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‘पाकिस्तानी खून वाला एक भी बच्चा न हो देश का हिस्सा’,करा डाले हजारों अबॉर्शन

बांग्लादेश के लिए जंग के बाद फोर्स प्रेग्नेंसी और इससे होने वाले बच्चे का मुद्दा एक बड़ी समस्या के तौर पर उभरा।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Dec 16, 2017, 04:32 PM IST

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    बांग्लादेश के रिफ्यूजी कैम्प में प्रेग्नेंट लड़की। 1971 वॉर की ये तस्वीर फोटोग्राफर रघु राय ने खींची थी।

    इंटरनेशनल डेस्क.बांग्लादेश आज अपना विक्टरी डे मना रहा है। हालांकि, इस दिन जश्न के साथ ही कई दर्दनाक यादें भी जुड़ी हुई हैं। इन्हीं में से एक हैं 'वॉर बेबीज'। लिबरेशन वॉर के दौरान लाखों बांग्लादेशी महिलाएं पाकिस्तानी सेना के हाथों रेप का शिकार हुईं। इनसे पैदा होने वाले बच्चों को वॉर बेबीज का नाम दिया गया, जिन्हें अपने देश में जगह तक नहीं मिली। देश के तत्कालीन पीएम ने साफ कर दिया था कि पाकिस्तानी खून वाला कोई भी बच्चा देश में नहीं रहेगा। इसके लिए कैम्प लगाकर हजारों महिलाओं के अबॉर्शन तक कराए गए थे। वहीं, जो बच्चे पैदा हो चुके थे, उन्हें अडॉप्शन एजेंसियों के जरिए देश से बाहर भेजा गया। पाक प्रेसिडेंट ने सेना को दिया था ये ऑर्डर...

    - 1971 में पूर्वी पाकिस्तान से ये जंग एक विद्रोह के तौर पर शुरू हुई, जिसने नौ महीने बांग्लादेश लिबरेशन वॉर का रूप ले लिया।
    - ऑफिशियल आंकड़ों के मुताबिक, इस जंग में करीब 30 लाख लोग मारे गए थे। मास किलिंग के साथ-साथ 2 लाख से ज्यादा बांग्लादेशी महिलाओं का रेप किया गया।
    - महिलाओं को ऐसे निशाना बनाया जाना पाकिस्तान आर्मी की स्ट्रैटजी का हिस्सा भी था। ये बात वहां के तत्कालीन प्रेसिडेंट के बयान से भी साफ होती है।

    - इसे पाकिस्तान के तत्कालीन प्रेसिडेंट याहया खान के उस स्टेटमेंट से जोड़ा जाता है, जिसे डॉन ने 22 मार्च 2002 के आर्किटल में छापा था।
    - डॉन के आर्टिकल के मुताबिक, उन्होंने 1971 में सेना को पूर्वी पाकिस्तान में छिड़े विद्रोह के दमन का आदेश दिया और उर्दू में कहा कि 'पहले इनको मुसलमान करो'।
    - इस जंग के शुरू से लेकर अंत तक कवर करने वाली एक्टिविस्ट स्कॉलर सल्मा सोभन ने कहा कि याहया के इस स्टेटमेंट ने सेना को सबकुछ करने की आजादी दे दी।
    - पाकिस्तानी सैनिकों और उनके साथियों ने महिलाओं का सड़क से लेकर घर में घुसकर उनका रेप किया। इतना ही नहीं, इन्हें रेप कैम्पों में ले जाकर शिकार बनाया गया।
    - पीड़ितों के नाम और संख्या को लेकर जंग के दौरान लिस्ट तैयार हुई, लेकिन जंग खत्म होने के बाग 1972 में देश की सरकार ने इसका नामोनिशान मिटा दिया।
    - महिलाओं की इज्जत और लाखों लोगों की जान की कीमत पर बांग्लादेश को अलग देश का दर्जा तो मिला, लेकिन परेशानियां यहीं खत्म नहीं हुईं।
    - पाकिस्तान ने वॉर क्राइम की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया। 9 महीने की जंग में हुए नरसंहार और महिलाओं के रेप के आरोप से मना कर दिया।

