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इराक के मोसुल में आतंक से आजादी का जश्न: स्कूल लौटे बच्चे, महिलाएं भी देर रात तक बाजार में नजर आती हैं

इसी शहर से बगदादी ने खुद को खलीफा घोषित किया था। 23 हजार इराकी सैनिकों ने शहादत देकर मोसुल को आईएस से आजाद कराया।

Dainik Bhaskar

Jan 22, 2018, 08:19 AM IST
मोसुल की गलियों में मकानों पर गोलियों के निशान जरूर नजर आते हैं लेकिन बच्चों को अब आतंक से आजादी मिल चुकी है। मोसुल की गलियों में मकानों पर गोलियों के निशान जरूर नजर आते हैं लेकिन बच्चों को अब आतंक से आजादी मिल चुकी है।

मोसुल/बगदाद/ नई दिल्ली. दजला नदी के किनारे बसा इराक का दूसरा सबसे बड़ा शहर मोसुल। यह शहर अपने खूबसूरत आर्किटेक्चर के लिए जाना जाता था। तीन साल पहले आतंकी संगठन आईएस की हुकूमत में यह शहर मलबे मंे तब्दील हो गया था। इसी शहर से बगदादी ने खुद को खलीफा घोषित किया था। 23 हजार इराकी सैनिकों ने शहादत देकर बीते साल 10 जुलाई को मोसुल को आईएस के चंगुल से आजाद कराया। अब यहां के लोग कहते हैं कि इस संघर्ष ने हमें आजादी के मायने बता दिए हैं। हम खुद को दुनिया का सबसे खुशहाल इंसान समझते हैं। इस बदलाव पर भास्कर के लिए मोसुल से प्रो. अहमद वादल्लाह और यूनीसेफ के मिडिल ईस्ट रीजनल हेड गीर्ट केपलर की खास रिपोर्ट...


बच्चों को गोलियों से गिनती सिखाई जाती थी

- मोसुल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अहमद वादल्लाह कहते हैं- आतंकियों ने स्कूलों और कॉलेजों तक को आग के हवाले कर दिया था। आईएस के स्कूलों में बच्चों को बुलेट से गिनती सिखाई जाती थी। उन्हें आतंकी बनाया जाता था। लिहाजा, ज्यादातर लोगों ने बच्चों को घरों से निकलने तक नहीं दिया। इस दौरान हवाई हमलों और गोला-बारूद ने ना सिर्फ बच्चों बल्कि हर किसी को ट्रॉमा में पहुंचा दिया।

बच्चों की मुस्कान लौटाने के लिए कैंपेन

- अब आजादी के बाद जर्जर इमारतों में स्कूल खुल गए हैं। स्कूलों में बच्चों को त्रासदी से बाहर निकालने के लिए 'रिडिस्कवरिंग हाउ टू स्माइल' (बच्चों की मुस्कान कैसे वापस लाई जाए) कैंपेन चलाया जा रहा है। यह काम टीचर्स के लिए इसलिए भी मुश्किल हैं, क्योंकि वो खुद भी इसी ट्रॉमा से गुजरे हैं। इसलिए हम लोग शिक्षकों को भी ट्रेनिंग दे रहे हैं। और ट्रेनिंग पाने वाले शिक्षक अपने साथियों से अनुभ‌व शेयर करते हैं।

टीचर्स के लिए प्रॉब्लम ट्री

- वादल्लाह के मुताबिक- हम शिक्षकों को ट्रामा से बाहर निकालने के लिए बोर्ड पर एक 'प्रॉब्लम ट्री' बनाते हैं, जिसकी जड़ें दुखों में है। ये जड़ें रिश्तेदारों की हत्या, सिर कलम होना, बर्बादी और गरीबी को दिखाती हैं। इस पेड़ की शीर्ष शाखाओं में उम्मीद और आशाएं हैं, जो मिलकर खुशियां बिखेरती हैं। हमको साथ रहना और हिंसा को मिटाना सीखना चाहिए और इसे आगे भी बढ़ाना चाहिए। उम्मीद है कि ऐसे प्रोग्राम से हमें कामयाबी मिलेगी।

किताबें जुटाने की चुनौती

- वादल्लाह आगे कहते हैं- जब मैं स्कूल में बच्चों को पढ़ाने जाता हूं तो देखता हूं कि उनमें कुछ बनने की ललक है। आईएस ने स्कूल और लाइब्रेरी जला दी थी। ऐसे में लोग किताबें डोनेट कर रहे हैं। मोसुल यूनिवर्सिटी ने 1 लाख से ज्यादा किताबें जुटाई हैं। बड़ी तादाद में ऐसे यंग लोग सामने आए हैं, जो टूटे-फूटे स्कूल-कॉलेज की मरम्मत कर रहे हैं। बच्चों को पढ़ा रहे हैं।

क्या कहते हैं लोग?

