सहमति से तलाक का पूरा प्रोसेस समझिए

चारू-राजीव लेंगे म्यूचुअल
कनसेंट डाइवोर्स?

चारू आसोपा पति राजीव सेन से सहमित
से तलाक चाहती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि
इस रिश्ते में निभाने के लिए कुछ नहीं है।

हसबैंड-वाइफ को एक जॉइंट पिटीशन
फैमिली कोर्ट में दायर करनी होती है। इस
पिटीशन पर दोनों के सिग्नेचर होने चाहिए।

पिटीशन में दोनों का जॉइंट स्टेटमेंट भी
होता है, जिसमें पति-पत्नी कहते हैं कि दोनों
एक साथ नहीं रह सकते। इसमें बच्चों और
प्रॉपर्टी के बंटवारे का जिक्र होता है।

जब स्टेटमेंट दर्ज कर लिया जाता है तो कोर्ट के
सामने पेपर पर दोनों को सिग्नेचर करना होता है।

कोर्ट की तरफ से दोनों पक्षों को सुलह करने
के लिए 6 महीने का समय दिया जाता है।

अगर 6 महीने के बाद भी दोनों के
बीच सुलह नहीं होती तो फाइनल हियरिंग
(दूसरी याचिका) के लिए कोर्ट आना पड़ता है।

दूसरी याचिका 18 महीने के अंदर
कोर्ट में लगानी होगी। अगर नहीं लगाई तो
कोर्ट तलाक के आदेश को पास नहीं करेगा।

तलाक का आदेश पास होने से पहले कोई
भी एक पक्ष किसी भी समय अपनी मर्जी से
तलाक की सहमति वापस ले सकता है।

अगर पति-पत्नी के बीच पूरा समझौता न हो
या फिर कोर्ट किसी मामले पर संतुष्ट न हो तब
तलाक के लिए आदेश नहीं दिया जा सकता है।

कोर्ट चाहे तो अंतिम चरण में तलाक
का आदेश दे सकता है।

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