    'वॉर बेबीज नहीं होंगे देश का हिस्सा'

    बांग्लादेश के लिए जंग के बाद फोर्स प्रेग्नेंसी और इससे होने वाले बच्चे का मुद्दा एक बड़ी समस्या के तौर पर उभरा। वॉर बेबीज की समस्या से निपटने को लेकर उस वक्त जबरदस्त कन्फ्यूजन की स्थिति थी। उस दौर की एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता और फेमिनिस्ट ऑथर नीलिमा इब्राहिम ने अपनी किताब 'अमी बिरानगोना बोलची' में बांग्लादेश के तत्कालीन पीएम शेख मुजीबुर्रहमान से अपनी मुलाकात का जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि तब मुजीबुर्रहमान ने पीड़ित महिलाओं को 'डॉटर्स' का नाम दिया। इन्हें देश से इन्हें अपनी कम्युनिटी और फैमिली में शामिल करने के लिए कहा गया। इसके साथ ही उन्होंने ये भी साफ कर दिया कि पाकिस्तानी खून वाला एक भी बच्चा उनके देश का हिस्सा नहीं बनेगा।

    शुरु हुआ अबॉर्शन-अडॉप्शन का सिलसिला

    - देश लीडर्स ने सोशल वर्कर और मेडिकल प्रैक्टिशनर्स को रेप का शिकार हुई महिलाओं से प्राथमिक तौर पर निपटने की जिम्मेदारी दी।
    - इंटरनेशनल प्लान्ड पेरेन्टहुड, रेड क्रॉस और कैथोलिक चर्च इस रिहैब्लिटेशन प्रोग्राम का हिस्सा बने। इस प्रोग्राम के तहत प्रेग्नेंट महिलाओं के अबॉर्शन कराए गए और पैदा हो चुके बच्चों के अडॉप्शन कराए गए।
    - बड़े स्तर पर होने वाले अबॉर्शन के लिए ढाका समेत 17 जगहों पर क्लीनिक सेटअप की गई। ऑस्ट्रेलिया के आए मेडिकल ग्रेजुएल जेफरी डेविस ने इंटरनेशनल प्लान्ड पेरेन्टहुड के साथ मिलकर इस पर काम भी किया।
    - डेविस ने बताया था कि उनका अबॉर्शन प्रोग्राम शुरू होने से पहले ही 5000 महिलाएं लोकल लेवल पर अबॉर्शन करा चुकी थी। वहीं, बाद हजारों की संख्या में महिलाएं अबॉर्शन किए गए।
    - मदर टेरेसा की संस्था मिशनरीज ऑफ चैरिटी के अलावा कनाडा, अमेरिका और स्विटजरलैंड की संस्थाओं ने वॉर बेबीज के अबॉप्शन का जिम्मा संभाला था।

    महिलाओं और मौलवियों का विरोध
    - एक्टिविस्ट नीलिमा इब्राहिम ने बताया, कई महिलाओं और लड़कियों ने बच्चे देने से इनकार कर दिया, लेकिन उनके सोते वक्त चोरी से बच्चों को उनसे दूर कर दिया गया।
    - नीलिमा के मुताबिक, मौलवियों ने पहले बच्चों को देश से बाहर भेजने का विरोध किया, क्योंकि वो ईसाई देशों में जा रहे थे, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ।

    आगे की स्लाइड्स में देखें इस वॉर से जुड़ी कुछ फोटोज...

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    युद्ध के बाद आसरे के लिए भटकता परिवार।
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    अपने बेटे के साथ बांग्लादेशी रिफ्यूजी महिला।
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    जंग के दौरान सड़क पर पड़ी लाश देखती बच्ची।
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    जंग के दौरान सड़कों पर इस तरह शव बिखरे पड़े रहते थे।
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    मदर टेरेसा की मिशनरीज ऑफ चैरिटी संस्था द्वारा गोद लिए गए वॉर बेबीज।
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Web Title: Bangladesh Tragedy Of War Babies Abortion And Adoption
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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