोलिक आंकड़ों पर काम करने वाली निजी अमेरिकी संस्था रेडिएंट सॉल्यूशंस ने यह अनुमान जताया है। रेडिएंट के वरिष्ठ मौसम विज्ञानी काइल तापले ने कहा कि कम बारिश से भारत में सोयाबीन, मूंगफली और कपास की फसलें प्रभावित हो सकती हैं। पिछले साल भी मानसून की बारिश औसत से कम रही थी। लंबी अवधि के औसत की तुलना में 95% बारिश हुई थी, जबकि मौसम विभाग का अनुमान 98% का था।

    अल-नीनो से बन जाते हैं एशिया के कुछ इलाकों में सूखे के हालात

    काइल ने कहा कि ला-नीना कमजोर हो रहा है और अल-नीनो की आशंका बढ़ रही है। मौसम का अनुमान लगाने वाली दूसरी निजी कंपनियों ने भी अल-नीनो की आशंका व्यक्त की है, लेकिन सरकारी विभागों ने इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा है। अल-नीनो से एशिया के कुछ इलाकों में सूखे की स्थिति बन जाती है, जबकि दक्षिणी अमेरिका में सामान्य से अधिक बारिश होती है।

    ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी इलाकों में भी अल-नीनो का असर

    काइल ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी इलाकों में भी मौसम शुष्क रह सकता है। इसका असर वहां गेहूं की फसलों पर होगा। सूखा झेल रहे अर्जेंटीना में दो हफ्ते में बारिश हो सकती है, लेकिन सोयाबीन की फसल के लिए यह काफी लेट हो चुकी है। गर्म मौसम के कारण पिछले साल ऑस्ट्रेलिया में गेहूं की पैदावार 30% कम रही थी।

    क्‍या होता है अल नीनो?

    अल-नीनो स्पैनिश भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है- शिशु यानी छोटा बालक। उष्‍ण कटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में पेरू और ईक्‍वाडोर के तटवर्ती इलाकों में पैदा हुई स्थिति को अल नीनो कहा जाता है। यह समुद्र में होने वाली उथल-पुथल है और इससे समुद्र के सतही जल का ताप सामान्य से ज्यादा हो जाता है। इसका पूरे विश्व के मौसम पर प्रभाव पड़ता है।


    कैसे होता है अल-नीनो इफेक्ट?

    वैज्ञानिक अर्थ में अल-नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यीय क्षेत्र की उस समुद्री घटना का नाम है जो दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित इक्वाडोर और पेरू देश के तटीय समुद्री जल में कुछ सालों के अंतराल पर घटित होती है। इसके तहत समुद्र की सतह के तापमान में असामान्‍य तौर पर इजाफा हो जाता है। इसकी वजह से दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित ईक्‍वाडोर और पेरू के तटीय क्षेत्र धीरे-धीरे समुद्र में समाते जा रहे हैं। इससे आसपास के क्षेत्रों का तापमान भी बढ़ने लगता है।

    ला-नीना से ठीक उलटा होता है अल नीनो

    नीना अल-नीनो से ठीक उलटा प्रभाव रखती है। पश्चिमी प्रशांत महासागर में अल-नीनो द्वारा पैदा किए गए सूखे की स्थिति को ला-नीना बदल देती है। यह आर्द्र मौसम को जन्म देती है। ला-नीना के कारण पश्चिमी प्रशांत महासागर के उष्ण कटिबंधीय भाग में तापमान में वृद्धि होने से वाष्पीकरण ज्यादा होने पर इंडोनेशिया और समीपवर्ती भागों में सामान्य से अधिक बारिश होती है। ला-नीनो कई बार दुनियाभर में भयंकर बाढ़ का कारण भी बन जाता है।

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    भारत में पिछले साल भी मानसून की बारिश औसत से कम रही थी। - फाइल
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