--Advertisement--

आजादी के बाद भी इतने साल अंग्रेजों का गुलाम रहा भारत, ये थी वजह

भारत आजादी के बाद भी किंग जॉर्ज VI (छठें) के आधीन संवैधानिक राजतंत्र था, जिसके गर्वनर जनरल माउंटबेटेन थे।

Danik Bhaskar | Jan 26, 2018, 02:46 PM IST
जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी। जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी।

इंटरनेशनल डेस्क. भारत को 15 अगस्त 1947 को आजादी तो मिल गई थी, लेकिन इसे रिपब्लिक घोषित करने के लिए 26 जनवरी 1950 तक का इंतजार करना पड़ा था। देश का संविधान आजादी के करीब ढाई साल बाद लागू हो पाया था। इसे लेकर लोगों के दिमाग में कई तरह के सवाल भी उठते हैं कि अगर हमने भारत से 1947 में ही ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंका था, तो हमें आखिर गणतंत्र होने में इतना वक्त क्यों लग गया। देश आजादी के बाद भी ब्रिटिश हुकूमत के अधीन क्यों रहा। ये है वजह...

आजादी के बाद भी देश था अधीन
- 1947 में भारत एक आजाद देश बन चुका था। हालांकि, यहां ये समझना जरूरी है कि देश को पूरी तरह से आजादी नहीं मिली थी। भारत अब भी किंग जॉर्ज VI (छठें) के आधीन संवैधानिक राजतंत्र था, जिसके गर्वनर जनरल माउंटबेटेन थे। देश में कोई लोकतंत्र या संविधान नहीं था। भारत की जनता ऐसी आजादी को नकार रही थी और अपना लीडर चाहती थी, जो देश चला सके। इसके लिए अपने संविधान की जरूरत थी। लिहाजा, देश के संविधान बनाने के लिए एक ड्राफ्टिंग कमेटी बनाई गई, जिसका चेयरमैन डॉ. बाबा साहब अंबेडकर को बनाया गया और संविधान के ड्राफ्टिंग की शुरुआत हुई।

आगे की स्लाइड्स में जानें कब तैयार हुआ संविधान और क्यों 26 जनवरी को ही गणतंत्र घोषित हुआ देश...

पहले राष्ट्रपति राजेंद्र को संविधान का आखिरी ड्राफ्ट सौंपते बी.आर अंबेडकर। पहले राष्ट्रपति राजेंद्र को संविधान का आखिरी ड्राफ्ट सौंपते बी.आर अंबेडकर।

कब तैयार हुआ देश का संविधान ?
ड्राफ्टिंग कमेटी ने तेजी से अपना काम पूरा किया और 26 नवंबर 1949 को इसके आखिरी वर्जन को कॉन्स्टिटुएंट असेम्बली से मंजूरी भी मिल गई, लेकिन अब इसे लागू करने की जरूरत थी। इसे देश में लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 की तारीख चुनी गई। इसी तारीख को इसलिए चुना गया, क्योंकि 1930 में ही इंडियन नेशनल कांग्रेस ने पहली बार देश के लिए पूर्ण स्वराज का एलान किया था। 

जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी की 1946 की फोटो। जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी की 1946 की फोटो।

पूर्ण आजादी के पक्ष में नहीं थे लीडर्स
आजादी के संघर्ष शुरू होने के वक्त से देश की ज्यादातर पॉलिटिकल पार्टी पूर्ण आजादी के पक्ष में नहीं थीं। पार्टियां देश को स्वतंत्र उपनिवेश के तौर पर दर्जा दिलाने के पक्ष में आवाज उठा रही थीं। इसके तहत यूनाइटेड किंगडम का राजा ही भारत का भी संवैधानिक मुखिया होता और भारतीय संविधान के मामलों में ब्रिटिश संसद ही पॉलिटिकल पावर को संरक्षित करती। यहां तक की इंडियन नेशनल कांग्रेस और महात्मा गांधी तक का ये मानना था कि भारत के लिए संवैधानिक राजतंत्र का दर्जा सही कदम होगा। 1927 में जब जनता ने लीडर से देश की संपूर्ण आजादी के लिए आवाज उठाने को कहा, तो इसे इसलिए ठुकरा दिया गया क्योंकि महात्मा गांधी भी इसके विरोध में थे। 

1929 में इंडियन नेशनल कांग्रेस के लाहौर सेशन के दौरान हुई पूर्ण स्वराज के एलान के बाद माहौल। 1929 में इंडियन नेशनल कांग्रेस के लाहौर सेशन के दौरान हुई पूर्ण स्वराज के एलान के बाद माहौल।

इसलिए अहम है 26 जनवरी की तारीख
हालांकि, 28 दिसंबर 1928 में जब इंडियन नेशनल कांग्रेस ने जब ब्रिटिश सरकार से भारत के लिए संवैधानिक राजतंत्र के स्टेटस की मांग की, तो उन्होंने इस पेशकश को ठुकरा दिया। इसके चलते कांग्रेस गुस्से से भर गई और 1929 में हुए कांग्रेस के लाहौर सेशन में भी इसकी झलक दिखाई दी। इसी का नतीजा हुआ कि कांग्रेस ने आखिरकार पूर्ण स्वराज के लिए वोट कर दिया। कांग्रेस की वर्किंग कमेंटी के लिए जवाहरलाल नेहरू को प्रेसिडेंट चुना गया और बाकी महान नेताओं जैसे- चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और सरदार बल्लभभाई पटेल को वर्किंग कमेटी में शामिल किया गया। कांग्रेस की वर्किंग कमेटी ने 26 जनवरी 1930 में पूर्ण आजादी के एलान को मंजूरी दी। नेहरू ने लाहौर में रवी के तट पर तिरंगा फहराया। इस 1930 में इस पहले इन्डिपेन्डेंस डे को सेलिब्रेट करने के लिए 170 लोग मौजूद थे। यही वजह है कि करीब दो दशक बाद 26 जनवरी 1950 को रिपब्लिक डे के तौर पर चुना गया।