- 28 साल के युवा टीचर और फोटोग्राफर वाय अल-बारूदी कहते हैं कि अब हम लोग हर नई चीज की शुरुआत जश्न से ही करते हैं, क्योंंकि बीते तीन साल में खुशी ही हमसे महरूम (दूर) थी। अब मोसुल ने रफ्तार पकड़ ली है। मोसुल को इराक से जोड़ने वाले 6 ब्रिज खत्म हो गए थे। हमारे इंजीनियरों ने इनमें से पांच ब्रिज कुछ ही महीने में शुरू कर दिए। नए कंस्ट्रक्शन में स्कूल-कॉलेज, बाजार और अस्पतालों को प्राथमिकता दी जा रही है।

महिलाओं की आजादी अहम

- बारूदी कहते हैं- टूटी इमारतों में ही बाजार लगने लगे हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब देर रात तक बाजारों में महिलाएं दिखाई दे रही हैं। आईएस इन्हीं पर सबसे ज्यादा अत्याचार करता था। उन्हें पूरा शरीर ढक कर रखना पड़ता था। आंख के अलावा शरीर का दूसरा हिस्सा दिखने पर सजा दी जाती थी। अब उन्हें मर्जी के कपड़े पहनने की आजादी है। खुले बाजारों में स्कर्ट तक बिक रही है। यहां 'सेफ स्पेसेज' खोले जा रहे हैं, जहां महिलाएं एक साथ आकर बात करती हैं, एक्टिविटीज में हिस्सा लेती हैं। तो यकीन मानिए यह समाज भी बेहतरी की ओर बढ़ चुका है।

यहां लोगों में जिद है- जिंदगी संवारने की

- यूनिसेफ के मिडिल ईस्ट के रीजनल डायरेक्टर गीर्ट केपलर गीर्ट केपलर कहते हैं- इराक में जिंदगी को पटरी पर लाने के लिए यूनिसेफ अब तक का सबसे बड़ा ऑपरेशन चला रहा है। मकसद है कि हर व्यक्ति तक मदद पहुंचे। हर बच्चे को वापस स्कूल में पहुंचाया जाए। यूनिसेफ ने यहां 576 स्कूल दोबारा शुरू कराए हैं। 17 लाख बच्चों को स्कूलों में पहुंचाया है।
- केपलर के मुताबिक- निनेवा प्रांत और उसके आसपास के इलाकों में इस संघर्ष से 40 लाख बच्चे प्रभावित हुए हैं। ये मेंटली और फिजिकल दोनों तरह के ट्रॉमा से गुजर रहे हैं। इराक में इंसानियत को यकीनन धक्का लगा, लेकिन आज यहां के हर व्यक्ति के दिल में एक जिद है- जिंदगी को वापस संवारने की। बच्चों की आंख में सपने दिखते हैं। ये अद्भुत अनुभव है। सबसे ज्यादा अच्छा तो तब लगता है जब कुछ बच्चे ये कहते हैं कि वो बड़े होकर टीचर बनना चाहते हैं।

हाल ही में एक खंडहर इमारत में रेस्त्रां खोला गया है। इनसेट में इसी रेस्त्रां में डिनर करती हुई महिलाएं और बच्चे। हाल ही में एक खंडहर इमारत में रेस्त्रां खोला गया है। इनसेट में इसी रेस्त्रां में डिनर करती हुई महिलाएं और बच्चे।
कुछ खंडहर हो चुकी इमारतों की मरम्मत भले ही ना हुई हो लेकिन इनमें बाजार लगने लगे हैं। कुछ खंडहर हो चुकी इमारतों की मरम्मत भले ही ना हुई हो लेकिन इनमें बाजार लगने लगे हैं।
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मोसुल की गलियों में मकानों पर गोलियों के निशान जरूर नजर आते हैं लेकिन बच्चों को अब आतंक से आजादी मिल चुकी है।मोसुल की गलियों में मकानों पर गोलियों के निशान जरूर नजर आते हैं लेकिन बच्चों को अब आतंक से आजादी मिल चुकी है।
हाल ही में एक खंडहर इमारत में रेस्त्रां खोला गया है। इनसेट में इसी रेस्त्रां में डिनर करती हुई महिलाएं और बच्चे।हाल ही में एक खंडहर इमारत में रेस्त्रां खोला गया है। इनसेट में इसी रेस्त्रां में डिनर करती हुई महिलाएं और बच्चे।
कुछ खंडहर हो चुकी इमारतों की मरम्मत भले ही ना हुई हो लेकिन इनमें बाजार लगने लगे हैं।कुछ खंडहर हो चुकी इमारतों की मरम्मत भले ही ना हुई हो लेकिन इनमें बाजार लगने लगे हैं।
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