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भास्कर विशेष: निपाह की खोज करने वाले साइंटिस्ट ने कहा- चमगादड़ों ने केरल में ताड़ी के जरिए फैलाया वायरस

केरल में निपाह वायरस की वजह से एक हफ्ते में 10 लोगों की मौत हुई है। 17 लोग इससे संक्रमित हैं।

कमलेश माहेश्वरी / अंकित गुप्ता | Last Modified - May 28, 2018, 04:46 PM IST

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    फ्रूट बैट या फलभक्षी चमगादड़ निपाह वाइरस के प्रथम वाहक माने जाते हैं और इन्हीं से वाइरस मनुष्यों में फैलता है।

    • चमगादड़ पेड़ों से टपकती ताड़ी की ओर ज्यादा आकर्षित होता है
    • ताजा ताड़ी जब पेड़ से बर्तन में निकल रही होती है, उस समय चमगादड़ उसे संक्रमित करता है

    नई दिल्ली/तिरुअनंतपुरम. केरल में निपाह वायरस की वजह से एक हफ्ते में 10 लोगों की मौत हुई है। 19 लोग इससे गंभीर रूप से संक्रमित बताए गए हैं। कहा जा रहा है कि केरल में ये वायरस पानी के कुएं, चमगादड़ के खाए फलों और ताड़ी से फैला है। यह वायरस केरल कैसे पहुंचा? अब तक इसका कोई वैक्सीन क्यों नहीं बन पाया? यह दिसंबर और मई में ही क्यों सक्रिय होता है? ऐसे कई सवालों के जवाब जानने के लिए ‘भास्कर’ ने मलेशिया के प्रोफेसर चुआ कॉ बिंग (सिंगापुर में कार्यरत) और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्टीफन लुबी से संपर्क किया। प्रोफेसर बिंग ने 1999 में सबसे पहले इस वायरस को मलेशिया में खोजा था। प्रोफेसर लुबी वे साइंटिस्ट हैं जिन्होंने बांग्लादेश में इसकी खोज की थी। वे पिछले 10 साल से इस पर रिसर्च कर रहे हैं। पेश है स्टैनफोर्ड सेंटर फॉर इनोवेशन इन ग्लोबल हेल्थ में रिसर्च डायरेक्टर प्रोफेसर लुबी से बातचीत के कुछ अंश....

    निपाह वायरस केरल में ही क्यों सामने आया?
    प्रोफेसर लुबी
    : निपाह दक्षिण एशिया में पाए जाने वाले एक बड़े आकार के चमगादड़ के कारण फैलता है। इसे इंडियन फ्रूट बैट यानी फलभक्षी चमगादड़ भी कहा जाता है। भारत के दक्षिणी राज्यों खासतौर पर केरल में ये चमगादड़ बहुतायत में हैं जो श्रीलंका तक फैले हैं। केरल से मिली सूचनाओं से पता चलता है कि वहां इस वायरस के वाहक चमगादड़ हैं। इस पर अभी और रिसर्च की जानी है।

    इस वायरस के वाहक चमगादड़ की मौत क्यों नहीं होती?
    प्रोफेसर लुबी
    : रात को निकलने वाले इस फलभक्षी चमगादड़ के शरीर में एक विशेष प्रकार की एंटीबॉडीज पाई जाती हैं। इसी कारण से निपाह वायरस चमगादड़ को प्रभावित नहीं कर पाता। यह वायरस चमगादड़ के शरीर में सुप्त अवस्था में पड़ा रहता है, जिसे शेडिंग कहते हैं। जब चमगादड़ कोई फल खाता है या ताड़ी जैसा कोई पेय पीता है तो वायरस चमगादड़ से उन चीजों में प्रसारित हो जाता है। ये वायरस चमगादड़ के मल-मूत्र द्वारा भी दूसरे जीवों और खासतौर पर स्तनाधारियों को संक्रमित कर सकता है। संक्रमित होने पर अजीब तरह का बुखार आता है जो सही समय पर इलाज न मिलने से जानलेवा बन जाता है।

