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80 रेस्टोरेंट की चेन चलाने वाला ये शख्स कभी लगाया करता था झाड़ू-पोंछा

कभी रेस्टोरेंट में झाड़ु-पोंछा करने वाले पी रामगोपाल ने सोचा भी नहीं था कि वो अपना रेस्टोरेंट खोलेंगे।

Dainik Bhaskar

Feb 14, 2018, 01:20 PM IST
He Started A General Provisions Store In K K Nagar

कभी रेस्टोरेंट में झाड़ु-पोंछा करने वाले पी रामगोपाल ने सोचा भी नहीं था कि वो अपना रेस्टोरेंट खोलेंगे। लेकिन आज इनकी सरवणा भवन की देश भर में तकरीबन 33 और विदेशों में 47 शाखाएं चल रही हैं। इनके रेस्टोरेंट यानी सरवणा भवन की सफलता का राज केवल अपने कस्टमर्स तक शुद्धा खाना पहुंचाना ही नहीं, बल्कि अपने कर्मचारियों का घर की तरह ख्याल रखना भी है। रामगोपाल मानते हैं कि आपके कर्मचारी खुश रहेंगे तभी रेस्टोरेंट तरक्की करेगा। एक वाकये के चलते इन्होंने लिया था ये फैसला...


- दरअसल, एक बार किसी ने पी रामगोपाल से कहा कि वो चेन्नई के टी नगर इलाके में सिर्फ इसलिए जा रहे है क्योंकि के के नगर में कोई रेस्टोरेंट ही नहीं है। इसी जगह पर पी रामगोपाल भी रहते थे और ये बात उनके दिल पर लग गई। उसी दिन इन्होंने फैसला लिया कि वो रेस्टोरेंट खोलेंगे ताकि लोगों को रेस्टोरेंट की तलाश में कहीं ओर भटकना ना पड़े।


- सरवणा भवन की नींव रखने से पहले पी राजगोपाल ने सोच रखा कि वो उन्हें पैसा नहीं कमाना है, बल्कि ग्राहकों का भरोसा जीतना है और परिणाम सामने हैं। आपको बताते चलें कि एक समय पी राजगोपाल के जीवन में ऐसा भी था वो मुश्किल से अपना गुजारा कर पाते थे।


- तमिलनाडु के एक छोटे-से गांव पुन्नईयादी में जन्मे पी राजगोपाल के पिताजी ने उन्हें आर्थिक तंगी के बावजूद स्कूल में दाखिला करवाया। हालांकि, सातवीं के बाद वो आगे नहीं पढ़ पाए और उन्हें एक रेस्टोरेंट में साफ-सफाई और बर्तन धोने का काम करना पड़ा।

- यहां काम करते-करते इन्होंने खाना बनाना भी सीख लिया। इसके बाद इन्हें एक किराना स्टोर पर साफ-सफाई करने वाले सहायक की नौकरी मिली, जिसके बाद इन्होंने अपने पिता और कुछ रिश्तेदारों की मदद से एक किराने की दुकान भी खोल ली। इस बीच भी उतार-चढ़ाव आए लेकिन इन्होंने हिम्मत से काम लिया।


- साल 1979 में ही वो वाकया हुआ जब पी राजगोपाल ने अपना रेस्टोरेंट खोलने की ठानी। और दो साल के अंदर ही इन्होंने सरगणा भवन की शुरुआत की। हालांकि, इस दौरान भी चुनौतियां कम नहीं थी क्योंकि ये वो समय था जब लोग बाहर जाकर खाना नहीं खाते थे।


- इन्होंने अपने रेस्टोरेंट के लिए कुछ नियम बनाए, जिसमें ग्राहकों के भरोसे को सबसे ऊपर रखा। साथ ही साफ-सफाई और शुद्धा खाने का भी नियम बनाया और उसका कड़ाई से पालन भी किया। इन सबके चलते सरवणा भवन को नुकसान भी उठाना पड़ा लेकिन धीरे-धीरे इनकी ख्याति बनने लगी और वो घाटा जल्द ही मुनाफे में बदल गया।

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