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सऊदी में नर्क से कम नहीं थी महिलाओं की LIFE, ऐसी हैं वजहें

कानून के तहत एक महिला के तौर पर प्रॉपर्टी खरीदने या बेचने के लिए ये जरूरी है कि उनके पास दो पुरुष गवाह हों।

Danik Bhaskar | Mar 01, 2018, 02:13 PM IST

इंटरनेशनल डेस्क. सऊदी अरब ने महिलाओं को पुरुषों की बराबरी में लाने के लिए एक और कदम उठाया है। यहां के शाही शासन ने महिलाओं को अब सेना में शामिल होने की इजाजत दे दी है। सऊदी में महिलाओं के लिए पिछले छह महीनों में बहुत कुछ बदल गया है। पर इनके लिए पहले जिंदगी इतनी आसान नहीं थी। महिलाओं को हिजाब, अबाया और बुर्के में तो रहना ही पड़ता है। इसके बावजूद उनके अकेले घर से निकलने, नौकरी करने, ड्राइविंग करने और स्टेडियम में जाने पर भी पाबंदियां थीं।

प्रॉपर्टी खरीदने के लिए भी चाहिए पुरुष गवाह
सऊदी में महिलाएं अब भी अकेले प्रॉपर्टी नहीं खरीद सकतीं। रियल स्टेट इन्वेस्टर लॉलवा अल सैदान ने शिकायत की थी कि एक महिला के तौर पर प्रॉपर्टी खरीदने या बेचने के लिए ये जरूरी है कि उनके पास दो पुरुष गवाह हों। पुरुष गवाह के बिना महिलाओं की पहचान की पुष्टि नहीं हो सकती। इसके साथ ही उन दो पुरुषों की विश्वसनीयता की पुष्टि करने के लिए चार और पुरुष गवाहों की जरूरत होती है।

आगे की स्लाइड्स में जानें बाकी कैसे पाबंदियों का सामना कर रहीं महिलाएं...

रेप के बेतुके कानून के चलते खुद महिलाएं हैं शिकार
सऊदी में सख्त कानून और सजा के डर के बावजूद रेप की संख्या सबसे ज्यादा है। इसके लिए रेप के कानून को जिम्मेदार माना जाता है। हालांकि, सऊदी में शरीया कानून में रेप के लिए सजा का प्रावधान है, लेकिन यहां पत्नी के साथ जबरन संबंध बनाने को रेप नहीं माना जाता है। वहीं, रेप के लिए किसी आरोपी को तब तक सजा नहीं दी जा सकती, जब तक उसके चार चश्मदीद न हों।

विदेशी महिला वर्कर्स के लिए देश में कोई कानून नहीं है। इसलिए उनके साथ सबसे ज्यादा ज्यादती की जाती है। इसके अलावा रेप की पुलिस में रिपोर्ट करना भी प्रतिबंधित है। महिला के पराए मर्द के साथ रिश्ते रखने पर मर्द को कुछ नहीं कहा जाता है। महिला को इसके लिए सजा का सामना करना पड़ सकता है।

महिलाओं की ड्राइविंग पर भी थी पाबंदी
सऊदी अरब में महिलाओं की ड्राइविंग बैन करने के लिए कोई ऑफिशियल लॉ नहीं था, लेकिन ये किंगडम के मूल्यों और आदर्शों के खिलाफ है। 1990 से लगातार इस पाबंदी के खिलाफ बड़े स्तर पर यहां प्रदर्शन हुए, जिसके बाद पिछले साल ये पाबंदी हटाई गई। महिलाओं को अब बस इतना अधिकार मिल गया। अब वो अपनी जरूर के हिसाब से कभी भी ड्राइविंग कर सकती हैं। 

स्टेडियम में घुसने की नहीं थी परमिशन
सऊदी के स्टेडियम में चाहे फुटबॉल का मैच हो या फिर कल्चरल कॉन्सर्ट। महिलाओं को स्टेडियम के अंदर दाखिल होने की भी परमिशन नहीं थी। बीते साल सितंबर में देश के फाउंडेशन डे पर महिलाओं को स्टेडियम में हो रहे कॉन्सर्ट में एंट्री मिली। इसके बाद स्टेडियम में मैच देखने के लिए भी उन्हें आजाद कर दिया गया

 

स्पोर्ट्स में आजादी से नहीं ले सकतीं हिस्सा
सऊदी में महिलाओं के खेलकूद में हिस्सा लेना संभव नहीं था। 2012 के ओलिंपिक गेम्स में पहली बार सऊदी अरब की महिला खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था। पर इसे भी धार्मिक भावनाओं के खिलाफ मानते हुए देश में बहुत विरोध हुआ था। फीमेल एथलीट्स ओलिंपिक में पूरे शरीर को ढके कपड़ों और हिजाब में दौड़ती नजर आई थीं।

महिलाओं के अकेले सफर पर पाबंदी
सऊदी में महिलाएं बिना किसी पुरुष गार्जियन या उसकी परमिशन के सफर नहीं कर सकती हैं। रियाद में रहने वाली 45 साल की फातिमा तब तक प्लेन में नहीं बैठ सकतीं, जब तक उसके पास अपने बेटे द्वारा लिखित अनुमति नहीं होगी। यहां कानूनी रूप से बालिग होने के बावजूद महिलाओं का कोई अस्तित्व नहीं है।

 

सऊदी में हर महिला का पुरुष गार्जियन होना जरूरी है। इसमें उसके पिता से लेकर अंकल, भाई, बेटे होते हैं। मॉरीन के मुताबिक, यहां अकेले सफर करते वक्त गैंगरेप का शिकार हुई एक महिला को यहां शरीया कोर्ट ने आरोपियों से ज्यादा कोड़े मारने की सजा सुनाई थी। क्योंकि उसने मान लिया था कि जब उस पर हमला हुआ तो वो बिना किसी मेल गार्जियन के थी।

 

पढ़ाई में पुरुषों से आगे, लेकिन नौकरी में पीछे
सऊदी में सरकार महिलाओं की शिक्षा के लिए काफी पैसे खर्च करती है, लेकिन नौकरी में उनकी संख्या बहुत कम है। यहां पर महिलाओं का लिटरेसी रेट 81 फीसदी है, जो 1970 में सिर्फ 2 फीसदी था। पूरी आबादी में से 60 फीसदी महिलाओं के पास यूनिवर्सिटी गैजुएट की डिग्री है। हालांकि, नौकरी में महिलाओं की संख्या 1990 से 2011 तक सिर्फ 15.3 फीसदी से बढ़कर 18.6 फीसदी ही पहुंची है