    कहा जा रहा है कि केरल में यह वायरस फलों के कारण फैला, ऐसे कौन से फल हैं जिन्हें खाने से खतरा है?
    प्रोफेसर लुबी
    : फल ज्यादातर लोगों के खानपान का हिस्सा हैं। इसलिए आसानी से संक्रमण फैलता है। लेकिन जरूरी नहीं कि हर बार इंफेक्शन का कारण फल ही हो। बांग्लादेश में जब इस वायरस का संक्रमण फैला तो इसकी वजह कच्ची ताड़ी पीना सामने आया था। मुझे लगता है कि केरल में फल से ज्यादा ताड़ी इसका प्रमुख स्रोत है।

    कच्ची ताड़ी से इस वायरस का क्या कनेक्शन है?
    प्रोफेसर लुबी
    : केरल में कुछ ऐसे लोग भी संक्रमित हुए थे जिन्होंने फर्मेंट की हुई ताड़ी पी थी। चमगादड़ मीठी चीजें जैसे ताड़ी की ओर ज्यादा आकर्षित होता है। चमगादड़ रात को निकलता है और उस समय ताड़ी अधिक पीता है जिस समय ताजी ताड़ी पेड़ से बर्तन में निकल रही होती है और इस दौरान वायरस चमगादड़ के शरीर से ताड़ी में प्रसारित हो जाता है।

    इस वायरस से होने वाले बुखार का वैक्सीन अब तक क्यों नहीं तैयार किया जा सका है?
    प्रोफेसर लुबी
    : वैक्सीन तैयार करने के लिए काफी पैसों की जरूरत होती है। निपाह वायरस के संक्रमण के मामले बड़े तौर पर तीन देशों- मलेशिया, भारत और बांग्लादेश में देखने में आए हैं। संभवत: यही वजह है कि सीमित इलाके में कम संख्या में होने के कारण इसकी वैक्सीन तैयार करने के लिए बड़ा बजट नहीं है। हालांकि, इसकी वैक्सीन को बनाने के लिए हाल ही में घोषणा की गई है। इसके लिए कोएिलशन फॉर इपिडेमिक प्रिपेयर्डनेस इनोवेशंस (सीईपीआई) नाम का संगठन फंड जुटाने का काम कर रहा है।

    निपाह सबसे ज्यादा दिसंबर और मई के महीने में क्यों प्रभावित करता है?
    प्रोफेसर लुबी
    : यह वायरस इन महीनों में इसलिए सबसे ज्यादा प्रभावित करता है क्योंकि इसी मौसम में ताड़ी सबसे ज्यादा बनती है। गर्मी और नमी के इस मौसम में चमगादड़ ताड़ी की गंध से आकर्षित होते हैं और इसे पीते हैं और जब ये जूठी ताड़ी कोई व्यक्ति पीता है तो वह भी संक्रमित हो जाता है।

    आपने निपाह वायरस में अब तक किस तरह के बदलाव देखे?
    प्रोफेसर लुबी
    : अब तक जो मामले सामने आए हैं उसके मुताबिक इस वायरस में कोई बदलाव नहीं देखा गया है। वायरस का जो स्ट्रेन मलेशिया में संक्रमण के दौरान देखे गए थे, वही बांग्लादेश में मामले सामने आने पर भी देखे गए थे। लेकिन मरीजों में इसकी गंभीरता को लेकर कई बदलाव देखने को मिले हैं। केरल में अभी इस दिशा में काम किया जाना बाकी है।

    इस संक्रमण से बचने के लिए किस तरह की सावधानी बरतनी चाहिए?
    प्रोफेसर लुबी
    : सबसे जरूरी बात है कि कच्ची और फर्मेंटेड दोनों तरह की ताड़ी पीने से बचें। ऐसे लोग जिन्हें संक्रमण है उनके दूर रहे। किसी भी कारण से अगर संक्रमित लोगों के संपर्क में आत हैं तो मेडिकेटेड साबुन से अच्छी तरह हाथ-पैर धोएं।

