कॉटन नहीं, प्लास्टिक से बन रहे गारमेंट

कपड़ों के ढेर से
 फैशन पॉल्यूशन

 फैशन इंडस्ट्री से 10% कार्बन डाइऑक्साइड निकल रही है जो इंटरनेशनल फ्लाइट्स और
 शिप से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड
से कई गुना ज्यादा है।   

आजकल 80% कपड़े पॉलिएस्टर से बनते हैं
 जो प्लास्टिक होता है। यह 200 सालों तक डिकंपोज नहीं होता। जबकि कॉटन से बने
कपड़े 5 महीने में ही नष्ट हो जाते हैं। 

पॉलिएस्टर मजबूत फैब्रिक है जिससे एथनिक ड्रेसेज, फर जैकेट्स या सिल्की ड्रेसेज तक
बनाई जा सकती हैं। यह टिकाऊ होता है
इसलिए फैशन इंडस्ट्री इसे पसंद करती है।

पॉलिएस्टर से कपड़े बनाने पर 28,200 करोड़
टन कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है जो
कॉटन से कपड़े बनाने के मुकाबले तिगुनी है। 

भारत में हर साल 10 लाख टन से
 ज्यादा टेक्सटाइल वेस्ट डंपिंग ग्राउंड
पहुंचता है। वहीं, 2 में से 1 व्यक्ति अपने
अनयूज्ड कपड़ों को फेंक देता है। 

हर बार पॉलिएस्टर से बने एक कपड़े को
 धोने पर 7 लाख माइक्रोप्लास्टिक निकलते
 हैं जो नदी से समुद्र और समुद्र से समुद्री
जीवों के शरीर में मिल जाते हैं। 

शोधों में सामने आया कि पॉलिएस्टर के
 अंडर गार्मेंट्स मिसकैरेज और इनफर्टिलिटी
 की दिक्कत दे सकते हैं। इससे स्किन, हार्ट,
लिवर, किडनी और फेफड़े भी प्रभावित होते हैं। 

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