    अपडेट: केरल में नई थ्योरी में शक छोटे चमगादड़ों पर भी

    केरल में निपाह वायरस से सबसे पहले एक परिवार के तीन सदस्य संक्रमित हुए। जांच के बाद एक्सपर्ट का कहना है कि संक्रमण का कारण उनके आंगन में बना कुआं है जिसमें निपाह वायरस पाया गया है। इसके बाद साइंटिस्ट इस दिशा में काम कर रहे हैं कहीं ये वायरस छोटे आकार के चमगादड़ों में भी तो नहीं पाया जाता। बीजिंग की चाइनीज अकेडमी आफ साइंस के रिसर्च स्कॉलर श्रीहरि रमन के मुताबिक केरल में करीब 50 प्रजाति के चमगादड़ पाए जाते हैं जिनमें से 6 प्रजाति फलभक्षी है और तीन सामान्य प्रजातियां है। करीब 8 सेंटीमीटर के छोटे आकार के स्तनधारी चमगादड़ पूरे देश में पाए जाते हैं। अंधेरी जगहों, कुओं, गुफाओं और जंगलों में रहने वाले इन चमगादड़ों को वैम्पायर भी कहा जाता है जो मेगाडर्मा स्पाज्मा फैमिली से संबंधित है।

     क्या है निपाह वायरस

    डब्ल्यूएचओ के मुताबिक 1998 में मलेशिया में पहली बार निपाह वायरस का पता लगाया गया था। मलेशिया के सुंगई निपाह गांव के लोग सबसे पहले इस वायरस से संक्रमित हुए थे। इस गांव के नाम पर ही इसका नाम निपाह पड़ा। उस दौरान ऐसे किसान इससे सं​क्रमित हुए थे जो सुअर पालन करते थे। मलेशिया मामले की रिपोर्ट के मुताबिक पालतू जानवरों जैसे कुत्ते, बिल्ली, बकरी, घोड़े से भी इंफेक्शन फैलने के मामले सामने आए थे।

     ये लक्षण दिखें तो हो जाएं अलर्ट
    एक्सपर्ट के मुताबिक, निपाह वायरस हवा से नहीं बल्कि एक संक्रमित व्यक्ति से दूसरे में व्यक्ति में फैलता है। इससे इंफेक्शन होने के बाद कुछ खास लक्षण देखे जाते हैं। वायरल फीवर होने के साथ सिरदर्द, मिचली आना, सांस लेने में तकलीफ और चक्कर आने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं तो अलर्ट होने की जरूरत है। ये लक्षण लगातार 1—2 हफ्ते दिखाई दे सकते हैं। ऐसी स्थिति में सबसे पहले फिजिशियन से राय लें।

    बचाव के लिए एक्सपर्ट गाइड
    बांग्लादेश के ख्वाजा यूनुस अली मेडिकल कॉलेज जर्नल ने भी इस वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए एक गाइडलाइन जारी की है। इस जर्नल के अनुसार 5 बातों का ध्यान रखना जरूरी है

    • संक्रमित क्षेत्रों में सुअर, घोड़े और चमगादड़ जैसे जानवरों से दूर रहें।
    • संक्रमण का खतरा कम करने के लिए हाथों को मेडिकेटेड साबुन से धोएं।
    • पेड़ से टूटकर नीचे गिरे, खुरचें या चोंच लगे फलों को खाने से बचें।
    • साफ-सफाई के लिए सोडियम हायपोक्लोराइड केमिकल का इस्तेमाल करना बेहतर है।
    • बुखार या किसी भी प्रकार के वायरल संक्रमण के लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाएं।

    जांच के लिए टेस्ट हैं जरूरी

    जर्नल के अनुसार संक्रमण की पुष्टि के लिए कुछ टेस्ट कराए जाते हैं। इनमें सेरोलॉजी, हिस्टोपैथोलॉजी, पीसीआर एंड वायरस आइसोलेशन, सीरम न्यूट्रिलाइजेशन टेस्ट और एलाइज़ा टेस्ट शामिल हैं।

    भारत में वैक्सीन पर काम जारी
    जर्नल के अनुसार अब तक इस वायरस से बचने की कोई वैक्सीन नहीं तैयार की जा सकी है। लेकिन भारत, बांग्लादेश और थाइलैंड में वैक्सीन तैयार करने को लेकर लगातार काम किया जा रहा है।

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    यह बीमारी चमगादड़ से फलों में फिर इंसानों और जानवरों में फैलती है। 2004 में बांग्लादेश में खजूर की खेती करने वालों में भी यह बीमारी फैली थी
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    निपाह वाइरस और फ्रूट बैट के फैलने का WHO द्वारा दिया गया विश्वव्यापी नक्शा। नारंगी रंग में दिख रहा भारत और ऑस्ट्रेलिया में वाइरस के फैलने का खतरा सबसे ज्यादा है।
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